गुरुवार, 25 जून 2026

मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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कविता "मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य" का भाव यह है कि राष्ट्र केवल भूगोल, सत्ता या प्रतीकों से नहीं बनता, बल्कि मनुष्य की करुणा, श्रम, स्मृति और नैतिकता से जीवित रहता है। किसान, मजदूर, शिक्षक, माँ और सत्य के लिए खड़ा साधारण व्यक्ति ही देश की वास्तविक आत्मा हैं। आधुनिक बाज़ारवाद और स्वार्थ के बीच भी आशा तब तक जीवित है, जब तक मनुष्य के भीतर संवेदना, त्याग और प्रेम शेष हैं। कविता बताती है कि राष्ट्र का वास्तविक निवास मिट्टी से अधिक मानव-हृदय और विवेक में होता है। करुणा और मानवता का दीप बुझते ही सभ्यताएँ भी खंडहर बन जाती हैं, किंतु जब तक सत्य, आशा और मानवीय संवेदना जीवित हैं, तब तक देश भी जीवित रहेगा।

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देश


किसी मानचित्र पर खिंची हुई रेखा नहीं होता,


न ही किसी ऊँचे स्तंभ पर


लहराता हुआ एकाकी रंग।



वह तो समय की बंद मुट्ठी में दबा


वह बीज है


जो युगों की अंधेरी मिट्टी में


धीरे-धीरे प्रकाश का वृक्ष बनता है।



मैंने उसे देखा है—



एक वृद्ध किसान की हथेली में,


जहाँ दरारें नहीं,


सूख चुकी नदियों की जीवनी लिखी थी।



हर रेखा में


एक मौसम का शव पड़ा था,


और हर मौसम के भीतर


एक अगली हरियाली का सपना।



मैंने उसे देखा है—



शहर के चमकते शीशों के पीछे


अपने ही प्रतिबिंब से भयभीत मनुष्यों में।



वे ऊँची इमारतों में रहते थे,


पर भीतर से ढह चुके थे।



उनकी खिड़कियाँ खुलती थीं आकाश में,


पर आत्माएँ


तहखानों में बंद थीं।



देश उन इमारतों में नहीं था।


वह तो उस मजदूर की पीठ पर था


जो उन्हें उठाकर


स्वयं झोपड़ी में लौट जाता था।



उसकी देह पर चिपकी धूल


सभ्यता की वास्तविक प्रस्तावना थी।



कितना विचित्र है—


धरती का सबसे आवश्यक मनुष्य


इतिहास की सबसे छोटी पंक्ति में लिखा जाता है,


और सबसे अनावश्यक मनुष्य


सबसे बड़े अक्षरों में।



नदियाँ आज भी बह रही हैं,


पर जल से अधिक


वे स्मृतियाँ बहा रही हैं।



हर लहर के भीतर


किसी भूले हुए गाँव की आवाज़ है,


किसी माँ की पुकार,


किसी सैनिक की अंतिम साँस,


किसी बच्चे की अधूरी हँसी।



समय का एक पुराना बरगद


अब भी खड़ा है


सभ्यता के चौराहे पर।



उसकी जड़ों में


पूर्वजों की असंख्य पदचापें सो रही हैं।



जब भी कोई पीढ़ी


अपने अतीत को भूलने लगती है,


बरगद की जड़ें


पत्थरों को चीरकर बाहर आ जाती हैं।



वे पूछती हैं—


“तुम्हारी ऊँचाई किसकी राख पर खड़ी है?”



इन दिनों


बाज़ार बहुत विशाल हो गया है,


और मनुष्य बहुत छोटा।


वस्तुएँ अमर हो रही हैं,


संबंध नश्वर।



लोग घरों में साथ रहते हैं,


पर स्मृतियों में अलग-अलग मरते हैं।



हर आदमी


अपने भीतर एक निर्वासित देश लेकर चलता है।


एक ऐसा देश


जो लौटना चाहता है


अपने ही हृदय में।



पर वहाँ अब


सूचनाओं का शोर है,


विज्ञापनों की धूल है,


और इच्छाओं का ऐसा कुहासा


जिसमें आत्मा का चेहरा दिखाई नहीं देता।



मैंने देखा—


सबसे ऊँची आवाज़ें


अक्सर सबसे रिक्त थीं।



और सबसे गहरा देश


उन लोगों के भीतर था


जो चुपचाप


दूसरों के दुख का भार उठाते थे।



एक स्त्री


जब आधी रोटी खाकर


अपने बच्चे को पूरी रोटी देती है,


वहीं राष्ट्रगान का सबसे सच्चा स्वर जन्म लेता है।



एक शिक्षक


जब अँधेरे गाँव में


ज्ञान का दीप जलाता है,


वहीं संविधान का सबसे सुंदर अनुच्छेद लिखा जाता है।



एक किसान


जब सूखे खेत में भी


अगले वर्ष का बीज डाल देता है,


वहीं लोकतंत्र की सबसे बड़ी आशा अंकुरित होती है।



देश


विजयों से कम,


विश्वासों से अधिक बनता है।


ईंटों से कम,


आँसुओं से अधिक।


शक्तियों से कम,


त्यागों से अधिक।



और मनुष्य?


वह स्वयं एक चलता-फिरता राष्ट्र है।


उसकी करुणा उसकी राजधानी है,


उसकी स्मृति उसका इतिहास,


उसका श्रम उसका संविधान,


और उसका प्रेम


उसकी अंतिम स्वतंत्रता।



यदि कभी पूछो—


देश कहाँ है?


तो पर्वतों से पहले


मनुष्य की आँखों में देखना।


नदियों से पहले


उसके आँसुओं में झाँकना।


ध्वज से पहले


उसकी अंतरात्मा को पढ़ना।


क्योंकि राष्ट्र


मिट्टी में उतना नहीं रहता


जितना मनुष्य के विवेक में।


और जिस दिन


करुणा की अंतिम ज्योति बुझ जाएगी,


उस दिन


सबसे विशाल साम्राज्य भी


खंडहर हो जाएगा।


किन्तु अभी


क्षितिज पर एक दीप जल रहा है।


एक बच्चा


टूटी हुई स्लेट पर


भविष्य लिख रहा है।


एक बीज


पत्थर की दरार में भी


हरा होने का अभ्यास कर रहा है।



एक मनुष्य


अब भी सत्य के पक्ष में


अकेला खड़ा है।


और जब तक


यह बीज,


यह बच्चा,


यह मनुष्य,


और यह करुणा जीवित है—


तब तक


देश किसी नक्शे में नहीं,


मानव-हृदय की धड़कनों में जीवित रहेगा।


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