शुक्रवार, 26 जून 2026

दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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"दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता" केवल दो पीढ़ियों के बीच की दूरी का आख्यान नहीं, बल्कि बदलते समय में मनुष्य की संवेदनाओं, रिश्तों और पारिवारिक मूल्यों के विघटन की गहन व्यथा-कथा है। कविता यह संकेत करती है कि आधुनिक जीवन की अंधी दौड़, निजी स्वतंत्रता की नई व्याख्याएँ, महानगरीय संस्कृति और तकनीकी निकटता ने मनुष्यों के बीच भावनात्मक दूरियाँ बढ़ा दी हैं। कि जब संवाद समाप्त होता है, तब परिवार केवल एक संरचना रह जाता है और संबंध धीरे-धीरे अपने अर्थ खो देते हैं। कविता अंततः इस विश्वास के साथ समाप्त होती है कि यदि दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे को सुनने, समझने और स्वीकार करने का साहस करें, तो यही दरार फिर से एक जीवंत पुल में बदल सकती है। यह कविता केवल पीढ़ी-अंतराल का चित्रण नहीं, बल्कि हमारे समय के सबसे बड़े मानवीय संकट और उसके संभावित समाधान का संवेदनशील काव्य-दस्तावेज़ है। क्या आप भी ऐसा ही महसूस कर रहे हैं जैसा मैं देख रहा हूं........!! 

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दो उम्रों के बीच

कोई सड़क नहीं होती—

एक अदृश्य दरार होती है,

जिसे हर घर

अपने आँगन के बीचों-बीच

चुपचाप पालता है।


एक ओर

मिट्टी की गंध से भीगी हुई हथेलियाँ हैं,

जो रोटी बेलते हुए

वंश की परंपराएँ सेंकती रहीं;

दूसरी ओर

मोबाइल की चमक में

अपना चेहरा खोजती आँखें हैं,

जो भविष्य को

एक स्क्रीन पर स्क्रॉल करती रहती हैं।


बीच में—

एक रास्ता है,

जो हर दिन

थोड़ा और अकेला हो जाता है।


पिता कहते हैं—

"घर, दीवारों से नहीं,

साथ रहने से बनता है।"


बेटा सोचता है—

"घर, वहाँ है

जहाँ मेरी साँसें

किसी की अनुमति नहीं माँगतीं।"


माँ

इन दोनों वाक्यों के बीच

रोज़ एक दीपक रख देती है;

पर अब

रोशनी से अधिक

धुआँ बचता है।


रक्त

पहले नदी था—

जिसमें पीढ़ियाँ

एक-दूसरे की प्यास बुझाती थीं।


अब

वह मेडिकल रिपोर्ट की

एक लाल रेखा भर है,

जिससे संबंध तो सिद्ध हो जाते हैं,

अपनापन नहीं।


मिट्टी

अब भी

दरवाज़े पर पड़ी रहती है,

पर लौटने वाले जूतों की

आहट कम होती जाती है।


बीज

आज भी पेड़ होना चाहता है,

लेकिन गमलों में उगी महत्वाकांक्षाएँ

जड़ों को

आसमान का शत्रु समझ बैठी हैं।


शहर—

एक ऐसा विशाल दर्पण है,

जहाँ हर चेहरा

खुद को बड़ा देखता है,

और धीरे-धीरे

अपने पीछे खड़े लोगों को

भूल जाता है।


गाँव

अब केवल पता है,

जहाँ डाक पहुँचती है,

लोग नहीं।


रिश्ते

अब त्योहारों के संदेश हैं,

जिन्हें

कॉपी-पेस्ट की भाषा में

भेज दिया जाता है।


स्पर्श—

अब

पासवर्ड माँगता है।


विश्वास—

ओटीपी की तरह

कुछ ही क्षणों में

समाप्त हो जाता है।


और प्रेम...


वह

किसी पुराने संदूक में रखा

दादी का ऊनी स्वेटर है,

जिसे

नई अलमारियों में

जगह नहीं मिलती।


दो उम्रों के बीच

जो रास्ता था,

वहाँ अब

सीसीटीवी लगे हैं।


हर कोई

दूसरे पर नज़र रखता है,

कोई

दूसरे को देखता नहीं।


संवाद की जगह

संदेह उग आया है।


आशीर्वाद की जगह

सलाहें हैं।


सलाहों की जगह

निर्णय।


और निर्णयों की जगह

अदालतें।


कितना विचित्र है—


जिस गोद ने

चलना सिखाया,

उसी गोद के विरुद्ध

एक दिन

कानून की धाराएँ खड़ी हो जाती हैं।


जिस हाथ ने

पहली बार उँगली पकड़कर

सड़क पार कराई थी,

उसी हाथ से

बुढ़ापे में

सहारा छूट जाता है।


सभ्यता का सबसे बड़ा शोक

युद्ध नहीं है—


यह है कि

एक ही खाने की थाली से उठे लोग

अब

एक-दूसरे की मृत्यु के समाचार पर भी

केवल

"दुखद" लिखकर

आगे बढ़ जाते हैं।


पेड़

आज भी

अपनी सबसे ऊँची शाखा को

जड़ों से बाँधे रखता है।


नदी

समुद्र तक पहुँचकर भी

अपने उद्गम का अपमान नहीं करती।


पहाड़

बादलों को छू लेने पर भी

धरती से रिश्ता नहीं तोड़ते।


केवल मनुष्य—

अपनी पहली सफलता के बाद

सबसे पहले

अपनी स्मृतियों का पता बदल देता है।


दो उम्रों के बीच से गुजरता रास्ता

दरअसल

समय का नहीं,

संवेदना का रास्ता है।


जहाँ

हर पीढ़ी

अपने सत्य को

अंतिम सत्य मान बैठती है,

और यहीं से

प्रेम का भूगोल

टूटने लगता है।


घर

ईंटों से नहीं टूटते।


वे तब टूटते हैं

जब भोजन से पहले

कोई किसी का इंतज़ार करना छोड़ देता है।


जब माँ की आवाज़

कॉल-लॉग में बदल जाती है।


जब पिता का मौन

अहम् समझ लिया जाता है।


जब बच्चों के सपनों में

परिवार नहीं,

केवल पता बदलता है।


और तब—


दो उम्रों के बीच का रास्ता

सड़क नहीं रहता,


वह

एक अदालत,

एक अस्पताल,

एक वृद्धाश्रम,

एक मनोचिकित्सालय,

या कभी-कभी

एक जेल की ओर जाती हुई

निर्जन पगडंडी बन जाता है।


फिर भी—


यदि कभी

कोई बच्चा

अपने पिता की झुर्रियों में

भविष्य पढ़ ले,


यदि कोई पिता

अपने बेटे की बेचैनी में

विद्रोह नहीं,

डर पहचान ले,


यदि कोई माँ

दो पीढ़ियों के बीच

फिर से रोटी की पहली भाप रख दे,


तो शायद—


दो उम्रों के बीच से गुजरता रास्ता

फिर

दरार नहीं रहेगा।


वह

एक पुल होगा—


जिस पर चलते हुए

रक्त फिर नदी बनेगा,


मिट्टी फिर घर बनेगी,


और मनुष्य

एक बार फिर

मनुष्य कहलाने के योग्य होगा।



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