अकथ प्रेम का अनंत लोक : जहाँ शब्द समाप्त होते हैं और मानवता जन्म लेती है
“अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाए।
गूँगे केरी शर्करा, बैठी-बैठी मुस्काए॥” — कबीर
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
प्रेम : सृष्टि का मौन आधार और जीवन का प्राणतत्त्व -
इस विराट ब्रह्मांड की रचना का यदि कोई सबसे सूक्ष्म और सबसे शक्तिशाली सूत्र है तो वह प्रेम ही है। प्रकृति का प्रत्येक दृश्य प्रेम की मौन अभिव्यक्ति है। सूर्य प्रतिदिन बिना किसी अपेक्षा के प्रकाश देता है, पृथ्वी बिना भेदभाव के सबको धारण करती है, नदियाँ अपने जल को रोककर नहीं रखतीं और वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते। समस्त सृष्टि त्याग, करुणा और समर्पण के जिस भाव पर चल रही है, वही प्रेम का मूल स्वरूप है।
मानव जीवन में प्रेम का स्थान उसी प्रकार है जैसे शरीर में प्राण का। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार प्रेम के बिना मानवता की कल्पना नहीं की जा सकती। यदि प्रेम न हो तो परिवार केवल व्यक्तियों का समूह रह जाएगा, समाज केवल व्यवस्था बनकर रह जाएगा और संसार केवल संघर्ष का मैदान बन जाएगा।
प्रेम मनुष्य को मनुष्य बनाता है। वह अहंकार को विनम्रता में, हिंसा को करुणा में और स्वार्थ को परमार्थ में रूपांतरित करता है। जिस व्यक्ति के भीतर प्रेम का स्रोत सूख जाता है, उसके भीतर संवेदनाएँ भी धीरे-धीरे मरने लगती हैं। वह दूसरों को वस्तु की तरह देखने लगता है, व्यक्ति की तरह नहीं।
कबीर ने प्रेम को किसी संकीर्ण संबंध तक सीमित नहीं किया। उनके लिए प्रेम आत्मा और परमात्मा के बीच का सेतु है, मनुष्य और मनुष्य के बीच का पुल है तथा समस्त जीव-जगत के प्रति करुणा का विस्तार है। यही कारण है कि प्रेम को उन्होंने अकथ कहा, क्योंकि जो भावना समस्त अस्तित्व में व्याप्त हो, उसे सीमित शब्दों में कैसे व्यक्त किया जा सकता है?
वास्तव में प्रेम वह अदृश्य ऊर्जा है जो बीज को वृक्ष बनने की प्रेरणा देती है, बादलों को वर्षा बनने का साहस देती है और मनुष्य को अपने सीमित स्वार्थों से ऊपर उठने की शक्ति प्रदान करती है। प्रेम केवल एक भाव नहीं, बल्कि जीवन की मूल चेतना है। जहाँ प्रेम है, वहीं सृजन है; जहाँ प्रेम है, वहीं जीवन है; जहाँ प्रेम नहीं है, वहाँ केवल अस्तित्व बचता है, जीवन नहीं।
अकथ प्रेम का मनोविज्ञान : जहाँ अनुभव शब्दों से बड़ा हो जाता है -
मानव मन के सबसे गहरे स्तर पर प्रेम एक ऐसी ऊर्जा है जो व्यक्ति को उसके अकेलेपन से मुक्त करती है। मनुष्य केवल शरीर नहीं है; वह भावनाओं, स्मृतियों, आकांक्षाओं और संबंधों का समुच्चय है। प्रेम इन सबको अर्थ प्रदान करता है।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रेम व्यक्ति को सुरक्षा, आत्मविश्वास और आत्मस्वीकृति प्रदान करता है। जिस व्यक्ति को प्रेम मिलता है, वह स्वयं को मूल्यवान अनुभव करता है। उसके भीतर सृजनात्मकता बढ़ती है, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है और वह अपने अस्तित्व को सार्थक मानने लगता है।
इसके विपरीत प्रेम-विहीन जीवन धीरे-धीरे भीतर से रिक्त होने लगता है। बाहरी उपलब्धियाँ चाहे जितनी बड़ी हों, यदि जीवन में प्रेम नहीं है तो सफलता भी एक प्रकार का अकेलापन बन जाती है। आधुनिक समय में भौतिक सुविधाओं की वृद्धि हुई है, किन्तु मानसिक तनाव, अवसाद और संबंधों की टूटन भी बढ़ी है। इसका एक प्रमुख कारण प्रेम की कमी और संवेदनाओं का क्षरण है।
कबीर का “गूँगे केरी शर्करा” वाला बिंब मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास ही उनकी गहराई को कम कर देता है। प्रेम भी ऐसा ही अनुभव है। जब माँ अपने शिशु को देखती है, जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से किसी की सहायता करता है, जब दो आत्माएँ बिना कहे एक-दूसरे को समझ लेती हैं— तब वहाँ भाषा की आवश्यकता नहीं रह जाती।
प्रेम का सबसे सशक्त रूप मौन में प्रकट होता है। शब्द कभी-कभी भ्रम पैदा कर सकते हैं, पर प्रेम की सच्ची अनुभूति आँखों की करुणा, स्पर्श की ऊष्मा और व्यवहार की सरलता में दिखाई देती है। प्रेम का मनोविज्ञान बताता है कि मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता समझे जाने की होती है, और प्रेम वही शक्ति है जो बिना कहे भी समझ लेती है।
यहाँ प्रेम केवल आकर्षण नहीं है, बल्कि अस्तित्व की स्वीकृति है। वह दूसरे को बदलने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उसे उसके सम्पूर्ण स्वरूप में स्वीकार करता है। यही कारण है कि प्रेम व्यक्ति के भीतर छिपे भय, असुरक्षा और अकेलेपन को धीरे-धीरे पिघला देता है। प्रेम मनुष्य के मानस का सबसे बड़ा उपचार है।
प्रेम की उपादेयता : सभ्यता, संस्कृति और मानवता का आधार -
यदि इतिहास को ध्यानपूर्वक देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव सभ्यता का विकास केवल बुद्धि के कारण नहीं हुआ; उसके पीछे प्रेम, सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना भी रही है। प्रेम वह शक्ति है जिसने परिवार की संस्था को जन्म दिया, समाज को संगठित किया और संस्कृति को स्थायित्व प्रदान किया।
जब प्रेम परिवार में होता है तो वहाँ विश्वास जन्म लेता है। जब समाज में प्रेम होता है तो वहाँ सहिष्णुता विकसित होती है। जब राष्ट्रों के बीच प्रेम और सम्मान होता है तो युद्धों की संभावना कम हो जाती है। इसलिए प्रेम केवल व्यक्तिगत भावना नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता भी है।
आज का विश्व तकनीकी रूप से अत्यंत उन्नत है, किन्तु अनेक स्तरों पर विखंडित भी है। जाति, धर्म, भाषा, वर्ग, क्षेत्र और विचारधाराओं के नाम पर बढ़ती दूरियाँ इस बात का संकेत हैं कि मनुष्य ने ज्ञान तो अर्जित किया है, पर प्रेम की साधना को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। प्रेम ही वह शक्ति है जो विभाजन की रेखाओं को मिटाकर एकता का निर्माण कर सकती है।
प्रेम का अर्थ केवल आकर्षण या भावुकता नहीं है। उसका वास्तविक अर्थ है— दूसरे के अस्तित्व को सम्मान देना। जब हम किसी व्यक्ति, समुदाय या प्रकृति के प्रति सम्मान और करुणा रखते हैं, तब हम प्रेम के वास्तविक स्वरूप को जी रहे होते हैं।
यदि खेत में खाद और पानी न हो तो बीज अंकुरित नहीं हो सकता। यदि वायु न हो तो जीवन टिक नहीं सकता। उसी प्रकार यदि प्रेम न हो तो मनुष्य का नैतिक और आध्यात्मिक विकास संभव नहीं है। प्रेम जीवन की वह उर्वर भूमि है जिसमें दया, क्षमा, त्याग, सेवा और सहानुभूति जैसे गुण विकसित होते हैं।
सभ्यता की समस्त उपलब्धियाँ प्रेम के बिना अधूरी हैं। विज्ञान हमें शक्ति दे सकता है, लेकिन उसका सदुपयोग करने की प्रेरणा प्रेम ही देता है। ज्ञान दिशा दिखा सकता है, पर उस दिशा पर चलने की नैतिक शक्ति प्रेम ही प्रदान करता है।
हिंदी साहित्य में प्रेम की यात्रा : भक्ति से आधुनिकता तक बदलते संदर्भ और शाश्वत संवेदना -
प्रेम केवल जीवन का आधार नहीं, साहित्य की आत्मा भी है। यदि हिंदी साहित्य के विशाल इतिहास को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया जाए तो वह सूत्र प्रेम ही होगा। आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक कवियों ने प्रेम को विभिन्न रूपों में देखा, जिया और अभिव्यक्त किया है।
कबीर का प्रेम निर्गुण चेतना का प्रेम है—
“प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, शीश दे ले जाय॥”
यहाँ प्रेम आत्म-समर्पण का नाम है।
मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत में प्रेम आत्मा और परम सत्य की खोज बन जाता है। सूरदास के भ्रमरगीत में प्रेम विरह की चरम अनुभूति बनकर सामने आता है—
“ऊधो, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयो श्याम संग, को अवराधै ईस॥”
यह केवल गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम नहीं, बल्कि उस आत्मा की पीड़ा है जिसने अपने प्रियतम सत्य को खो दिया है।
तुलसीदास के यहाँ प्रेम भक्ति की आत्मा है। वहीं रीतिकाल में बिहारी, मतिराम, देव और केशवदास ने प्रेम को श्रृंगार, सौंदर्य और मानवीय आकर्षण की सूक्ष्मतम अवस्थाओं में चित्रित किया।
“नैनन ही सौं बात है, नैनन ही सौं प्रीति।”
छायावाद में प्रेम ने आध्यात्मिक और दार्शनिक विस्तार प्राप्त किया। जयशंकर प्रसाद के यहाँ प्रेम सौंदर्य का रहस्य है, सुमित्रानंदन पंत के यहाँ प्रकृति का संगीत है, निराला के यहाँ मानवीय करुणा है और महादेवी वर्मा के यहाँ अनंत विरह की साधना है।
नई कविता और समकालीन साहित्य में प्रेम के संदर्भ बदलते हैं। अब प्रेम केवल मिलन और विरह का विषय नहीं रह जाता, बल्कि अकेलेपन, महानगरीय जीवन, टूटते संबंधों, मानसिक तनाव और अस्तित्वगत संकट से जुड़ जाता है। आधुनिक मनुष्य के पास संवाद के अनेक साधन हैं, पर आत्मीयता का संकट पहले से अधिक गहरा है।
युग बदलते रहे, विचारधाराएँ बदलती रहीं, पर प्रेम का मूल स्वर नहीं बदला। कबीर का निर्गुण प्रेम, सूर का माधुर्य प्रेम, तुलसी की भक्ति, बिहारी का श्रृंगार, महादेवी का विरह और आधुनिक कवियों की मानवीय संवेदना— ये सब उसी अनंत प्रेम-सरोवर की विभिन्न तरंगें हैं।
प्रेम : विचारकों और कवियों की दृष्टि में -
प्रेम की महिमा का वर्णन केवल कबीर, सूर और तुलसी ने ही नहीं किया, बल्कि विश्व साहित्य के अनेक कवियों, दार्शनिकों और चिंतकों ने भी प्रेम को मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि माना है। कबीर कहते हैं— “प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय”, अर्थात प्रेम कोई वस्तु नहीं है जिसे खरीदा या उगाया जा सके; यह आत्मा की साधना से प्राप्त होता है। रहीम ने प्रेम की कोमलता को व्यक्त करते हुए लिखा— “रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।” तुलसीदास के अनुसार समस्त आध्यात्मिक साधना का मूल प्रेम है— “रामहि केवल प्रेम पियारा।” सूरदास के यहाँ प्रेम आत्म-विसर्जन की अवस्था है, जहाँ गोपियाँ कह उठती हैं— “ऊधो, मन न भए दस बीस।” बिहारी ने प्रेम की सूक्ष्मता को इस प्रकार व्यक्त किया— “या अनुरागी चित्त की गति समुझे नहिं कोय।” महादेवी वर्मा के काव्य में प्रेम विरह की तपस्या बन जाता है, जबकि जयशंकर प्रसाद प्रेम को मानव चेतना का सौंदर्य मानते हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा था— “प्रेम अधिकार नहीं, आत्मसमर्पण है।” अंग्रेज़ कवि शेक्सपीयर के अनुसार— “Love is not love which alters when it alteration finds” अर्थात परिस्थितियों के बदलने पर जो बदल जाए, वह प्रेम नहीं है। दार्शनिक प्लेटो ने प्रेम को आत्मा के सौंदर्य की खोज कहा, जबकि लियो टॉल्स्टॉय ने लिखा— “जहाँ प्रेम है, वहाँ ईश्वर है।” खलील जिब्रान के अनुसार प्रेम किसी को अपना दास नहीं बनाता, बल्कि दोनों को स्वतंत्र बनाते हुए एक-दूसरे के निकट लाता है। इन सभी विचारों का सार यही है कि प्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि मनुष्य के आध्यात्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक उत्कर्ष का आधार है। युग बदलते रहे, सभ्यताएँ बदलती रहीं, लेकिन प्रेम की महिमा कभी कम नहीं हुई, क्योंकि प्रेम ही वह शक्ति है जो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखती है और मानवता को जीवित रखती है।
प्रेम, विरह और मनुष्य का आंतरिक शून्य : मानसिक बंधनों से मुक्ति की यात्रा -
प्रेम केवल सुख का नाम नहीं है। उसके भीतर विरह, प्रतीक्षा, स्मृति, पीड़ा और आत्मसंघर्ष भी छिपे होते हैं। वस्तुतः प्रेम का सबसे गहरा पक्ष वही है जहाँ मनुष्य अपने भीतर के रिक्त स्थानों से परिचित होता है।
जब प्रेम अनुपस्थित होता है, तब मनुष्य का मन धीरे-धीरे मरुस्थल में बदलने लगता है। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, पर भीतर एक मौन सूखा फैल जाता है। आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि मनुष्य भीड़ में रहकर भी अकेला है। उसके पास साधन हैं, लेकिन संबंध नहीं; संपर्क हैं, लेकिन आत्मीयता नहीं।
प्रेम इस मानसिक बंधन को तोड़ता है। वह व्यक्ति को स्वयं से मिलाता है। प्रेम में मनुष्य पहली बार यह अनुभव करता है कि जीवन केवल ‘मैं’ नहीं, बल्कि ‘हम’ भी है। यही कारण है कि प्रेम मनुष्य को आत्मकेंद्रितता से मुक्त करता है।
विरह भी प्रेम का अभाव नहीं है; वह प्रेम की सबसे गहन उपस्थिति है। जिस व्यक्ति ने कभी प्रेम नहीं किया, वह विरह को नहीं समझ सकता। गोपियों का कृष्ण-विरह, मीरा का गिरधर-विरह, महादेवी का अज्ञात प्रिय— ये सभी विरह के माध्यम से प्रेम की गहराई को व्यक्त करते हैं।
प्रेम मनुष्य को तोड़ता भी है और बनाता भी है। वह अहंकार को तोड़ता है, पर व्यक्तित्व को निर्मित करता है। वह सीमाओं को तोड़ता है, पर संबंधों को जोड़ता है। प्रेम का यही द्वंद्व उसे जीवन की सबसे बड़ी रचनात्मक शक्ति बनाता है।
प्रेम की शाश्वत प्रासंगिकता : मानवता के भविष्य का एकमात्र प्रकाश -
आज का युग अभूतपूर्व उपलब्धियों का युग है। मनुष्य अंतरिक्ष तक पहुँच गया है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण कर रहा है और विज्ञान की नई सीमाओं को पार कर रहा है। किन्तु इन सब उपलब्धियों के बीच एक प्रश्न अभी भी उतना ही प्रासंगिक है— क्या मनुष्य अपने भीतर प्रेम को बचा पा रहा है?
यदि विज्ञान शक्ति देता है तो प्रेम दिशा देता है। यदि ज्ञान प्रकाश देता है तो प्रेम ऊष्मा देता है। केवल शक्ति और ज्ञान पर्याप्त नहीं हैं; उनके साथ करुणा और प्रेम भी आवश्यक हैं। अन्यथा विकास विनाश का कारण बन सकता है।
आधुनिक मनुष्य बाहरी संसार में जितना विस्तृत हुआ है, भीतर से उतना ही अकेला हुआ है। ऐसे समय में प्रेम केवल नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि अस्तित्व की आवश्यकता है। प्रेम ही मनुष्य को मशीन बनने से बचाता है। प्रेम ही उसे संवेदनशील बनाए रखता है। प्रेम ही उसे यह स्मरण कराता है कि जीवन प्रतियोगिता नहीं, सहयात्रा है।
प्रेम का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि वह जितना बाँटा जाता है, उतना ही बढ़ता है। धन बाँटने से घटता है, शक्ति बाँटने से कम होती है, पर प्रेम बाँटने से विस्तृत होता है। यही उसकी दिव्यता है। इसी कारण संतों, सूफियों और महापुरुषों ने प्रेम को ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग माना है।
कबीर के “अकथ प्रेम” का सार यही है कि प्रेम को समझा नहीं जाता, जिया जाता है; उसे सिद्ध नहीं किया जाता, अनुभव किया जाता है। वह किसी पुस्तक का विषय नहीं, जीवन का सत्य है। जब मनुष्य प्रेम करना सीख जाता है, तब वह केवल किसी व्यक्ति से नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि से जुड़ जाता है।
अंततः जिस प्रकार सूर्य के बिना दिन, चंद्रमा के बिना रात्रि, जल के बिना जीवन, वायु के बिना प्राण और खाद-पानी के बिना वृक्ष अधूरे हैं, उसी प्रकार प्रेम के बिना मनुष्य और मानवता दोनों अधूरे हैं। प्रेम ही वह अदृश्य धागा है जो जीवन को अर्थ देता है, समाज को दिशा देता है, संस्कृति को संवेदना देता है और मानवता को भविष्य देता है।
इसलिए कबीर की पंक्ति आज भी उतनी ही सत्य प्रतीत होती है—
“अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाए।
गूँगे केरी शर्करा, बैठी-बैठी मुस्काए॥”
वास्तव में प्रेम की कथा कही नहीं जा सकती; उसे केवल जिया जा सकता है। शब्द उसके तट तक पहुँच सकते हैं, पर उसकी गहराई में उत
रने के लिए हृदय चाहिए। वही हृदय, जिसमें अभी भी करुणा है, संवेदना है, मनुष्यता है— और सबसे बढ़कर, प्रेम है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें