शुक्रवार, 12 जून 2026

समय-सरिता के उस पार ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

समय-सरिता के उस पार

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


भीड़ में बहुत लोग मिल जाते हैं, सब अपने नहीं होते,

हर उजले दर्पण के भीतर, सत्य के चेहरे नहीं होते।

हाथ मिलाना सहज कला है, साथ निभाना तप होता है,

बंद देहरी पर दीप जले तो, घर आलोकित नहीं होते।


ऋतुओं संग रंग बदल लेना, जग की पुरखिन रीति रही,

हर डाली पर झूम रहे फल, मधुरस वाले नहीं होते।

सुख की धूप में छाया बनकर, कितने जन संग चलते हैं,

दुःख की वर्षा सिर पर बरसे, तब सब अपने नहीं होते।


कुछ शब्दों में चंदन महके, कुछ में नागफनी उग आती,

हर मधुर वाणी के भीतर, निर्मल निर्झर नहीं होते।

समय-सरिता चुपके-चुपके, कितने मुख बहा ले जाती,

हर कागज़ की नाव नियति के, उस पार नहीं होती।


कुछ संबंध हिमशिखरों जैसे, युग-युग अचल खड़े रहते,

कुछ रेतों पर लिखे आख्यान, अगली लहर नहीं होते।

बीज वही वनराज बनें जो, तम की कोख सहन कर लें,

हर मुट्ठी में बिखरे दाने, वट-विस्तार नहीं होते।


कुछ पिघल जाते हैं जीवन की, पहली धूप की आहट से,

हर पत्थर की मौन गुफा में, जागे कुंदन नहीं होते।

घाव सभी के हिस्से आते, आँसू सबकी आँखों में हैं,

पर युग इतिहास बदल दें—सभी आँसू हिमालय नहीं होते।






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