सोमवार, 22 जून 2026

बीज का एकांत ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

बीज का एकांत

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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"बीज का एकांत" उन लोगों की कहानी है जो आज संघर्ष की धूप में तप रहे हैं, अपनी इच्छाओं को स्थगित कर रहे हैं, अकेले कमरों में बैठकर सपनों की नींव रख रहे हैं और असफलताओं के बीच भी अपने विश्वास को बचाए हुए हैं। यह कविता उस मौन साधना का आख्यान है जिसमें एक विद्यार्थी, एक स्वप्नद्रष्टा और एक कर्मयोगी धीरे-धीरे स्वयं को गढ़ता है। जो आज मिट्टी के अँधेरे में दबे बीज की तरह दिखाई देते हैं, वही कल विशाल वृक्ष बनकर खड़े होंगे—अपने लिए नहीं, बल्कि उन थके हुए पथिकों के लिए जिन्हें जीवन की कठिन यात्राओं में थोड़ी-सी छाया, थोड़ा-सा विश्वास और आगे बढ़ने का साहस चाहिए होगा।"

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वे जो आज

शिखरों पर दिखाई देते हैं,

कभी धरती की अँधेरी तहों में

दबे हुए बीज थे।


किसी ने उनके भीतर

हरियाली नहीं देखी थी,

किसी ने उनके भविष्य की शाखाओं पर

बैठे पक्षियों का संगीत नहीं सुना था।


सबको केवल मिट्टी दिखी,

केवल अँधेरा दिखा।


पर बीज जानता था—

अँधेरा अंत नहीं होता,

अक्सर वही जन्म का दूसरा नाम होता है।


विद्यार्थी जीवन

दरअसल एक बीज का जीवन है।


ऊपर से सब कुछ स्थिर दिखाई देता है,

पर भीतर

जड़ों का एक अदृश्य महाकाव्य लिखा जा रहा होता है।


जब शहर सो रहा होता है,

एक दीपक अपनी लौ से

रात की पीठ पर अक्षर लिख रहा होता है।


घड़ी की सुइयाँ

समय नहीं बतातीं,

वे धीरे-धीरे

एक मनुष्य का निर्माण करती हैं।


किताबें मेज़ पर खुली रहती हैं,

पर असल में खुलता है

भविष्य का वह दरवाज़ा

जिसकी कुंडी केवल धैर्य पहचानता है।


असफलता—


वह तूफ़ान नहीं

जो पेड़ को गिरा दे।


वह तो जड़ के पास बैठा हुआ

एक मौन शिल्पकार है,

जो हर चोट के साथ

मनुष्य के भीतर से

अनावश्यक पत्थर हटाता रहता है।


कई बार परिणामों की धूप

हमारे हिस्से नहीं आती,


कई बार

मेहनत का पूरा आकाश

बादलों में घिर जाता है।


तब लगता है—


जैसे नदी ने

समुद्र तक पहुँचने की सारी यात्राएँ

व्यर्थ कर दी हों।


लेकिन नदी जानती है,

रास्ते कभी व्यर्थ नहीं जाते;


वे जल को नहीं,

उसके धैर्य को गढ़ते हैं।


और फिर आता है—


अकेलापन।

जीवन का सबसे गलत समझा गया शब्द।


लोग उसे खाली कमरा समझते हैं,


पर वह तो एक कार्यशाला है

जहाँ आत्मा

अपने सबसे गहरे औज़ार बनाती है।


वहीं बैठकर

मनुष्य अपने भय की गाँठें खोलता है,


वहीं वह

अपनी सीमाओं के टूटने की आवाज़ सुनता है,


वहीं वह सीखता है

कि भीड़ से तालियाँ मिल सकती हैं,

पर दिशा नहीं।


दिशा हमेशा

एकांत की गोद में जन्म लेती है।


किसी महान उपलब्धि की चमक में

बरसों का धुआँ छिपा होता है।


हर पदक के पीछे

कुछ अधूरी नींदें होती हैं,


हर सफलता के पीछे

कई पराजयों की अस्थियाँ दबी होती हैं।


कोई भी ऊँचा पद

किसी एक परीक्षा का परिणाम नहीं होता,


वह उन दिनों का संचित प्रकाश होता है

जब कोई देख नहीं रहा था

और फिर भी तुम काम कर रहे थे।


एक दिन


जब दुनिया तुम्हें सफल कहेगी,

तब भी तुम्हारे भीतर


वह पुराना विद्यार्थी जीवित रहेगा—

जो रात के अंतिम पहर में


एक पन्ना और पढ़ लेने के लिए

नींद से समझौता कर लेता था,


जो हार के बाद

अपने आँसुओं को पोंछकर

फिर से मेज़ पर बैठ जाता था,


जो जानता था कि


फल से पहले

फूल नहीं,


और फूल से पहले

बीज को

असंख्य अँधेरे सहने पड़ते हैं।


इसलिए यदि अभी

रास्ता लंबा है,


यदि अभी

कमरे में केवल तुम हो

और तुम्हारे सामने खुली हुई किताब,


यदि अभी

परिणाम तुम्हारे पक्ष में नहीं हैं,


तो निराश मत होना।


क्योंकि सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य यही है—


वृक्ष बनने से पहले

हर बीज को

अपने हिस्से का एकांत,

अपनी मिट्टी का अँधेरा,

और अपनी असफलताओं की वर्षा

चुपचाप सहनी पड़ती है।


और जो यह सह लेता है,


वही एक दिन

छाया बनकर

दूसरों के रास्तों पर खड़ा दिखाई देता है।




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