पार्थ-सारथी
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कुरुक्षेत्र की धूल में डूबा था दिवस उदास,
शंखों की गर्जन में काँप रहा था आकाश।
रथ के अग्रभाग में बैठे थे योगेश्वर श्याम,
पीछे गांडीवधारी पार्थ, हृदय में मौन विराम।
जब बीच रणांगन में पहुँचा स्वर्णिम रथ महान,
द्रोण, भीष्म, कृप, अश्वत्थामा—दिखा समस्त विधान।
बंधु-बांधव, गुरुजन, अपने ही रक्त-संबंध,
देख अर्जुन का कंपित हुआ करुणा से अंतर्बंध।
बोले—क्या करूँ विजय का, यदि अपनों का हो क्षय?
रक्त-रंजित इस राज्य में फिर कैसा सुखमय जय?
गांडीव झुक गया, जैसे झुकता संध्या में भानु,
धर्म खड़ा था द्वार पर, भीतर रोता था प्राणु।
मुस्काए तब माधव, जैसे नभ में उगे प्रभात,
अंधियारे संशय पर बरसी ज्ञान-ज्योति की बात।
कर्म ही तेरा सत्य है, फल का मत अधिकार,
धर्म हेतु जो युद्ध हो, वही जीवन का सार।
वाणी बनी गीता वहाँ, क्षण बना अनंत प्रकाश,
मोह-तिमिर के बीच जगा आत्मा का विश्वास।
रथ का पहिया घूम उठा, जागा वीरत्व अपार,
कर्तव्य के दीपक ने हर लिया भय का अंधकार।
पार्थ हुआ फिर लक्ष्यवत, संकल्पों का धनुर्धर,
सारथी बने स्वयं हरि, पथ हुआ दिव्य, सुंदर।
जीवन भी कुरुक्षेत्र है, मन ही अर्जुन-दीन,
अंतर्यामी कृष्ण हैं, यदि श्रद्धा रहे प्रवीण।
जब-जब संशय घेर ले, जब टूटे साहस-तार,
स्मरण करो उस रथी को, जो था जग का आधार।
धर्म-पथ पर चलने वाले होते नहीं निराश—
पार्थ जहाँ संकल्प है, वहाँ सारथी है प्रकाश।
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