रविवार, 31 मई 2026

पंख पलायन (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 पंख पलायन (कविता) 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


(प्रथम अंश)

कल की चिंता करने वाले, अपना आज बनाने वाले,

विस्थापन की मिट्टी में, बीज पलायन बोने वाले।

अपने घरों में ताला लगाकर, छोटे-फ्लैट में सोने वाले,

अपनी जड़ों से दूर हुए, पहचान स्वयं की खोने वाले।

कथनी-करनी में भेद जहाँ, फिर जीवन-भर को रोते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


(द्वितीय अंश)

कंक्रीटों के जंगल में, पीपल की छाया खोने वाले,

सुविधाओं के स्वर्ण-पिंजर में, अपने नभ को गँवाने वाले।

खिड़की भर आकाश बचाकर, उसको ही विस्तार कहने वाले,

स्मृतियों की बुझती राखों में, बीते उत्सव ढोने वाले।

जब मन की सूनी साँझों में, घर के आँगन याद आते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


(तृतीय अंश)

नदियों से नाता तोड़कर, मरुथल में सपने बोने वाले,

माटी की भाषा भूल गए, बाज़ारों में खोने वाले।

जड़ों से कटकर ऊँचाइयों का, केवल भ्रम संजोने वाले,

अपनी ही परछाईं से, जीवन-भर प्रश्न संजोने वाले।

जब पहचान के दर्पण में, बिखरे चेहरे दिखते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


(चतुर्थ अंश)

बरगद की बूढ़ी छाया को, स्मृतियों में ढोने वाले,

सूने गांवों की प्रतिध्वनि, अपने भीतर बोने वाले।

धरती से ऊँचे उठकर भी, धरती को ही खोने वाले,

जीवन भर उपलब्धियों के बीच, एक रिक्ति संजोने वाले।

जब जड़हीन समय के झोंके, अस्तित्व-दीप को धोते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


(पंचम अंश)

रेत-घड़ी के गिरते कण-से, अपने दिन को खोने वाले,

स्मृतियों के जलते वन में, छाया भर को ढोने वाले।

आकाशों की सीमा छूकर, भीतर से बौने होने वाले,

स्वर्णिम द्वारों के आगे भी, मन के द्वार न खोलने वाले।

जब अंतिम संध्या में अपने ही, पदचिह्न अपरिचित होते हैं,

लौट नहीं सकते वह पक्षी, बीच समुद्र पथ खोते हैं।


"पंख पलायन" को और जाने...!

यह कविता केवल घर छोड़ने की कथा नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर घटित उस अदृश्य विस्थापन की कहानी है, जिसे संसार सफलता कहता है और आत्मा धीरे-धीरे निर्वासन के रूप में जीती है।

यह उन लोगों की गाथा है जो बेहतर भविष्य की खोज में निकलते हैं, पर यात्रा के किसी मोड़ पर पाते हैं कि भविष्य की कीमत उन्होंने अपने अतीत से चुकाई है। उन्होंने शहर तो पा लिया, पर चौखट खो दी; उन्होंने सुविधा तो पा ली, पर अपनापन खो दिया; उन्होंने आकाश छू लिया, पर जड़ों का स्पर्श खो दिया।

कविता का पक्षी केवल पक्षी नहीं है। वह आधुनिक मनुष्य का प्रतीक है—वह मनुष्य जो उड़ना चाहता है, सीमाएँ तोड़ना चाहता है, अपने लिए नए क्षितिज बनाना चाहता है। परंतु हर उड़ान मुक्ति नहीं होती। कुछ उड़ानें ऐसी भी होती हैं जो मनुष्य को उसकी मिट्टी, उसकी भाषा, उसकी स्मृतियों और उसकी पहचान से दूर ले जाती हैं। तब पंख विस्तार का नहीं, पलायन का प्रतीक बन जाते हैं।

विस्थापन केवल भूगोल का परिवर्तन नहीं है। यह स्मृतियों के मानचित्र पर पड़ने वाली दरार है। यह वह क्षण है जब घर एक स्थान नहीं, बल्कि एक अनुपस्थिति बन जाता है। जब गाँव नक्शे में बचा रहता है, पर जीवन से धीरे-धीरे मिटने लगता है। जब बरगद की छाया स्मृति बन जाती है और चौपाल की आवाज़ प्रतिध्वनि।

मनुष्य जब अपनी जड़ों से दूर जाता है तो वह केवल दूरी नहीं तय करता, वह अपने भीतर एक रिक्त स्थान भी निर्मित करता है। यह रिक्तता धन से नहीं भरती, उपलब्धियों से नहीं भरती, प्रतिष्ठा से नहीं भरती। यह वही रिक्तता है जो भीड़ के बीच अकेलापन बनकर, सफलता के बीच अधूरापन बनकर और उत्सवों के बीच एक अनाम उदासी बनकर उपस्थित रहती है।

कविता यह भी संकेत करती है कि आधुनिकता का सबसे बड़ा संकट बाहरी नहीं, आंतरिक है। मनुष्य ने ऊँची इमारतें बना लीं, पर स्मृतियों के लिए जगह छोटी कर दी। उसने संसार को निकट कर लिया, पर अपने लोगों को दूर कर दिया। उसने समय बचाया, पर जीवन खो दिया। उसने गति प्राप्त की, पर दिशा खो दी।

यह काव्य उस मनोवैज्ञानिक विखंडन की भी पड़ताल करता है जिसमें मनुष्य दो हिस्सों में बँट जाता है—एक हिस्सा वर्तमान में जीता है, दूसरा लगातार अतीत की ओर लौटना चाहता है। एक शरीर महानगर में रहता है, पर आत्मा अब भी किसी गाँव की पगडंडी पर भटकती रहती है।

अंततः "पंख पलायन" एक प्रश्न है—क्या हर उड़ान प्रगति है? क्या हर उपलब्धि पूर्णता है? क्या जड़ों से कटकर भी वृक्ष हरा रह सकता है? कविता किसी निष्कर्ष को थोपती नहीं, बल्कि पाठक को उसके अपने जीवन के सामने खड़ा कर देती है।

और तब समझ में आता है कि समुद्र केवल जलराशि नहीं है; वह समय, दूरी, महत्वाकांक्षा और विस्मृति का प्रतीक है। जो पक्षी उसे पार करते हैं, वे अक्सर नए किनारे तो पा लेते हैं, पर लौटने का मार्ग खो बैठते हैं।

इसीलिए यह कविता पलायन का विरोध नहीं करती, बल्कि स्मृति का पक्ष लेती है; उड़ान को नहीं रोकती, पर जड़ों को बचाए रखने की विनती करती है। क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि वह घर छोड़ देता है, बल्कि यह है कि एक दिन घर उसे छोड़ देता है।

और उस दिन, सबसे अधिक अकेला वही होता है जिसके पास सब कुछ होता है—सिवाय अपनी मिट्टी के।


©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


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