घर की किस्तों में उम्र यूँ ही उतरती रही,
छत तो मिल गई मगर नींद किराये पर रही।
रोटी की जंग में कितने रिश्ते थक गए,
कुछ लोग भूखे रहे, कुछ लोग अहंकार से भर गए।
नौकरी मिली तो बचपन कहीं गुम हो गया,
वक्त कमाने निकले थे, सुकून कम हो गया।
बीवी की आँखों में शिकायत भी दुआ जैसी थी,
घर की तंगी में भी उसकी वफ़ा अमीरों जैसी थी।
बेटे बड़े हुए तो मकाँ बाँटने लगे,
माँ-बाप उम्र भर बस घर बनाने लगे।
हर आदमी यहाँ किसी चिंता का मरीज़ है,
कोई तन से परेशान, कोई दिल से गरीब है।
भागती दुनिया ने इतना थका दिया मुझे,
अब सुकून मिलता है चुप रहकर चाँद देखने में।
जिसे दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती,
उसी के घर में अक्सर सबसे ज़्यादा हँसी होती।
ज़िंदगी ने हर मोड़ पर हिसाब माँगा मुझसे,
मैं मुस्कुराता रहा और कर्ज़ बढ़ता गया।
कितनी अजीब है ये शहरों की रौनक भी,
भीड़ लाखों की है मगर आदमी तन्हा है।
बेटियाँ घर की इज़्ज़त भी हैं और रौनक भी,
फिर भी लोग उन्हें बोझ कहने से नहीं डरते।
पति-पत्नी के झगड़ों में अक्सर यही देखा,
दोनों सही होते हैं मगर वक्त ग़लत होता है।
उम्र भर कमाते रहे मकान, गाड़ी और दौलत,
मरते वक्त बस एक गिलास पानी की प्यास रही।
जिसने जितना दर्द सहा, उतना ख़ामोश हुआ,
शहर का सबसे गहरा आदमी कम बोलता है।
आजकल लोग रिश्तों में वक़्त नहीं देते,
और उम्मीद करते हैं कि मोहब्बत ज़िंदा रहे।
बेरोज़गारी ने बच्चों से बचपन छीन लिया,
अब खिलौनों की जगह फ़ॉर्म भरे जाते हैं।
कुछ लोग थाली में नमक तक गिनते हैं,
और कुछ लोग दुख में भी शुक्र अदा करते हैं।
ज़िंदगी ने मुझे मिट्टी की तरह बरता है,
तभी हर ठोकर के बाद मैं और मज़बूत हुआ हूँ।
घर छोटा हो तो भी चल जाता है साहब,
बस दिलों में दरारें बड़ी नहीं होनी चाहिए।
हमने सीखा है फ़क़त इतना इस ज़माने से,
खुश वही लोग हैं जो कम में भी शुक्रगुज़ार हैं।
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