गुरुवार, 28 मई 2026

हनुमान गीत - ®डॉ. चंद्रकांत तिवारी

             हनुमान गीत 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


श्रीगुरु-चरन सरोज प्रणामी,

वंदौं पवनकुमार बलधामी।

रामदूत रुद्रावतारी,

संकट-मोचन मंगलकारी।


जय कपीश्वर महाबलशाली,

त्रिभुवन-वंदित कृपानिधि लाली।

भक्त-विपद हरने वाले,

दीन-दुखी उर में बसने वाले।


अंजनि-गर्भ दिवाकर-ज्योति,

प्रकटे बनकर शिव-प्रभु-शक्ति।

केसरी-गृह आनंद समाया,

देवगणों ने पुष्प बरसाया।


मंत्रोच्चार गगन में गूँजे,

ऋषि-मुनि सब चरणन पूजे।

वेदध्वनि जब नभ में छाई,

धरती पर शुभ बेला आई।


बाल-रवि को फल समझ धाए,

नभ-मंडल में शीघ्र समाए।

देवसभा विस्मित हो बोली,

“यह लीला अति अद्भुत भोली।”


इंद्र-वज्र जब शीश पे गिरा,

क्षणभर को त्रिभुवन था डरा।

पवनदेव क्रोधित हो आए,

प्राण-वायु जग से रुक जाए।


ब्रह्मा, विष्णु, महेश पुकारे,

देवसमूह चरणन पर डारे।

“अजर-अमर बलवान कहाओ,

भक्ति-शक्ति के दीप जलाओ।”


सूर्यदेव गुरु रूप में आए,

ज्ञान-सुधा के स्रोत बहाए।

वेद, व्याकरण, शास्त्र निराले,

उर में उतरे दिव्य उजाले।


विनय-शीलता संग बल भारी,

तेजपुंज छवि अति सुखकारी।

ऋषि-वचन का मान बढ़ाया,

सत्य-धर्म को हृदय बसाया।


ऋष्यमूक गिरि सुंदर छाया,

राम-लखन का दर्शन पाया।

ब्राह्मण-वेष धरे मुस्काए,

मधुर-वचन से मन हर लाए।


“कोमल चरण वनस्थलि धारे,

कौन वीर वन-पंथ तुम्हारे?”

राम-नाम जब कानन आया,

भक्ति-सागर उर में छाया।


नेत्र सजल पुलकित तन सारा,

राम-भक्ति बन जीवन-धारा।

चरणों में गिर दास कहाए,

प्रभु ने हर्षित उर से लगाए।


रामकाज को जीवन माना,

सेवा-धर्म अमृत पहचाना।

सुग्रीवहि पुनि मित्र बनाया,

भय का तम सब दूर भगाया।


बाली-दर्प धरा पर टूटा,

सत्य-सूर्य पुनि नभ में फूटा।

धर्मध्वजा फिर ऊँची लहराई,

सुग्रीवहि पुनि राज दिलाई।


सीतापति उर व्याकुल भारी,

माता-वियोग व्यथा अति भारी।

वानर-दल सब सोच में डोले,

जामवंत तब सत्य ही बोले।


“वीर हनूमान! बल तुम माहीं,

त्रिभुवन-मध्य सम कोउ नाहीं।”

सुनतहि जागा तेज अपारा,

गूँजा गिरि और सिंधु किनारा।


महेंद्राचल शिखर चढ़ि धाए,

राम-नाम उर भीतर गाए।

एकहि लाँघ सिंधु जलधारा,

काँपा नभ और जग सारा।


सुरसा आई राह निहारी,

परीक्षा चाही बल की भारी।

बुद्धि-विनय से पंथ निकाला,

भक्ति-बल का दीप उजाला।


सिंहिका तम-रूप विकराला,

क्षण में किया उसे निष्काला।

लंकिनी का मान गिराया,

लंका-द्वार प्रवेश बनाया।


स्वर्णपुरी अति दिव्य सुहानी,

पर अधर्म की छाया काली।

रात्रि-वेष धर नगर निहारा,

रावण-दर्प दिखा अंधियारा।


अशोक-वाटिका शोकमयी थी,

सीता-माता व्यथा भरी थीं।

राम-मुद्रिका जब दिखलाई,

आशा-ज्योति उर में समाई।


“माता! धीर धरो मन माहीं,

प्रभु बिन विलंब करैं अब नाहीं।”

वचन सुनत जनकसुता रोईं,

भक्ति-सुधा नयनों से धोईं।


फल-भक्षण कर वाटिका तोरी,

राक्षस-सेना भय से डोरी।

अक्षयकुमार रण में सोया,

लंका-दर्प धरा पर रोया।


मेघनाद नागपाश ले आया,

किन्तु न कपि-बल तनिक झुकाया।

रावण-दरबार मध्य पुकारा,

“रामदूत मैं सत्य हमारा।”


“त्यजि अभिमान रघुनाथहि मानो,

धर्ममार्ग अब शीघ्र पहचानो।”

रावण क्रोध-अग्नि में डोला,

पूँछ-दहन का आदेश बोला।


ज्वाला बन जब पूँछ प्रज्वलित,

लंका हुई क्षणमात्र दग्धित।

राम-नाम की महिमा भारी,

जल उठी स्वर्णमयी नगरी।


सिंधु लाँघि पुनि लौटे धाए,

सीता-संदेश संग ले आए।

राम-विरह के मेघ हटाए,

प्रभु-नयन आनंद भर आए।


“कपि! तुम सम प्रिय कोउ नाहिं,”

राम-वचन अमृत सम माहीं।

गले लगाकर मान बढ़ाया,

भक्ति-रत्न जग को दिखलाया।


सेतु-बंध जब आरंभाया,

शिला-शिला पर राम लिखाया।

जलनिधि ने शीश नवाया,

भक्ति-बल का मान बढ़ाया।


रणभेरी जब नभ में बाजी,

राक्षस-दल पर विपदा छाई।

वज्रांग बन रणभूमि धाए,

असुर-निकर सब काँप उठाए।


अतिकाय का दर्प मिटाया,

कालनेमि भयभीत बनाया।

जहाँ पड़े कपि-चरण तुम्हारे,

भागे संकट दूर किनारे।


लक्ष्मण मूर्छित भूमि पर सोए,

राम-वियोग नयनन से रोए।

द्रोणगिरि पर शीघ्रहि धाए,

संजीवनि संग पर्वत लाए।


देवगणों ने पुष्प बरसाए,

राम-लखन उर हर्ष समाए।

भक्ति-बल का यह प्रताप था,

राम-कृपा का दिव्य आलाप था।


रावण-वध पश्चात जग गाया,

रामराज्य पुनि धरा पर आया।

अयोध्या मंगलध्वनि छाई,

प्रेम-सुधा घर-घर मुस्काई।


राजसभा में विनय तुम्हारी,

सबसे ऊँची छवि सुखकारी।

सेवा को ही धर्म माना,

राम-नाम उर प्राण ठाना।


जहाँ गूँजता नाम तुम्हारा,

मिटता भय-दुःख-अंधियारा।

भूत-पिशाच निकट न आवैं,

हनुमत-नाम सुनत डर जावैं।


निर्बल को तुम बल दे देते,

भटके जन को राह दिखाते।

संकट में जो तुम्हें पुकारे,

कट जाएँ दुख उसके सारे।


विद्या-बुद्धि के तुम दाता,

भवसागर के दृढ़ त्राता।

लोभ-मोह का तम हर लेते,

सत्य-ज्योति उर में भर देते।


कलियुग-मध्य कृपालु दयाला,

भक्त-हृदय के दीप उजाला।

जहाँ स्मरण हनुमत का होता,

भय का बादल दूर ही होता।


तुम शिवशक्ति के अवतारी,

रामभक्ति के रखवाली।

तेज तुम्हारा सूर्य समाना,

करुणा गंगा-जल सम माना।


साधु-संत जब ध्यान लगावें,

हनुमत-नाम जपें सुख पावें।

तुम बिन कौन विपद हर लेता,

दुःख-सागर से पार उतारता।


जो नर सत्य-व्रत अपनाता,

हनुमत-कृपा सहज ही पाता।

कर्म-पथों पर अडिग जो रहता,

जीवन उसका सफल ही रहता।


तुमसे सीखे जग सेवा करना,

पीड़ित उर का भार हरना।

भूखे को अन्न-जल पहुँचाना,

रोते मन को धैर्य बँधाना।


बल केवल बाहु में ना हो,

बल मन का भी जाग्रत हो।

तुमने जग को ज्ञान बताया,

विनय सहित बल को अपनाया।


दंभ-दहन के दिव्य अग्नि हो,

भक्त-हृदय के पूर्ण चंद्र हो।

असत्य जहाँ विस्तार करेगा,

धर्म वहीं हुंकार भरेगा।


अंधकार जब जग में छाता,

मानव साहस खो सा जाता।

तब बजरंगी नाम तुम्हारा,

देता नवजीवन उजियारा।


शास्त्रों का गूढ़ ज्ञान तुम्हारा,

किन्तु सरल व्यवहार तुम्हारा।

महिमा जितनी ऊँची होती,

उतनी विनम्रता भी होती।


नारी-मान के दृढ़ रखवाले,

दीन-दुखी के सदा सहारे।

सीता-माता का दुःख हरने,

तुम लंका-पुर तक थे दौड़े।


जो अन्यायों से टकराए,

सत्य-धर्म की राह निभाए।

तुम उसकी ढाल बन जाते,

हर संकट से पार लगाते।


विद्यार्थी जब शीश नवाते,

हनुमत-चरणों में झुक जाते।

विद्या-बुद्धि सहज मिल जाती,

मन में नई प्रभा जग जाती।


रणभूमि में वीर जो जाए,

हनुमत-नाम हृदय में लाए।

भय का तम क्षणभर मिट जाता,

साहस-सूर्य प्रखर हो जाता।


गृहस्थ यदि श्रद्धा से गावें,

सुख-समृद्धि घर में आवें।

कलह-क्लेश सब दूर भगाते,

प्रेम-सुमन आँगन महकाते।


साधक यदि मन स्थिर कर ले,

हनुमत-ध्यान उर में धर ले।

चंचलता सब शांत हो जाती,

आत्म-ज्योति भीतर जग जाती।


तुमसे सीखे श्रम को मानें,

सत्य-वचन को उर में ठानें।

फल की चिंता दूर भगाकर,

सेवा-पथ पर रहें निरंतर।


जो आलस्य त्याग जगाता,

कर्मयोग का दीप जलाता।

उस पर कृपा तुम्हारी होती,

जीवन में सुख-धारा बहती।


वनवासी से राजमहल तक,

तुम सबके प्रिय निर्मल नितांत।

जाति-पांति का भेद मिटाते,

सबको प्रेम-गले लगाते।


दीनों के तुम दृढ़ आधार हो,

भक्तों के पालनहार हो।

अंधियारे में दीप जलाते,

टूटे मन को राह दिखाते।


रामदूत कहलाना प्यारा,

राजसिंहासन नहीं गंवारा।

सेवा में जो सुख तुमने पाया,

जग ने दुर्लभ उसे बताया।


तुम भारत की अमर धरोहर,

धर्मध्वजा के दृढ़ प्रहरीवर।

युग-युग तक गाथा गाई जाए,

हर जन तुमको शीश नवाए।


जब-जब संकट घोर घनेरा,

नाम तुम्हारा बनता सवेरा।

भक्त पुकारे प्रेम-भरे मन,

तुरत पहुँचते पवननंदन।


भूत-प्रेत बाधा मिट जाती,

हनुमत-कृपा जहाँ बरसाती।

रोग-शोक सब दूर भगाते,

साहस के नव दीप जलाते।


लोभ-मोह का जाल जलाते,

मन में निर्मल भाव जगाते।

क्रोध-द्वेष सब दूर भगाकर,

प्रेम-सुधा उर में भरते।


जो प्रतिदिन गाथा को गाए,

मन में श्रद्धा-ज्योति जलाए।

उसके कष्ट स्वयं मिट जाएँ,

जीवन में मंगल ही आएँ।


दरिद्रता का तम हर लेना,

सद्बुद्धि का दीपक देना।

सत्य-धर्म में दृढ़ कर देना,

मानवता से उर भर देना।


हे महावीर कृपा बरसाओ,

हर प्राणी को गले लगाओ।

भय-अन्याय अधर्म मिटाओ,

भारत-भूमि पुनः महकाओ।


गंगा-जल सी निर्मल भक्ति,

सूर्य-सम प्रखर रहे शक्ति।

हर जन में सद्भाव जगाना,

सेवा का संकल्प दिलाना।


जब तक नभ में चंदा-तारा,

जब तक बहती गंग-धारा।

तब तक गूँजे नाम तुम्हारा,

जय-जय हनुमत वीर हमारा।


राम-नाम उर भीतर बसता,

हनुमत-भक्त कभी न डरता।

भवसागर का पार वही है,

जिसके संग तुम्हारी कृपा है।


संकट-मोचन नाम तुम्हारा,

हरता भव का अंधियारा।

दीन-जनों के तुम रखवाले,

रामभक्ति के दीप निराले।


जय अंजनि-सुत वीर हनुमाना,

जय पवनसुत महाबलवाना।

सिद्धि-बुद्धि के दिव्य दाता,

भक्त-हृदय के परम त्राता।


तुमसे जीवन ज्योति पाता,

भटका मानव राह को पाता।

भक्ति-शक्ति का वर दे देना,

सत्य-पथों पर दृढ़ कर देना।


अंत समय जब प्राण डगमग,

नाम तुम्हारा देता संबल।

राम-नाम के साथ तुम्हारा,

हो जाता भवसागर पारा।


हर मंदिर में दीप जलेंगे,

हनुमत-गुण जब गाएंगे।

हर जन के अंतरमन में,

रामराज्य फिर आएगा।


सत्य अहिंसा धर्म बचाना,

निर्बल जन का साथ निभाना।

यही तुम्हारा दिव्य संदेश,

यही सनातन धर्म विशेष।


हे कपिराज कृपानिधि स्वामी,

तुम बिन कौन बने हितकारी।

जीवन-पथ पर साथ निभाना,

हर संकट से पार लगाना।


राम-भक्ति अमृत बरसाओ,

कलुष-द्वेष सब दूर भगाओ।

हर हृदय में प्रेम जगाना,

मानव को मानव बनाना।


जय-जय-जय हनुमत बलधारी,

जय संकटहरण हितकारी।

रामदूत रुद्रावतारी,

भक्त-जनों के मंगलकारी।



जय श्री राम जय जय राम 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


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