पहाड़ का दर्द ..!
सुनो दाज्यू और भैजी....
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
पत्थर की छतों पर
अब धूप नहीं उतरती,
सीमेंट की दीवारों ने
आकाश का हिस्सा खरीद लिया है।
जहाँ कभी
काफल की डालियों पर
बचपन झूलता था,
वहाँ अब मोबाइल टावर खड़े हैं
और पक्षियों की जगह
नेटवर्क के सिग्नल चहकते हैं।
यार !
पहाड़ अब भी वहीं है,
पर पहाड़ का मन
कहीं खो गया है।
कभी गाँव की पगडंडी
दादी की कहानी थी,
आज वह सड़क बनकर
शहर की ओर भाग रही है।
पहले घरों के दरवाजे
सुबह की तरह खुले रहते थे,
अब हर चौखट पर
लोहे के ताले हैं
और हर चेहरे पर
अदृश्य पहरेदार।
शहर में
रोशनी बहुत है,
पर उजाला कम।
गाँव में
सुविधाएँ कम थीं,
पर मन के आँगन बड़े थे।
आज महानगर की ऊँची इमारतें
आकाश को छूने का दावा करती हैं,
किन्तु उनमें रहने वाले लोग
एक-दूसरे तक नहीं पहुँच पाते।
लिफ्टें ऊपर चढ़ती हैं,
रिश्ते नीचे उतरते हैं।
सड़कों पर
गाड़ियों का समुद्र बहता है,
पर आदमी
अपने भीतर के रेगिस्तान में
प्यासा खड़ा है।
पहाड़ में
दो सूखी रोटियों के साथ
हँसी परोसी जाती थी,
शहर में
सजे हुए भोजन के बीच
अकेलापन बैठा रहता है।
पहले
दूध के गिलास पर
भाई-बहनों की नोंकझोंक थी,
अब
जायदाद के कागजों पर
अदालतें खड़ी हैं।
पहले
माँ के हाथों की रोटी
घर की धड़कन थी,
अब
ऑनलाइन ऐप से आया भोजन
पेट भरता है,
स्मृतियाँ नहीं।
दादी की झुर्रियाँ
कभी जीवन का विश्वविद्यालय थीं,
आज
बुज़ुर्गों के अनुभव
डिजिटल शोर में
म्यूट कर दिए गए हैं।
शहर में
समय घड़ी की सुइयों में दौड़ता है,
गाँव में
वह कभी बैलों की चाल से चलता था।
अब
बच्चे मिट्टी से नहीं खेलते,
स्क्रीन पर उँगलियाँ फेरते हैं।
उनकी आँखों में
तितलियों की जगह
पासवर्ड रहते हैं।
उनके सपनों में
नदी नहीं बहती,
डेटा बहता है।
पहाड़ की नदी
आज भी गा रही है,
पर उसे सुनने वाले कान
हेडफोन में कैद हैं।
वृक्षों की छाया
धीरे-धीरे कट रही है,
और मनुष्यता की छाया भी।
नदियाँ सिकुड़ रही हैं,
जैसे रिश्तों का जलस्तर।
पहाड़ से शहर तक
पलायन की एक लंबी नदी बह रही है,
जिसके किनारे
खाली होते घर
अपने लोगों को पुकारते हैं।
बंद खिड़कियाँ
प्रतीक्षा के स्मारक बन गई हैं।
सूने आँगन में
उग आई घास
समय की चुप्पी लिखती है।
कभी
शंख और घंटियों की ध्वनि
सुबह जगाती थी,
अब
मोबाइल का अलार्म
नींद से अधिक बेचैनी जगाता है।
पहाड़ के देवदार
अब भी खड़े हैं,
पर मनुष्य की जड़ें
ढीली पड़ गई हैं।
हमने
सुविधाओं के लिए
संबंध खो दिए।
गति के लिए
गहराई खो दी।
सूचनाओं के लिए
अनुभूतियाँ खो दीं।
और विकास के लिए
कभी-कभी
अपना ही घर खो दिया।
फिर भी
पहाड़ केवल भूगोल नहीं है,
वह स्मृति है।
वह मनुष्य के भीतर बची हुई
आखिरी हरियाली है।
जब भी
शहर का धुआँ
आत्मा को ढक लेता है,
जब भी
भीड़ के बीच
अकेलापन चीखने लगता है,
जब भी
कंक्रीट के जंगल
साँसों पर बोझ बन जाते हैं,
तब
मन के किसी कोने से
एक पुरानी आवाज आती है—
"यार" !
पहाड़ में दिन कितने अच्छे थे...!
और तब लगता है,
कि पहाड़
कहीं बाहर नहीं,
वह अब भी
हमारी स्मृतियों,
हमारी भाषा,
हमारी करुणा,
और हमारे बचे हुए मनुष्यत्व में
धीरे-धीरे साँस ले रहा है।


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