प्रकृति और मनुष्य का टूटता संबंध
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 
मिट्टी से मशीन तक : संवेदनाओं का सूखता संसार -
मनुष्य और प्रकृति का संबंध केवल उपयोग का संबंध नहीं था; वह आत्मा और श्वास का संबंध था। कभी मनुष्य धरती को माँ कहता था, नदियों को बहन, वृक्षों को देवता और पर्वतों को धैर्य का प्रतीक मानता था। सुबह की पहली किरण जब खेतों पर उतरती थी, तो किसान के चेहरे पर उम्मीद खिलती थी। पक्षियों का कलरव केवल ध्वनि नहीं था, वह जीवन की लय थी। हवा केवल बहती नहीं थी, वह मनुष्य के थके हुए मन को सहलाती थी। वर्षा की बूंदें केवल पानी नहीं थीं, वे सूखी आत्मा पर गिरती हुई सांत्वना थीं। प्रकृति मनुष्य के भीतर रहने वाली उस कोमलता का विस्तार थी, जो उसे मनुष्य बनाती थी। लेकिन आधुनिक समय में यह रिश्ता धीरे-धीरे टूटने लगा है। मनुष्य ने विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति को संसाधन समझ लिया, संवेदना नहीं। उसने नदियों को नालों में बदल दिया, जंगलों को कंक्रीट के जंगलों में और खेतों को उद्योगों की धूल में खो दिया। अब शहरों में सुबह होती है, पर पक्षियों की आवाज़ नहीं आती; वर्षा होती है, पर मिट्टी की वह सुगंध नहीं उठती जो आत्मा को भिगो देती थी। मनुष्य ने अपने चारों ओर ऊँची इमारतें तो खड़ी कर लीं, पर भीतर की हरियाली खो दी।
बिखरते रिश्तों के बीच जीवन की नई दिशा -
फिर भी पूरी तरह अंधकार नहीं है। प्रकृति अब भी मनुष्य को पुकार रही है। वह हर सुबह सूरज के रूप में लौटती है, हर शाम हवा के झोंकों में संदेश देती है कि अभी भी संबंधों को बचाया जा सकता है। जब कोई थका हुआ व्यक्ति किसी पेड़ की छाया में बैठता है, तो उसे एक अनकही शांति मिलती है। जब कोई नदी किनारे खड़ा होकर बहते जल को देखता है, तो उसके भीतर जमी हुई उदासी धीरे-धीरे पिघलने लगती है। प्रकृति आज भी मनुष्य को जीवन का सबसे बड़ा सत्य सिखाती है—संतुलन का सत्य। वृक्ष बिना भेदभाव के छाया देते हैं, नदियाँ बिना अपेक्षा के बहती हैं, फूल बिना किसी पुरस्कार के खुशबू बाँटते हैं। प्रकृति का पूरा संसार त्याग, धैर्य और सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाता है। यदि मनुष्य इस भाषा को फिर से समझ ले, तो शायद उसका बिखरता हुआ जीवन फिर से जुड़ सकता है।
आज आवश्यकता केवल पर्यावरण बचाने की नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा बचाने की है। यदि प्रकृति नष्ट होगी, तो मनुष्य भी भीतर से नष्ट हो जाएगा। इसलिए हमें केवल वृक्ष लगाने की औपचारिकता नहीं करनी, बल्कि वृक्षों से प्रेम करना सीखना होगा। नदियों को केवल संसाधन नहीं, जीवन की धड़कन समझना होगा। बच्चों को फिर से मिट्टी से जोड़ना होगा, ताकि वे केवल सफल मनुष्य नहीं, संवेदनशील मनुष्य बन सकें। आधुनिकता आवश्यक है, पर ऐसी आधुनिकता जो प्रकृति को साथ लेकर चले, उसे कुचलकर नहीं। विकास तब तक अधूरा है, जब तक उसमें हवा की स्वच्छता, जल की पवित्रता और धरती की हरियाली सुरक्षित न हो।
मनुष्य और प्रकृति का संबंध टूटेगा, तो अंततः मनुष्य स्वयं अपने अस्तित्व से टूट जाएगा। क्योंकि प्रकृति बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर भी रहती है। जब पेड़ कटते हैं, तो मनुष्य के भीतर का धैर्य कटता है; जब नदियाँ प्रदूषित होती हैं, तो मनुष्य के विचार भी प्रदूषित होते हैं। इसलिए समय की सबसे बड़ी पुकार यही है कि मनुष्य फिर से प्रकृति की ओर लौटे। वह मिट्टी को केवल धूल न समझे, बल्कि अपने अस्तित्व की जड़ माने। वह हवा को केवल गैस न समझे, बल्कि जीवन का स्पर्श माने। प्रकृति से जुड़ना केवल पर्यावरण बचाना नहीं, बल्कि अपने भीतर बचे हुए मनुष्य को बचाना है। शायद इसी लौटने में भविष्य की सबसे बड़ी आशा छिपी है, जहाँ मनुष्य फिर से वृक्षों की छाया में शांति खोजेगा, नदियों के संगीत में अपने टूटे हुए मन को जोड़ेगा और प्रकृति की गोद में जीवन की नई दिशा पाएगा।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें