सीमांत के बादल
(कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
धारचूला की भोर में
जब काली नदी
नीले शंख-सी बजती है,
तब सीमांत के बादल
धीरे-धीरे उतरते हैं
ओम पर्वत की श्वेत देह पर
मानो किसी ऋषि ने
आकाश पर मंत्र लिख दिए हों।
दार्चुला की पहाड़ियों में
धूप तिब्बती घंटियों-सी काँपती है,
और चौदास घाटी के बुग्यालों पर
हवा, देवदार की बाँसुरी लेकर
अनकहे गीत गाती चलती है।
आदि कैलाश के सम्मुख
मेघ कभी तपस्वी बन जाते हैं,
कभी यक्षिणी के केशों जैसे
धरमा घाटी में बिखर जाते हैं।
उनकी छाया में
भेड़ों के झुंड
चलते हैं जैसे
धरती पर बहती हुई श्वेत प्रार्थनाएँ।
नारायण आश्रम की सीढ़ियों पर
शाम उतरती है
केसर और धुएँ के रंग में,
जहाँ हिमालय
अपने ही मौन का दीप जलाता है।
गुंजी और नाभी के घरों से
उठता है लकड़ियों का धुआँ,
और आकाश
अपनी भीगी चादर फैलाकर
बच्चों की हँसी समेट लेता है।
बलुवाकोट की ढलानों पर
रात जब
सितारों की राख बिखेरती है,
तब छारछुम के संगम में
नदियाँ
चाँदी के घुँघरू पहन
अँधेरे को नाच सिखाती हैं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर
चलते यात्रियों के चरणों में
बर्फ पिघलती है
जैसे समय स्वयं
भक्ति बनकर बह रहा हो।
व्यास घाटी के ऊँचे शिखरों पर
सीमांत के बादल
कभी माँ के आँचल-से लगते हैं,
कभी विरही के नेत्रों की नमी,
कभी रणभूमि से लौटे सैनिक की
मौन थकान जैसे।
ओ बादलो!
तुम्हीं ने देखा है
इन सीमांत गाँवों का अकेलापन,
जहाँ पहाड़
अपने भीतर सदियों का लोकगीत छिपाए
धीरे-धीरे बूढ़े होते हैं।
तुम जब बरसते हो
तो चीड़ों के वन
मृदंग बन जाते हैं,
और समूचा हिमालय
एक विशाल राग की तरह
धरती पर गूँज उठता है।
तब लगता है—
यह केवल प्रकृति नहीं,
यह सीमांत का हृदय है,
जो मेघों की वीणा पर
अनश्वर गीत बनकर
आज भी गा रहा है।
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