रविवार, 24 मई 2026

हिमालय की चन्द्रवेला ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 हिमालय की चन्द्रवेला

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


नील गगन की मौन झील में पूर्णशशि जब उतर गया,

हिमगिरि के शुभ्र कपोलों पर स्वर्णिम स्वप्न बिखर गया।

देवदारु की दीर्घ भुजाएँ पवन-वीणा बन झूम उठीं,

चीड़ों की चिर श्वासों में वन-गाथाएँ फिर घूम उठीं।


दूर कहीं निर्झर की ध्वनि में वेदों का संगीत जगा,

जुगनू की सूक्ष्म ज्योति तले रजनी का अतीत जगा।

काली शैल की गहरी चुप्पी गोरी धारा गुनगुनाती,

पत्थर-पत्थर से टकराकर जीवन का संदेश सुनाती।


अचानक मेघों के रथ पर विद्युत् का अश्व उतर आया,

तूफानी पवनों ने फिर वन-उपवन में तांडव गाया।

फिर वर्षा की कोमल बूँदें प्यासे पल्लव सहलाने लगीं,

मिट्टी की सोंधी गंधों में भूली स्मृतियाँ गाने लगीं।


प्रथम प्रभाकर की रश्मियों ने जब हिम-जटाएँ चूम लीं,

उषा स्वयं कैलास-द्वार पर स्वर्णिम आरती घूम ली।

गौ-बंशी की दूर तान में जाग उठा पर्वत का मन,

घाटी-घाटी गूँज उठा फिर प्रकृति-प्राण का मधुर वचन।


हिमालय केवल पर्वत नहीं—मौन ऋषियों की वाणी है,

प्रकृति स्वयं परमात्मा की अनदेखी अमृत-कहानी है।

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