मर्यादा के मेघ-मुकुट : श्री राम🙏🕉️
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
नील नभों में नीरव गाथा, शशि-सा शीतल नाम,
वन-पथ पर दीपक बन चलते, रघुवर श्रीराम।
स्वर्ण सिंहासन धूलि हुआ जब सत्य पुकारा था,
राजमहल से अधिक उन्हें वन का पथ प्यारा था।
मुकुट छोड़ कर मौन तपस्या का वरण किया,
अपने ही अंतर में जीवन का चरण लिया।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
कैकेयी के कठोर वचन भी करुणा बन बहते,
वज्र-वेदना पीकर भी वे कमल-नयन रहते।
अधरों पर संध्या-सी शांति, दृग में गंगाजल,
पीड़ा को भी पूजित करते जैसे कोई पल।
चंदन-वन की छाया जैसे तन पर उतर गई,
अयोध्या रोई, किंतु राम की वाणी निखर गई।
त्यागों की पदचापों से पथ पुष्पित हो जाता,
राम जहाँ भी चल पड़ते, दुःख ज्योतिर्मय गाता।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
सीता संग वन की नीरवता वीणा बन गूँजी,
लक्ष्मण की प्रत्यंचा में भी करुणा ही पूजी।
पर्णकुटी में चंद्र उतरकर कथा सुनाने आता,
सरयू का हर तीर स्वयं प्रभु का गुण गाता।
वन के शुष्क वृक्षों में भी हरियाली झरती,
राम-दृष्टि पड़ते ही मिट्टी तक चंदन करती।
निषादराज के अश्रु हुए जब गंगाजल निर्मल,
तब मानवता ने पहना था प्रेमाभिषिक्त आँचल।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
मर्यादा के मूक हिमालय, धैर्य-दीप अविचल,
जिनके चरणों से पावन हो जाती हर हलचल।
रण में भी जिनकी करुणा ने क्रोधों को हर डाला,
रावण के पतन में भी मानव-धर्म संभाला।
वे केवल धनुर्धर ही थे— ऐसा कहना कम है,
उनके भीतर वेदों जैसा गंभीर परम दम है।
अग्नि-ज्योति-सा तप था जिनमें, जल-सा कोमल मन,
एक हृदय में साथ बसे थे शस्त्र और सावन।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
अश्रु जिन्हें छूकर निर्मल तीर्थों में ढल जाते,
पथराए अंतर भी जिनको सुनकर पिघल जाते।
उनकी वाणी में था जैसे तुलसी का आलोक,
शब्द-शब्द में झरता रहता था करुणा का श्लोक।
राज्य नहीं— जनमन का विश्वास बड़ा होता,
कर्मों से ही मानव का आकाश खड़ा होता।
राम इसी सत्याग्नि के दिव्य शिखर कहलाए,
अपने दुख को त्याग जगत के आँसू अपनाए।
वनवासों के वटवृक्षों पर स्वर्ण प्रभात उगा,
मर्यादा का सूर्य धरा के अंचल में जगा।
युग बीतें, पर राम अभी भी मानव में जीवित,
जब-जब धर्म डगमग होता, उनका स्वर दीक्षित।
“धर्म जहाँ हो, वहीं राम हैं।”
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