बुधवार, 27 मई 2026

सीमांत पर धूप और मेघों का राग (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी ......

सीमांत पर धूप और मेघों का राग

(कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी ......



धारचूला की भोर में

काली नदी

नीले पारदर्शी कांच-सी चमकती बहती है,

और दार्चुला नेपाल की ढलानों से

धूप

सोने के हजारों सिक्कों-सी

पहाड़ों पर ओस के मोती-सी बिखर जाती है।


ओम पर्वत के हिम-मस्तक पर

मेघ

कभी जटाधारी साधु की

काली दाढ़ी लगते हैं,

कभी नागफनों-से लहराते

अँधेरे सर्प,

जो शिखरों की देह पर

धीरे-धीरे सरकते रहते हैं।


आदि कैलाश के निस्तब्ध प्रदेश में

सूरज

पिघले हुए ताँबे की तरह

चट्टानों पर फैलता है,

और चौदास घाटी के बुग्यालों में

हवा

ऊन की सफेद चादरों-सी

धरती को ढँक लेती है।


दारमा घाटी की संकरी पगडंडियों पर

छायाएँ

कभी यक्षिणी के खुले केश लगती हैं,

कभी किसी बूढ़े चरवाहे का

फटा हुआ काला कंबल,

जिसमें सदियों की ठंड

अब भी दुबकी बैठी है।


व्यास घाटी के ऊपर

बादल

लोहे की चलती हुई दीवारों जैसे

धीरे-धीरे उमड़ते हैं,

और उनके पीछे

धूप

चाँदी के टूटे हुए कंगनों-सी

आकाश में झनकती रहती है।


मुनस्यारी की ओर

जब पंचाचुली

संध्या में अंगारों-सी धधकती है,

तब गोरी नदी

पत्थरों के बीच

काँच की चूड़ियों-सी बजती हुई

दूर तक चली जाती है।

काली नदी 


बलुवाकोट की ढलानों पर

बरसाती धुंध

ऐसे उतरती है

मानो किसी ने

देवदारों के कंधों पर

राख से बुना शॉल रख दिया हो।


जौलजीबी के संगम में

काली और गोरी

दो स्मृतियों की तरह मिलती हैं,

एक गहरी,

एक उजली,

पर दोनों के जल में

पहाड़ों का अकेलापन

समान रूप से काँपता रहता है।


आदि कैलाश यात्रा मार्ग पर

चलते यात्रियों के चेहरों पर

धूप

कभी दीपावली के दीयों-सी झिलमिलाती है,

कभी तपते हुए पीतल-सी

आँखों में उतर आती है।




और जब सीमांत के गाँवों पर

रात

अपने भीगे काले परदे गिराती है,

तब हिमालय

एक वृद्ध संत की तरह

मौन बैठा रहता है—

जिसकी पलकों पर

अब भी

मेघों की थकी परछाइयाँ

धीरे-धीरे सो रही होती हैं।

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