बुधवार, 20 अगस्त 2025

महादेव का डमरू (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

महादेव का डमरू (कहानी) 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 


कैलाश की श्वेत शिखर-मालाएँ रात के अंधेरे में स्वर्णाभ चमक रही थीं। चंद्रमा का दूधिया प्रकाश जब बर्फ की परतों पर बिखरता, तो ऐसा लगता मानो स्वयं चंद्रशेखर अपनी जटाओं से अमृत झर रहे हों। देवदार और चीड़ के वृक्षों पर ठहरी बर्फ की शांति वैसी ही थी जैसी स्थाणु की अचलता—जो काल और परिस्थिति के पार खड़ी रहती है। हवा शाखाओं से टकराकर गूँजती तो लगता मानो किसी अदृश्य स्वर में महाकाल का उद्घोष हो रहा हो, और झरनों की कल-कल लय, शिलाओं की निस्तब्धता के साथ मिलकर आदियोगी का शाश्वत संगीत रच रही हो।

आकाश के तारे हिमालय की धवल शिखाओं पर बिखरे स्वर्ण कण जैसे चमकते, मानो त्रिलोचन की तीसरी आँख से झरते दिव्य नक्षत्र हों। बर्फ की ढलानों पर चाँदनी की आभा ऐसी प्रतीत होती जैसे शशिभूषण का मस्तक धरती पर अपनी आभा बिखेर रहा हो। हिमगुफाओं से उठती श्वेत धुंध में ऐसा लगता जैसे महेश्वर की श्वासें ब्रह्मांड में विलीन होकर आकाश से संवाद कर रही हों। मंद-मंद बहती बयार में देवदार की सुगंध घुलकर ऐसा आभास देती मानो गंगाधर की धारा हवा के साथ झर रही हो। दूर हिमशिखरों से दूध जैसी धाराएँ बहतीं, तो प्रतीत होता जैसे स्वयं शम्भु करुणामयी अंचल खोलकर जगत को आशीष दे रहे हों।

पूरा दृश्य केवल सौंदर्य का नहीं, बल्कि संकेत का चित्र था—मानो प्रकृति स्वयं कह रही हो कि कोई अदृश्य शक्ति अपने विराट आगमन की तैयारी कर रही है। हर बर्फ का कण भूतनाथ का स्तवन कर रहा था, हर तारा महेश्वर की झलक बन चमक रहा था, और हर हवा की लहर महाकालेश्वर के नाद में बदल रही थी। यह समूची वसुंधरा, यह आकाश, यह निस्तब्धता—सब मिलकर पर्दा उठा रहे थे उस अनन्त नाटक का, जिसमें प्रवेश करने वाले थे स्वयं नटराज। और तभी वातावरण में पहली बार गूँजी वह थाप, जो न केवल समय को चीरती थी बल्कि अनन्तता का उद्घोष करती थी—“ॐ नमः शिवाय।”

महादेव इस विराट निस्तब्धता के केंद्र में अविचल ध्यानमग्न बैठे थे। उनके आगमन से मानो सम्पूर्ण प्रकृति अपनी श्वास रोककर खड़ी हो गई हो। उनके विशाल कंधों पर बर्फ के शिखरों की उज्ज्वल आभा विराजमान थी और उनकी जटाओं से झरते गंगाजल की बूँदें धरती को ऐसे सींच रही थीं जैसे ब्रह्मांड का अमृत टपक रहा हो। हिमालय की चोटियाँ उनकी पीठ के पीछे प्रहरी की तरह खड़ी थीं, और आकाश उनके ललाट का तिलक बन गया था।

वातावरण में अचानक एक भयंकर गंभीरता उतर आई। पहाड़ों की दरारों से गर्जन की ध्वनियाँ निकलने लगीं, मानो शिलाएँ स्वयं अपने भीतर छिपे रहस्यों को उद्घाटित करने लगी हों। आकाश में घूमते बादल बिजली की तलवारें चमकाने लगे और ऐसा प्रतीत हुआ मानो सृष्टि स्वयं किसी अदृश्य युद्ध की तैयारी कर रही हो। देवदार के वृक्ष हवा से काँप उठे, उनकी शाखाएँ किसी अज्ञात भय में करुण स्वर निकालने लगीं। दूर के झरनों की गर्जना भी एकाएक तीव्र हो गई, जैसे उनके भीतर की धाराएँ महादेव के स्वरूप को प्रणाम कर रही हों।

उनकी आँखों में शून्य की गहराई और अग्नि की दहकन साथ-साथ दिखाई देती थी। उनके चरणों के पास बैठा नंदी अचल पर्वत जैसा स्थिर था, पर उसकी आँखों में गर्व और श्रद्धा की ज्वाला नृत्य कर रही थी। उनके कंठ से निकलती मंद ध्वनि में समुद्र की गरज, अग्नि की चटकन और आकाश की गूँज समाहित थी।

और फिर—उनके हाथों में वह डमरू था, जिसकी एक थाप सृष्टि को हिला देने की सामर्थ्य रखती है। जब उन्होंने उसे उठाया, तो ऐसा लगा मानो समय अपनी धड़कन भूल गया हो। पर्वत हिल उठे, नदियाँ ठिठक गईं, हवाएँ सन्नाटे में बदल गईं, और वृक्षों ने अपनी शाखाएँ फैला दीं—मानो समस्त सृष्टि इस दिव्य ध्वनि के आलाप में सम्मिलित होने के लिए उतावली हो उठी हो।

स्वर्गलोक में जैसे ही डमरूकेश्वर महादेव की ध्वनि पहुँची, इन्द्रसभा की चकाचौंध अचानक काँच के महल की तरह दरकने लगी। सोने की दीवारें तड़ककर अपनी आभा खो बैठीं, इन्द्रासन हिल उठा मानो उसके नीचे की नींव ही खोखली हो गई हो। देवगण, जो अपने पद और अधिकारों की मखमली चादर में लिपटे हुए बैठे थे, अचानक ऐसे तिलमिला उठे जैसे किसी ने उनकी असलियत का नकाब नोच लिया हो।

अप्सराओं का नृत्य बीच आकाश में ही थम गया। उनके पाँव की पायलें बेसुरी होकर ऐसे झंकारने लगीं जैसे टूटे हुए वाद्ययंत्र। गीतों की तान अचानक बेमानी लगने लगी—मानो मधुरता का आवरण उतरते ही नग्न शोर बचा रह गया हो। स्वर्ण-मोती की चमक उस ध्वनि के आगे ऐसे लगने लगी जैसे मिट्टी में फेंके हुए काँच के टुकड़े।

इन्द्र का मुकुट डगमगाने लगा, और उसकी आँखों में पहली बार वह भय उतर आया जिसे वह सामान्यतः केवल मनुष्यों पर फेंकता था। देवता आपस में फुसफुसाकर पूछने लगे—“यह कैसी ध्वनि है जो हमें भीतर से खाली कर रही है? यह क्यों हमें हमारे ही वैभव पर संदेह करा रही है?” उनकी बेचैनी इस बात का प्रमाण थी कि डमरू की थाप ने उनके मनोमंदिर की दीवारें हिला दी थीं।

वह ध्वनि एक व्यंग्य बनकर उनके कानों में गूँजी—
“हे इन्द्र! तुम्हारा स्वर्ग केवल सजे हुए मंच का दृश्य है, वास्तविकता नहीं। तुम्हारा गर्व उसी तरह क्षणभंगुर है जैसे बादलों में बिजली की चमक, जो पल भर में बुझ जाती है। तुम्हारे रत्न, तुम्हारी आभा, तुम्हारी सत्ता—सब एक नाटक है, और यह नाटक डमरू की पहली थाप में ही धराशायी हो सकता है।”

स्वर्ग की दीवारों पर यह व्यंग्यात्मक प्रतिध्वनि ऐसे गूँज रही थी मानो ब्रह्मांड स्वयं आईना पकड़कर कह रहा हो—
“जिस वैभव को तुम अनंत समझते हो, वह महज सजावट है; असली स्वर्ग वहाँ है जहाँ नदी की धारा करुणा बनकर बहती है, जहाँ वनों की हरियाली जीवन की साँसें सँभालती है, और जहाँ बर्फ की श्वेतता में निस्पृहता की पवित्रता चमकती है।”

इन्द्रसभा में बैठे देवता पहली बार समझ रहे थे कि उनका भय वास्तव में सिंहासन खोने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के शून्य से सामना करने का है।

मानव लोक में डमरूकेश्वर महादेव की थाप पहुँची तो वह किसी साधारण ध्वनि की तरह नहीं थी, बल्कि जैसे ब्रह्मांड ने एकाएक “फायर अलार्म” बजा दिया हो। शहरों की नीऑन लाइटें, जो रात को कृत्रिम दिन में बदल देती थीं, उस ध्वनि के सामने ऐसे बुझीं जैसे परीक्षा में नकल करते पकड़े गए छात्र अचानक बेंच पर झुक जाते हैं। गाड़ियों के हॉर्न, इंजन और ब्रेक की चीख उस गूँज में ऐसे थरथराने लगे मानो सारा यातायात खुद अपने पापों का चार्ट बनाकर ब्लैकबोर्ड पर टाँग दिया हो।

फैक्ट्रियों की चिमनियाँ, जो हर पल धुआँ उगलती थीं, डमरू की थाप पर खाँसते-खाँसते हाँफने लगीं। ऐसा लगा मानो खुद मशीनें यह स्वीकार कर रही हों कि वे सिर्फ प्रगति के नाम पर प्रदूषण की पर्ची बाँट रही थीं। नदियाँ, जिन्हें बाँधों की जंजीरों में जकड़ा गया था, अचानक बिफरकर गरज उठीं—“तुमने हमें कैद किया है, पर हर बूँद में विद्रोह है। हम वह विद्यार्थी हैं जिसे दबाया गया है, पर एक दिन यही बगावत पूरी कक्षा को हिला देगी।” जंगलों के ठूँठ, जो मौन गवाही देते खड़े थे, वे इस नाद में बोल उठे—“हमारी जड़ों को काटकर तुमने जो सभ्यता गढ़ी है, वही तुम्हारा प्रश्नपत्र बनेगी, और इस परीक्षा में तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं होगा।”

राजनीति की सभाओं में भूचाल आ गया। नेता अपने खोखले भाषणों से जनता को बहलाने लगे, पर डमरू की तान ने उनके वक्तव्यों को ऐसे उड़ा दिया जैसे किसी छात्र की कॉपी पर लाल स्याही से लिख दिया गया हो—“फेल।” उनकी नीतियाँ बर्फ पर लिखी घोषणाओं की तरह दिखने लगीं, जो धूप आते ही गायब हो जाती हैं।

मीडिया के पन्ने और स्क्रीन इस नाद के व्यंग्य में हँसने लगे। अखबारों की सुर्खियाँ अपने ही अक्षरों पर तंज कसने लगीं—“सत्य को दबाकर छापा नहीं जा सकता, जैसे गणित का गलत हल सौ बार लिखकर भी सही नहीं होता।” टीवी की बहसें, जिनमें एंकर शोर को ज्ञान समझकर परोसते थे, डमरू की गूँज में ऐसे लगने लगीं जैसे माइक से उल्टा करंट गुजर गया हो।

छात्र, जो इस सारे दृश्य को देखते हुए पीढ़ियों के भविष्य का गणित हल करने की कोशिश कर रहे थे, भीतर से काँप उठे। डमरू का हर नाद उन्हें यह समझा रहा था कि यह सभ्यता किसी प्रयोगशाला का असफल प्रयोग है—जहाँ मशीनें तो बनीं, पर मनुष्यता का “डेटा” खो गया। यह गूँज छात्रों को ऐसे सावधान कर रही थी जैसे परीक्षा हॉल में घंटी बजने से पहले चेतावनी दी जाती है—“समय कम है, उत्तर खोज लो, वरना कॉपी अधूरी रह जाएगी।”

महादेव का डमरू यहाँ महज़ वाद्य नहीं था, बल्कि एक क्वांटम चेतावनी था। उसने मानवलोक को दिखा दिया कि उनके सारे षड्यंत्र, चालाकियाँ और तकनीकी चमत्कार उस गूँज के आगे खिलौने हैं। यह नाद भयावह भी था और करुण भी—जैसे कोई शिक्षक आखिरी बार छात्र से कह रहा हो—
“पढ़ लो बेटा, वरना यह सृष्टि तुम्हारे नालायकी के लिए शून्य अंक लिख देगी।”

पाताल लोक में अंधकार पसरा था। यह अंधकार कोई साधारण अँधेरा नहीं था, बल्कि जैसे किसी “ब्लैक-हैट हैकर” का सर्वर रूम हो जहाँ षड्यंत्र डेटा पैकेट्स बनकर घूम रहे हों। नाग और असुर गुफाओं की दरारों में अपने योजनाओं की कोडिंग कर रहे थे—किस तरह तीनों लोकों के सिस्टम में घुसपैठ की जाए, कैसे “ट्रोजन” डालकर सत्ता को हैंग कर दिया जाए। उनकी फुसफुसाहटें वैसी थीं जैसे इंटरनेट के अंधेरे कोनों में गूँजती हुई डार्क वेब की गुप्त चैट।

तभी महादेव के डमरू की थाप वहाँ पहुँची।
वह कोई साधारण आवाज़ नहीं थी, बल्कि जैसे कॉस्मिक साउंड वेव ने फायरवॉल तोड़कर सीधा हैकिंग रूम में एंट्री मार दी हो।

अंधकार चीरकर वह ध्वनि गुफाओं में टकराई तो नागों के फन काँप उठे। उनकी आँखें वैसी फड़फड़ाईं जैसे किसी साइबर अपराधी की स्क्रीन अचानक “एरर 404” दिखाने लगे।

एक नाग ने काँपते हुए कहा—
“यह ध्वनि हमें चुभ रही है।”
दूसरे नाग ने उत्तर दिया—
“क्योंकि यह व्यंग्य है। यह हमें बता रही है कि हमारी चालाकियाँ उतनी ही क्षणिक हैं जितनी मोबाइल स्क्रीन पर टिक-टॉक वीडियो—कुछ सेकंड की चमक, फिर शून्य। और याद रखो, यह कोई सामान्य ध्वनि नहीं है—यह तो हमारे आराध्य डमरूकेश्वर महादेव का ही डमरू है, जो हमें सावधान कर रहा है कि अंधकार की सीमा यहीं समाप्त होती है।”

पाताल की दीवारें डमरू की गूँज से हिलने लगीं। गुफाओं में फैले षड्यंत्र कोड, हैकिंग प्लान और विषैले डेटा ऐसे राख हो गए मानो किसी ने “डिलीट ऑल” का बटन दबा दिया हो। असुरों की सेनाएँ, जो अपनी योजनाओं को बुलेटप्रूफ मान रही थीं, उस ध्वनि में ऐसे बिखर गईं जैसे गलत पासवर्ड डालने पर अकाउंट स्थायी रूप से ब्लॉक हो जाए।

पाताल लोक के प्राणी समझ गए कि उनका अंधकार कितना भी गाढ़ा क्यों न हो, प्रकाश का यह व्यंग्य हमेशा अपडेटेड सॉफ़्टवेयर की तरह होगा—पुराने वायरस को तुरंत ध्वस्त कर देगा।

अब गुफाओं की निस्तब्धता में वही गूँज बची थी जो चेतावनी बनकर कह रही थी—
“काला नेटवर्क चाहे जितना भी गहरा क्यों न हो, सत्य का नाद उसमें घुसकर सब फ़ाइलें करप्ट कर देगा।”

और फिर वह ध्वनि पहुँची जुगाड़लोक में—एक ऐसा लोक जिसे मनुष्य ने आधुनिक युग की अपनी सुविधा और अजीब मानसिकता से गढ़ा था। यहाँ हर समस्या का समाधान जुगाड़ से निकाला जाता था। मेहनत को तरकीब से रिप्लेस कर दिया गया था, ईमानदारी को “नेटवर्किंग” और “अप्रोच” से, और सत्य को “पीआर पैकेज” से ढँक दिया गया था। धर्म भी यहाँ विज्ञापन की स्क्रिप्ट बन चुका था—पोस्टर, बैनर और सेल्फी के फ्रेम में सजाकर। इस लोक के निवासी गर्व से कहते—“हम हर समस्या का हल निकाल लेंगे, बस एक नया जुगाड़ चाहिए।”

डमरू की थाप इस लोक में पहुँची तो सब कुछ उलट-पुलट हो गया। लोग अपनी मीटिंग्स, कॉन्फ्रेंस कॉल्स और भाषणों में व्यस्त थे। हर कोई पॉवरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन में “सॉल्यूशन” दिखा रहा था। पर अचानक हवा में यह आवाज फैल गई कि उनके सारे जुगाड़ उतने ही खोखले हैं जितनी “कॉपी-पेस्ट की गई” रिपोर्ट। किसी ने कहा—“जलवायु परिवर्तन? प्रोजेक्ट प्रपोज़ल बना दो, फंडिंग आ जाएगी, भाषण दे दो, फोटो खिंचवा लो, सब ठीक हो जाएगा।” किसी और ने कहा—“नदी सूख रही है? सोशल मीडिया पर हैशटैग ट्रेंड करा दो, जनता को दिखाओ कि हम काम कर रहे हैं।” लेकिन डमरू की ध्वनि ने व्यंग्य करते हुए कहा—“तुम्हारी तरकीबें उतनी ही क्षणभंगुर हैं जितनी हवा में उठी धूल। सत्य को ढकने वाले सारे पर्दे डमरू की थाप में फट जाते हैं।”

जुगाड़लोक की चमचमाती इमारतें काँप उठीं, मशीनों की गूँज बौनी हो गई और तरकीबों के नकली परदे गिर गए। यहाँ तक कि वे लोग भी जो अपनी नौकरी जुगाड़ से पाई थी, जो प्रमोशन “नेटवर्किंग” से हासिल करते थे, और जो नेतागिरी प्रलोभनों के पैकेज बाँटकर करते थे—उनके सारे “फिट किए गए जुगाड़” ऐसे ढह गए जैसे नकली सर्टिफिकेट का सर्वर क्रैश हो जाए। वहाँ के निवासी अपनी ही हँसी में फँस गए। उनके सारे उपाय, सारे आविष्कार और सारे दिखावे उस व्यंग्यात्मक ध्वनि के सामने ऐसे खोखले प्रतीत हुए जैसे टूटा हुआ माइक किसी बड़े भाषण को बेसुरा कर दे।

महादेव की आँखें अब भी गंभीर थीं। उनमें करुणा की नमी थी, पर एक लोहे जैसी कठोरता भी। डमरू की हर थाप केवल ध्वनि नहीं, बल्कि एक ब्रह्मांडीय नोटिफिकेशन थी—सृष्टि को भेजा गया एक अनिवार्य अपडेट। उसने स्वर्गलोक को स्मरण कराया कि उनका वैभव केवल ट्रायल वर्ज़न है, जो कभी भी एक्सपायर हो सकता है। उसने मानव लोक को दिखाया कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना ऐसे है जैसे हार्डडिस्क को फॉर्मेट करके भी यह सोचना कि डेटा सुरक्षित रहेगा। उसने पाताल लोक को चेताया कि अंधकार में रचे गए षड्यंत्र उतने ही व्यर्थ हैं जितनी “स्पैम मेल्स”—जिन्हें अंततः डिलीट होना ही है। और उसने जुगाड़लोक को आईना दिखाया कि उनका हर जुगाड़ केवल शॉर्टकट की है—जो असली प्रोग्राम को कभी नहीं चला सकती।

प्रकृति का हर अंश इस संदेश में बोल उठा। नदी की धाराएँ करुणा बनकर बह रही थीं, जैसे जीवन की नाड़ियों में धड़कन। पहाड़ व्यंग्य के प्रहरी की भाँति खड़े थे, मानो यह कह रहे हों कि जो झूठ पर टिका है वह भूकंप की पहली थरथराहट में ढह जाएगा। वृक्ष अपनी शाखाओं से कह रहे थे—“हम गिरे तो भी हमारी जड़ें जीवित रहेंगी, और फिर से हरियाली लौट आएगी।” आकाश तारों से भरकर यह फुसफुसा रहा था कि अनंतता के सामने मनुष्य की सारी चालाकियाँ उतनी ही क्षणभंगुर हैं जितनी हवा में उठी धूल।

जब अंतिम थाप पड़ी, तो सम्पूर्ण सृष्टि मौन हो गई। नदी का कलकल थम गया, वृक्ष अपनी साँस रोककर खड़े हो गए, हवा की गति मानो समय से भी पीछे ठहर गई। पूरा ब्रह्मांड एक क्षण के लिए ठहरकर सुनने लगा। केवल प्रतिध्वनि गूँज रही थी—उसमें करुणा थी, व्यंग्य था, चेतावनी थी और एक गहरा आह्वान भी। महादेव ने डमरू को थाम लिया, पर उसकी गूँज अब भी हर लोक में बह रही थी। वह हर प्राणी से कह रही थी—“प्रकृति केवल दृश्य नहीं, चेतना है। उसे अनसुना करोगे तो उसका व्यंग्य तुम्हारे अहंकार को चूर कर देगा। सच्चा स्वर्ग, सच्चा धर्म और सच्चा जीवन उसी लय में है जिसमें मेरा डमरू बजता है।”

और तभी वह प्रतिध्वनि धीरे-धीरे एक अनंत स्वर में बदल गई—“ॐ…”। यह स्वर न आरंभ था, न अंत, वह बस अस्तित्व की धड़कन था। उसने नदियों को फिर से बहाया, वृक्षों को फिर से साँस दी, और आकाश में तारों को नई चमक। यह ध्वनि पर्वतों की चुप्पी में भी गूँज रही थी और मनुष्य के हृदय की गहराइयों में भी। पूरी सृष्टि उसी गूँज में डूब गई—मानो जगत की हर धड़कन अब उस एक स्वर में विलीन होकर कह रही हो कि यही अनादि-अनंत सत्य है।

2 टिप्‍पणियां: