गुरुवार, 14 अगस्त 2025

स्कूल की छुट्टी (कहानी) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड

स्कूल की छुट्टी (कहानी)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड 

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सुबह के धुंधलके में पहाड़ ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने सफ़ेद रजाई ओढ़ ली हो। बादल, जैसे आलसी सरकारी बाबू, चुपचाप घाटियों में बैठकर चाय पी रहे थे और सोच रहे थे कि आज थोड़ा ज़्यादा बरसें, ताकि काम करने वालों को बहाना मिले और न करने वालों को मौका। हवा में ठंडक थी, लेकिन बादलों में गर्मजोशी। वे धीरे-धीरे सरकते हुए गांँवों के ऊपर इकट्ठा हो गए, जैसे कोई अफसर दफ्तर में देर से पहुंचकर भी बैठक बुला ले। पहली बूँद गिरते ही कच्ची सड़कों ने खुद को नदी घोषित कर दिया। मिट्टी ने अपने सारे रंग छोड़ दिए और पानी में मिलकर बहने लगी। पुलों ने इस्तीफ़ा दे दिया—“हम इतनी जिम्मेदारी नहीं उठा सकते।” पगडंडियां अचानक गायब हो गईं, मानो कह रही हों कि आज हमें भी छुट्टी चाहिए।

गांँव में लोग सुबह की चाय पी ही रहे थे कि मोबाइल पर टन-टन की आवाज़ आई। शिक्षा विभाग का संदेश—“भारी वर्षा के कारण सभी विद्यालय आज बंद रहेंगे।” आदेश उतनी तेज़ी से गांँव-गांँव फैला जितनी तेज़ी से पहाड़ों में बिजली चली जाती है और चाय की केतली की भपक दुकानों में खुशबू फैलाती है। बच्चे, जो रोज़ सुबह उठते ही बस्ता देखकर सुस्त हो जाते थे, आज बिस्तर छोड़कर खिड़की से बारिश का नजारा लेने दौड़ पड़े। राजू, जो किताब खोलते ही जम्हाई लेने का मास्टर था, आज बारिश में नंगे पैर दौड़ रहा था। उसकी कागज की नाव तेज़ बहाव में ऐसे भाग रही थी जैसे सपनों की नौकरी विदेश में मिल गई हो। कमला ने हाथ में छाता लिया, लेकिन वह छाता भी बरसात में ऐसे नाच रहा था जैसे कोई नेता चुनावी रैली में—शोर ज्यादा, काम कम। पहिले तो छाता खुला ही नहीं जब खुला तो पैराशूट बन गया। बच्चों की टोली कूद-फांद करती, पानी में छपाक-छपाक करती, मानो बरसात कोई बड़ा त्योहार हो और वह सब मुख्य अतिथि हों।

गांँव के मास्टर तिवारी जी बरामदे में ऊन का मफलर बुन रहे थे। हर टांका मानो कह रहा हो—“आज पाठ नहीं, पकौड़े होंगे।” उनके चेहरे पर संतोष का भाव था, जैसे प्रकृति ने खुद उन्हें अवकाश पत्र दे दिया हो। उनकी पत्नी ने पूछा, “आज बच्चों को पढ़ाने का मन नहीं?” तिवारी जी ने गंभीर लहजे में कहा, “प्रकृति जब पढ़ा रही है जलचक्र, तो मैं क्यों बीच में दखल दूंँ?” उनका यह दर्शन न केवल व्यावहारिक था बल्कि आलस्य का भी उत्तम उदाहरण था।

बरसात में पहाड़ का भूगोल अपने असली रूप में सामने आता है। झरने बताते हैं कि गुरुत्वाकर्षण किसका बाप है। लुढ़कते पत्थर चेतावनी देते हैं कि स्थिरता सिर्फ किताबों में है। मिट्टी के धसकने से समझ आता है कि आधार कमजोर हो तो इमारत गिरना तय है—चाहे वह घर हो या व्यवस्था। गांँव के ऊपर के रास्ते बहकर गायब हो गए थे और नीचे के रास्ते कीचड़ में ऐसे डूब गए थे जैसे सरकार की योजनाएं फ़ाइलों में।

बारिश थमने पर गांँव की पंचायत में चर्चा छिड़ी। गणेश काका, जो अपने जमाने को इतिहास मानते थे, बोले, “हमारे जमाने में तो बारिश में भी स्कूल जाते थे… बस्ता भीग जाए तो क्या।” पप्पू, जो वर्तमान पीढ़ी का प्रतिनिधि था, तुरंत बोला, “काका, तब शिक्षा पानी में नहीं बहती थी, अब तो बजट से लेकर किताब तक सब बह जाता है।” दीपा की मांँ, जो गांँव के मध्यम वर्ग की आवाज़ थीं, बोलीं, “अब तो बच्चे घर से ऑनलाइन पढ़ते हैं, बरसात में तो और भी आसान।” पप्पू हंसा, “हाँ मौसी, लेकिन नेटवर्क भी तो पहाड़ी है—कभी ऊपर, कभी नीचे।” पकड़ में आ ही नहीं रहा है। एक - दो डंडे से क्या होगा ? इस पर पंचायत में बैठे सब लोग खिलखिला पड़े। हंँसी में छिपी यह सच्चाई सबको चुभ रही थी—बरसात में शिक्षा विभाग से लेकर चाय की दुकान तक, हर कोई ‘सुरक्षा’ के नाम पर आराम चाहता है। जिसका बेटा फौज में है वह छाती चौड़ी कर लेता है।

सोशल मीडिया ने बरसात को और भी रंगीन बना दिया था। हालांकि रंग जिंदगी के अनेक भावों को दर्शाते हैं। गांँव के युवा शिक्षक प्रदीप सर ने छुट्टी मिलते ही इंस्टाग्राम पर फोटो डाल दी—“Rainy day in the hills”। पीछे बहते झरने का वीडियो, जिसमें वे बड़े साहित्यिक अंदाज में खड़े थे। कमेंट आया—“सर, यह स्कूल के पीछे का झरना है ना? तो आप वहीं क्यों नहीं पढ़ा रहे?” सर ने जवाब दिया—“ये जलधारा शिक्षा से भी तेज बह रही है, बेटा।” फेसबुक और व्हाट्सऐप विश्विद्यालय पर बरसात का मेला लगा था। “Rainy Day Vibes” के साथ चाय-पकौड़े की तस्वीरें, बच्चों के कीचड़ में कूदने के वीडियो और शिक्षकों के पोस्ट—“सुरक्षा के लिए छुट्टी जरूरी”, जिनके बैकग्राउंड में गरम भाप उठती कॉफी साफ दिख रही थी।

बरसात में प्रकृति का हर कोना मानो प्रतीक बन जाता है। तेज़ बहाव वाली नालियांँ उस व्यवस्था का रूप ले लेती हैं, जो सबको अपने साथ बहा ले जाती है, चाहे कोई तैयार हो या न हो। पुल, जो बहकर चले जाते हैं, वे कमजोर नीतियों का रूपक हैं, जो पहले मौके पर टूट जाते हैं। और वह ऊंँचे-ऊंँचे पहाड़, जिन पर बादल टिक जाते हैं, वे उस जड़ मानसिकता का प्रतीक हैं, जिसे हिलाना मुश्किल है, चाहे कितनी ही बारिश क्यों न हो।

शाम होते-होते बादल हटे, लेकिन पहाड़ी रास्तों पर सड़कों पर गड्ढों में जमकर कीचड़ और पानी अपलोड हो गया और फिर कीचड़, फिसलन , धुंध और ठंड का साम्राज्य आ गया। बच्चे सोच रहे थे—काश कल भी बारिश हो, ताकि छुट्टी जारी रहे। शिक्षक सोच रहे थे—काश कल बच्चे आधे ही आएं ! और प्रशासन सोच रहा था—काश हर बरसात में हमें ‘तुरंत निर्णय’ लेने का अवसर मिले। यहांँ बरसात सिर्फ पानी नहीं थी, बल्कि एक आईना थी, जिसमें हर कोई अपनी असलियत देख रहा था।

यह दिन गांँव के लिए उत्सव भी था और आलस्य का पर्व भी। बच्चों ने इसे खेल में बदल दिया, शिक्षकों ने आराम में, और प्रशासन ने अपनी ‘सुरक्षा नीति’ में। बरसात ने सबको एक मंच पर ला खड़ा किया, जहांँ हर कोई अपने तरीके से छुट्टी का अर्थ समझा रहा था। अध्यापकगण इस दिन को “अनपेड वर्क-फ्रॉम-होम” मानकर आत्मचिंतन करते हैं—अगले हफ्ते का होमवर्क और भी ज्यादा कैसे दिया जाए।

बरसात में हर पात्र अपने प्रतीकात्मक रूप में था। बच्चे थे ‘स्वतंत्रता की नदियांँ’, जो हर दिशा में बहना चाहती थीं। शिक्षक थे ‘पहाड़ी देवदार’, जो अपनी जगह स्थिर रहकर भी मौसम का आनंद लेते थे। प्रशासन था ‘दूर का बादल’, जो गरजता ज्यादा और बरसता कम था। और गांँव का आम आदमी था ‘पगडंडी’, जिस पर सबका आना-जाना तो होता है, लेकिन उसका हाल पूछने वाला कोई नहीं।

बरसात ने दिखा दिया कि शिक्षा व्यवस्था चाहे कितनी भी आधुनिक हो जाए, इंटरनेट और स्मार्टफोन कितने भी पहुंँच जाएं, पहाड़ में छुट्टी का मतलब अब भी वही है, जो आजादी से पहिले था। कि आराम, पकौड़े, और खिड़की से बाहर बरसते पानी को देखना। यह भी तय है कि बरसात का यह प्रतीकात्मक खेल हर साल दोहराया जाएगा। प्रकृति अपनी भूमिका निभाएगी, और हम सब अपनी-अपनी पुरानी स्क्रिप्ट। फर्क बस इतना होगा कि फोटो अब और ज्यादा हाई-रेज़ॉल्यूशन में आएंगे, और ‘Rainy Day’ का हैशटैग और लंबा होगा।

बरसात यहांँ एक मौसम नहीं, बल्कि एक सामूहिक बहाना है—काम से बचने का, जिम्मेदारी टालने का और बचपन जीने का , और यही उसका सबसे सटीक, सबसे सजीव, और सबसे व्यंग्यात्मक रूप है। हालांकि प्रकृति हम सबकी कल्पनाओं से भी अधिक सुंदर है। बरसात एक उपमान।

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी कहानी का एक-एक शब्द मानो हम सब भी वही का एक हिस्सा हो...उत्तराखंड के इस गांव को जीवंत कर दे रहा था बहुत अच्छा प्रयास है भाई साहब आपको बहुत-बहुत साधुवाद

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  2. बहुत ही सुंदर और जीवन्त चित्रण 🌻🙏

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