सोमवार, 29 जून 2026
ये दौर भी बीत जाएगा ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
अपनी भाषा के गीत मधुर ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
अपनी भाषा के गीत मधुर
©डॉ. चंद्रकांत तिवारीअपनी भाषा के गीत
किसी कंठ से नहीं,
पीढ़ियों की धड़कनों से जन्म लेते हैं।
उनमें माँ की उँगलियों पर लगी
आटे और हल्दी की गंध है,
खेतों पर झुकते हुए आकाश की नमी है।
जब कोई अपनी भाषा में मुस्कराता है,
धरती अपने भीतर
एक और ऋतु बचा लेती है।
शब्द तब
सिर्फ़ बोले नहीं जाते—
वे जड़ों में उतरकर
मनुष्य को वृक्ष बना देते हैं।
राष्ट्र
सीमाओं से पहले
अपनी भाषा की स्मृति में बसता है।
और कर्म—
जब अपनी मिट्टी की सुगंध से जुड़ते हैं,
तभी इतिहास
भविष्य की ओर चलना सीखता है।
शुक्रवार, 26 जून 2026
दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"दो उम्र के बीच से गुजरता रास्ता" केवल दो पीढ़ियों के बीच की दूरी का आख्यान नहीं, बल्कि बदलते समय में मनुष्य की संवेदनाओं, रिश्तों और पारिवारिक मूल्यों के विघटन की गहन व्यथा-कथा है। कविता यह संकेत करती है कि आधुनिक जीवन की अंधी दौड़, निजी स्वतंत्रता की नई व्याख्याएँ, महानगरीय संस्कृति और तकनीकी निकटता ने मनुष्यों के बीच भावनात्मक दूरियाँ बढ़ा दी हैं। कि जब संवाद समाप्त होता है, तब परिवार केवल एक संरचना रह जाता है और संबंध धीरे-धीरे अपने अर्थ खो देते हैं। कविता अंततः इस विश्वास के साथ समाप्त होती है कि यदि दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे को सुनने, समझने और स्वीकार करने का साहस करें, तो यही दरार फिर से एक जीवंत पुल में बदल सकती है। यह कविता केवल पीढ़ी-अंतराल का चित्रण नहीं, बल्कि हमारे समय के सबसे बड़े मानवीय संकट और उसके संभावित समाधान का संवेदनशील काव्य-दस्तावेज़ है। क्या आप भी ऐसा ही महसूस कर रहे हैं जैसा मैं देख रहा हूं........!!
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दो उम्रों के बीच
कोई सड़क नहीं होती—
एक अदृश्य दरार होती है,
जिसे हर घर
अपने आँगन के बीचों-बीच
चुपचाप पालता है।
एक ओर
मिट्टी की गंध से भीगी हुई हथेलियाँ हैं,
जो रोटी बेलते हुए
वंश की परंपराएँ सेंकती रहीं;
दूसरी ओर
मोबाइल की चमक में
अपना चेहरा खोजती आँखें हैं,
जो भविष्य को
एक स्क्रीन पर स्क्रॉल करती रहती हैं।
बीच में—
एक रास्ता है,
जो हर दिन
थोड़ा और अकेला हो जाता है।
पिता कहते हैं—
"घर, दीवारों से नहीं,
साथ रहने से बनता है।"
बेटा सोचता है—
"घर, वहाँ है
जहाँ मेरी साँसें
किसी की अनुमति नहीं माँगतीं।"
माँ
इन दोनों वाक्यों के बीच
रोज़ एक दीपक रख देती है;
पर अब
रोशनी से अधिक
धुआँ बचता है।
रक्त
पहले नदी था—
जिसमें पीढ़ियाँ
एक-दूसरे की प्यास बुझाती थीं।
अब
वह मेडिकल रिपोर्ट की
एक लाल रेखा भर है,
जिससे संबंध तो सिद्ध हो जाते हैं,
अपनापन नहीं।
मिट्टी
अब भी
दरवाज़े पर पड़ी रहती है,
पर लौटने वाले जूतों की
आहट कम होती जाती है।
बीज
आज भी पेड़ होना चाहता है,
लेकिन गमलों में उगी महत्वाकांक्षाएँ
जड़ों को
आसमान का शत्रु समझ बैठी हैं।
शहर—
एक ऐसा विशाल दर्पण है,
जहाँ हर चेहरा
खुद को बड़ा देखता है,
और धीरे-धीरे
अपने पीछे खड़े लोगों को
भूल जाता है।
गाँव
अब केवल पता है,
जहाँ डाक पहुँचती है,
लोग नहीं।
रिश्ते
अब त्योहारों के संदेश हैं,
जिन्हें
कॉपी-पेस्ट की भाषा में
भेज दिया जाता है।
स्पर्श—
अब
पासवर्ड माँगता है।
विश्वास—
ओटीपी की तरह
कुछ ही क्षणों में
समाप्त हो जाता है।
और प्रेम...
वह
किसी पुराने संदूक में रखा
दादी का ऊनी स्वेटर है,
जिसे
नई अलमारियों में
जगह नहीं मिलती।
दो उम्रों के बीच
जो रास्ता था,
वहाँ अब
सीसीटीवी लगे हैं।
हर कोई
दूसरे पर नज़र रखता है,
कोई
दूसरे को देखता नहीं।
संवाद की जगह
संदेह उग आया है।
आशीर्वाद की जगह
सलाहें हैं।
सलाहों की जगह
निर्णय।
और निर्णयों की जगह
अदालतें।
कितना विचित्र है—
जिस गोद ने
चलना सिखाया,
उसी गोद के विरुद्ध
एक दिन
कानून की धाराएँ खड़ी हो जाती हैं।
जिस हाथ ने
पहली बार उँगली पकड़कर
सड़क पार कराई थी,
उसी हाथ से
बुढ़ापे में
सहारा छूट जाता है।
सभ्यता का सबसे बड़ा शोक
युद्ध नहीं है—
यह है कि
एक ही खाने की थाली से उठे लोग
अब
एक-दूसरे की मृत्यु के समाचार पर भी
केवल
"दुखद" लिखकर
आगे बढ़ जाते हैं।
पेड़
आज भी
अपनी सबसे ऊँची शाखा को
जड़ों से बाँधे रखता है।
नदी
समुद्र तक पहुँचकर भी
अपने उद्गम का अपमान नहीं करती।
पहाड़
बादलों को छू लेने पर भी
धरती से रिश्ता नहीं तोड़ते।
केवल मनुष्य—
अपनी पहली सफलता के बाद
सबसे पहले
अपनी स्मृतियों का पता बदल देता है।
दो उम्रों के बीच से गुजरता रास्ता
दरअसल
समय का नहीं,
संवेदना का रास्ता है।
जहाँ
हर पीढ़ी
अपने सत्य को
अंतिम सत्य मान बैठती है,
और यहीं से
प्रेम का भूगोल
टूटने लगता है।
घर
ईंटों से नहीं टूटते।
वे तब टूटते हैं
जब भोजन से पहले
कोई किसी का इंतज़ार करना छोड़ देता है।
जब माँ की आवाज़
कॉल-लॉग में बदल जाती है।
जब पिता का मौन
अहम् समझ लिया जाता है।
जब बच्चों के सपनों में
परिवार नहीं,
केवल पता बदलता है।
और तब—
दो उम्रों के बीच का रास्ता
सड़क नहीं रहता,
वह
एक अदालत,
एक अस्पताल,
एक वृद्धाश्रम,
एक मनोचिकित्सालय,
या कभी-कभी
एक जेल की ओर जाती हुई
निर्जन पगडंडी बन जाता है।
फिर भी—
यदि कभी
कोई बच्चा
अपने पिता की झुर्रियों में
भविष्य पढ़ ले,
यदि कोई पिता
अपने बेटे की बेचैनी में
विद्रोह नहीं,
डर पहचान ले,
यदि कोई माँ
दो पीढ़ियों के बीच
फिर से रोटी की पहली भाप रख दे,
तो शायद—
दो उम्रों के बीच से गुजरता रास्ता
फिर
दरार नहीं रहेगा।
वह
एक पुल होगा—
जिस पर चलते हुए
रक्त फिर नदी बनेगा,
मिट्टी फिर घर बनेगी,
और मनुष्य
एक बार फिर
मनुष्य कहलाने के योग्य होगा।
गुरुवार, 25 जून 2026
मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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कविता "मिट्टी में बचा हुआ मनुष्य" का भाव यह है कि राष्ट्र केवल भूगोल, सत्ता या प्रतीकों से नहीं बनता, बल्कि मनुष्य की करुणा, श्रम, स्मृति और नैतिकता से जीवित रहता है। किसान, मजदूर, शिक्षक, माँ और सत्य के लिए खड़ा साधारण व्यक्ति ही देश की वास्तविक आत्मा हैं। आधुनिक बाज़ारवाद और स्वार्थ के बीच भी आशा तब तक जीवित है, जब तक मनुष्य के भीतर संवेदना, त्याग और प्रेम शेष हैं। कविता बताती है कि राष्ट्र का वास्तविक निवास मिट्टी से अधिक मानव-हृदय और विवेक में होता है। करुणा और मानवता का दीप बुझते ही सभ्यताएँ भी खंडहर बन जाती हैं, किंतु जब तक सत्य, आशा और मानवीय संवेदना जीवित हैं, तब तक देश भी जीवित रहेगा।
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देश
किसी मानचित्र पर खिंची हुई रेखा नहीं होता,
न ही किसी ऊँचे स्तंभ पर
लहराता हुआ एकाकी रंग।
वह तो समय की बंद मुट्ठी में दबा
वह बीज है
जो युगों की अंधेरी मिट्टी में
धीरे-धीरे प्रकाश का वृक्ष बनता है।
मैंने उसे देखा है—
एक वृद्ध किसान की हथेली में,
जहाँ दरारें नहीं,
सूख चुकी नदियों की जीवनी लिखी थी।
हर रेखा में
एक मौसम का शव पड़ा था,
और हर मौसम के भीतर
एक अगली हरियाली का सपना।
मैंने उसे देखा है—
शहर के चमकते शीशों के पीछे
अपने ही प्रतिबिंब से भयभीत मनुष्यों में।
वे ऊँची इमारतों में रहते थे,
पर भीतर से ढह चुके थे।
उनकी खिड़कियाँ खुलती थीं आकाश में,
पर आत्माएँ
तहखानों में बंद थीं।
देश उन इमारतों में नहीं था।
वह तो उस मजदूर की पीठ पर था
जो उन्हें उठाकर
स्वयं झोपड़ी में लौट जाता था।
उसकी देह पर चिपकी धूल
सभ्यता की वास्तविक प्रस्तावना थी।
कितना विचित्र है—
धरती का सबसे आवश्यक मनुष्य
इतिहास की सबसे छोटी पंक्ति में लिखा जाता है,
और सबसे अनावश्यक मनुष्य
सबसे बड़े अक्षरों में।
नदियाँ आज भी बह रही हैं,
पर जल से अधिक
वे स्मृतियाँ बहा रही हैं।
हर लहर के भीतर
किसी भूले हुए गाँव की आवाज़ है,
किसी माँ की पुकार,
किसी सैनिक की अंतिम साँस,
किसी बच्चे की अधूरी हँसी।
समय का एक पुराना बरगद
अब भी खड़ा है
सभ्यता के चौराहे पर।
उसकी जड़ों में
पूर्वजों की असंख्य पदचापें सो रही हैं।
जब भी कोई पीढ़ी
अपने अतीत को भूलने लगती है,
बरगद की जड़ें
पत्थरों को चीरकर बाहर आ जाती हैं।
वे पूछती हैं—
“तुम्हारी ऊँचाई किसकी राख पर खड़ी है?”
इन दिनों
बाज़ार बहुत विशाल हो गया है,
और मनुष्य बहुत छोटा।
वस्तुएँ अमर हो रही हैं,
संबंध नश्वर।
लोग घरों में साथ रहते हैं,
पर स्मृतियों में अलग-अलग मरते हैं।
हर आदमी
अपने भीतर एक निर्वासित देश लेकर चलता है।
एक ऐसा देश
जो लौटना चाहता है
अपने ही हृदय में।
पर वहाँ अब
सूचनाओं का शोर है,
विज्ञापनों की धूल है,
और इच्छाओं का ऐसा कुहासा
जिसमें आत्मा का चेहरा दिखाई नहीं देता।
मैंने देखा—
सबसे ऊँची आवाज़ें
अक्सर सबसे रिक्त थीं।
और सबसे गहरा देश
उन लोगों के भीतर था
जो चुपचाप
दूसरों के दुख का भार उठाते थे।
एक स्त्री
जब आधी रोटी खाकर
अपने बच्चे को पूरी रोटी देती है,
वहीं राष्ट्रगान का सबसे सच्चा स्वर जन्म लेता है।
एक शिक्षक
जब अँधेरे गाँव में
ज्ञान का दीप जलाता है,
वहीं संविधान का सबसे सुंदर अनुच्छेद लिखा जाता है।
एक किसान
जब सूखे खेत में भी
अगले वर्ष का बीज डाल देता है,
वहीं लोकतंत्र की सबसे बड़ी आशा अंकुरित होती है।
देश
विजयों से कम,
विश्वासों से अधिक बनता है।
ईंटों से कम,
आँसुओं से अधिक।
शक्तियों से कम,
त्यागों से अधिक।
और मनुष्य?
वह स्वयं एक चलता-फिरता राष्ट्र है।
उसकी करुणा उसकी राजधानी है,
उसकी स्मृति उसका इतिहास,
उसका श्रम उसका संविधान,
और उसका प्रेम
उसकी अंतिम स्वतंत्रता।
यदि कभी पूछो—
देश कहाँ है?
तो पर्वतों से पहले
मनुष्य की आँखों में देखना।
नदियों से पहले
उसके आँसुओं में झाँकना।
ध्वज से पहले
उसकी अंतरात्मा को पढ़ना।
क्योंकि राष्ट्र
मिट्टी में उतना नहीं रहता
जितना मनुष्य के विवेक में।
और जिस दिन
करुणा की अंतिम ज्योति बुझ जाएगी,
उस दिन
सबसे विशाल साम्राज्य भी
खंडहर हो जाएगा।
किन्तु अभी
क्षितिज पर एक दीप जल रहा है।
एक बच्चा
टूटी हुई स्लेट पर
भविष्य लिख रहा है।
एक बीज
पत्थर की दरार में भी
हरा होने का अभ्यास कर रहा है।
एक मनुष्य
अब भी सत्य के पक्ष में
अकेला खड़ा है।
और जब तक
यह बीज,
यह बच्चा,
यह मनुष्य,
और यह करुणा जीवित है—
तब तक
देश किसी नक्शे में नहीं,
मानव-हृदय की धड़कनों में जीवित रहेगा।
बुधवार, 24 जून 2026
सूर्य से पहले की आग ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सूर्य से पहले की आग...
यह कविता बताती है कि जीवन में कोई भी प्रकाश, सफलता या सौंदर्य अचानक नहीं जन्म लेता। जैसे बीज अँधेरी मिट्टी में, मोती सीप की पीड़ा में और तितली अपने बंद कोकून में संघर्ष करके विकसित होते हैं, वैसे ही मनुष्य का व्यक्तित्व भी धैर्य, परिश्रम और विश्वास की अग्नि में तपकर निखरता है। कविता का संदेश है कि हर मनुष्य के भीतर एक अदृश्य सूर्य छिपा है, जो अवसर नहीं, बल्कि साहस और विश्वास के जागने की प्रतीक्षा करता है।
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
किसी ने नहीं देखा
कि पहाड़ की ऊँचाई में
कितनी टूटनों की राख मिली हुई है।
जो शिखर दूर से अटल दिखाई देता है,
वह भीतर
अनगिनत दरारों का संयम है।
नदी जब चट्टानों से टकराती है,
तो वह केवल रास्ता नहीं बनाती,
वह अपने ही स्वर का जन्म करती है।
जल का संगीत
कभी शांत घाटियों में नहीं,
प्रतिरोध की कठोर देह पर लिखा जाता है।
बीज को देखो—
धरती उसे फूलों का वचन देकर नहीं बुलाती।
पहले उसे
अँधेरे की गीली सुरंगों से गुजरना पड़ता है।
मिट्टी के नीचे,
जहाँ कोई ताली नहीं बजती,
जहाँ कोई नाम नहीं पुकारता,
वहीं से
हर हरियाली की शुरुआत होती है।
बाँस के भीतर
बहुत पहले से संगीत नहीं रहता।
हवा को स्वर बनने से पहले
घावों की एक पूरी वर्णमाला से गुजरना पड़ता है।
जंगल इसलिए नहीं गूँजता
कि बाँस मजबूत था,
जंगल इसलिए गूँजता है
कि उसने अपने रिक्त स्थानों को
स्वीकार कर लिया था।
सीप के भीतर पलता मोती
समुद्र का उपहार नहीं,
एक चुभन की दीर्घ साधना है।
दर्द जब भागना छोड़ देता है,
तब वह
सौंदर्य में बदलने लगता है।
दीपक की लौ को भी
रात विरासत में नहीं मिली।
उसे हर क्षण
अपने ही तेल से
अँधेरे का मूल्य चुकाना पड़ता है।
बादल जब बरसते हैं,
तब केवल जल नहीं गिरता।
उनमें उड़ चुकी नदियों की स्मृतियाँ,
समुद्र की बेचैनियाँ,
और आकाश की लंबी यात्राएँ भी
धरती पर उतरती हैं
धूल कणों के साथ।
इस संसार में
कुछ भी अचानक नहीं खिलता।
न फूल,
न प्रकाश,
न मनुष्य।
सब कुछ
धीरे-धीरे पकता है—
जैसे धूप फलों में,
जैसे समय वृक्षों में,
जैसे विश्वास
एक थके हुए हृदय में।
कुम्हार के चाक पर घूमती मिट्टी
पहले चक्कर खाती है,
फिर आकार पाती है।
अग्नि से गुज़रे बिना
घड़ा कभी
जल का घर नहीं बनता।
कोयले की कालिमा में ही
हीरे का धैर्य पलता है।
और शंख की निस्तब्धता में
समुद्र
अपनी सबसे गहरी ध्वनि
छिपाकर रखता है।
तितली के रंगों के पीछे
एक कैद पड़ा हुआ कोकून होता है,
जिसे फाड़े बिना
आकाश तक पहुँचना संभव नहीं।
इसलिए
जब तुम्हें लगे
कि तुम्हारी मेहनत
पत्थरों में बोया गया बीज है,
जब प्रतीक्षा की सर्दियाँ
अस्थियों तक उतर आएँ,
जब पराजय
तुम्हारे दरवाज़े पर बैठकर
तुम्हारा नाम पुकारने लगे,
जब तुम्हारे श्रम का वृक्ष
सूखा हुआ प्रतीत हो—
तब स्मरण करना,
क्षितिज पर उगने वाला सूर्य
पहले कहीं दिखाई नहीं देता।
वह बहुत पहले
धरती के गर्भ में,
बीज की नमी में,
दीपक की लौ में,
सीप के घाव में,
कोयले की कालिमा में,
तितली के बंद पंखों में,
और मनुष्य के मौन धैर्य में
जलना शुरू हो चुका होता है।
भाग्य
आकाश से उतरने वाली
कोई रेखा नहीं।
वह पसीने की बूँदों में
धीरे-धीरे उभरता हुआ
प्रकाश है।
जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार
सफलता नहीं है—
बल्कि यह है
कि इतने अँधेरों के बाद भी
मनुष्य
प्रकाश पर विश्वास करना
नहीं छोड़ता।
और शायद
यही विश्वास
समय की सबसे कठिन रातों में भी
एक अदृश्य सूर्य की तरह
हमारे भीतर
जलता रहता है।
जब तक वह जलता है,
तब तक
कोई पराजय
अंतिम नहीं होती।
क्योंकि
हर भोर के पीछे
एक अनदेखी रात का तप होता है।
हर वृक्ष के पीछे
एक मौन बीज का विश्वास।
हर संगीत के पीछे
किसी पीड़ा की साधना।
और हर मनुष्य के भीतर
एक ऐसा सूर्य छिपा होता है
जो अवसर नहीं,
साहस की
प्रतीक्षा करता है।
जब वह जागता है,
तब इतिहास बदलता है।
तब रास्ते नहीं मिलते—
रास्ते बनते हैं।
तब मनुष्य
अपनी परिस्थितियों का उत्तर नहीं रहता,
वह स्वयं
एक संभावना बन जाता है।
सोमवार, 22 जून 2026
बीज का एकांत ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
बीज का एकांत
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"बीज का एकांत" उन लोगों की कहानी है जो आज संघर्ष की धूप में तप रहे हैं, अपनी इच्छाओं को स्थगित कर रहे हैं, अकेले कमरों में बैठकर सपनों की नींव रख रहे हैं और असफलताओं के बीच भी अपने विश्वास को बचाए हुए हैं। यह कविता उस मौन साधना का आख्यान है जिसमें एक विद्यार्थी, एक स्वप्नद्रष्टा और एक कर्मयोगी धीरे-धीरे स्वयं को गढ़ता है। जो आज मिट्टी के अँधेरे में दबे बीज की तरह दिखाई देते हैं, वही कल विशाल वृक्ष बनकर खड़े होंगे—अपने लिए नहीं, बल्कि उन थके हुए पथिकों के लिए जिन्हें जीवन की कठिन यात्राओं में थोड़ी-सी छाया, थोड़ा-सा विश्वास और आगे बढ़ने का साहस चाहिए होगा।"
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वे जो आज
शिखरों पर दिखाई देते हैं,
कभी धरती की अँधेरी तहों में
दबे हुए बीज थे।
किसी ने उनके भीतर
हरियाली नहीं देखी थी,
किसी ने उनके भविष्य की शाखाओं पर
बैठे पक्षियों का संगीत नहीं सुना था।
सबको केवल मिट्टी दिखी,
केवल अँधेरा दिखा।
पर बीज जानता था—
अँधेरा अंत नहीं होता,
अक्सर वही जन्म का दूसरा नाम होता है।
विद्यार्थी जीवन
दरअसल एक बीज का जीवन है।
ऊपर से सब कुछ स्थिर दिखाई देता है,
पर भीतर
जड़ों का एक अदृश्य महाकाव्य लिखा जा रहा होता है।
जब शहर सो रहा होता है,
एक दीपक अपनी लौ से
रात की पीठ पर अक्षर लिख रहा होता है।
घड़ी की सुइयाँ
समय नहीं बतातीं,
वे धीरे-धीरे
एक मनुष्य का निर्माण करती हैं।
किताबें मेज़ पर खुली रहती हैं,
पर असल में खुलता है
भविष्य का वह दरवाज़ा
जिसकी कुंडी केवल धैर्य पहचानता है।
असफलता—
वह तूफ़ान नहीं
जो पेड़ को गिरा दे।
वह तो जड़ के पास बैठा हुआ
एक मौन शिल्पकार है,
जो हर चोट के साथ
मनुष्य के भीतर से
अनावश्यक पत्थर हटाता रहता है।
कई बार परिणामों की धूप
हमारे हिस्से नहीं आती,
कई बार
मेहनत का पूरा आकाश
बादलों में घिर जाता है।
तब लगता है—
जैसे नदी ने
समुद्र तक पहुँचने की सारी यात्राएँ
व्यर्थ कर दी हों।
लेकिन नदी जानती है,
रास्ते कभी व्यर्थ नहीं जाते;
वे जल को नहीं,
उसके धैर्य को गढ़ते हैं।
और फिर आता है—
अकेलापन।
जीवन का सबसे गलत समझा गया शब्द।
लोग उसे खाली कमरा समझते हैं,
पर वह तो एक कार्यशाला है
जहाँ आत्मा
अपने सबसे गहरे औज़ार बनाती है।
वहीं बैठकर
मनुष्य अपने भय की गाँठें खोलता है,
वहीं वह
अपनी सीमाओं के टूटने की आवाज़ सुनता है,
वहीं वह सीखता है
कि भीड़ से तालियाँ मिल सकती हैं,
पर दिशा नहीं।
दिशा हमेशा
एकांत की गोद में जन्म लेती है।
किसी महान उपलब्धि की चमक में
बरसों का धुआँ छिपा होता है।
हर पदक के पीछे
कुछ अधूरी नींदें होती हैं,
हर सफलता के पीछे
कई पराजयों की अस्थियाँ दबी होती हैं।
कोई भी ऊँचा पद
किसी एक परीक्षा का परिणाम नहीं होता,
वह उन दिनों का संचित प्रकाश होता है
जब कोई देख नहीं रहा था
और फिर भी तुम काम कर रहे थे।
एक दिन
जब दुनिया तुम्हें सफल कहेगी,
तब भी तुम्हारे भीतर
वह पुराना विद्यार्थी जीवित रहेगा—
जो रात के अंतिम पहर में
एक पन्ना और पढ़ लेने के लिए
नींद से समझौता कर लेता था,
जो हार के बाद
अपने आँसुओं को पोंछकर
फिर से मेज़ पर बैठ जाता था,
जो जानता था कि
फल से पहले
फूल नहीं,
और फूल से पहले
बीज को
असंख्य अँधेरे सहने पड़ते हैं।
इसलिए यदि अभी
रास्ता लंबा है,
यदि अभी
कमरे में केवल तुम हो
और तुम्हारे सामने खुली हुई किताब,
यदि अभी
परिणाम तुम्हारे पक्ष में नहीं हैं,
तो निराश मत होना।
क्योंकि सृष्टि का सबसे बड़ा रहस्य यही है—
वृक्ष बनने से पहले
हर बीज को
अपने हिस्से का एकांत,
अपनी मिट्टी का अँधेरा,
और अपनी असफलताओं की वर्षा
चुपचाप सहनी पड़ती है।
और जो यह सह लेता है,
वही एक दिन
छाया बनकर
दूसरों के रास्तों पर खड़ा दिखाई देता है।
रविवार, 21 जून 2026
भारतीय ज्ञान परंपरा और योग की साधना : हिमालयी संस्कृति का विराट आयाम ©डॉ.चंद्रकांत तिवारी
भारतीय ज्ञान परंपरा और योग की साधना : हिमालयी संस्कृति का विराट आयाम
©डॉ.चंद्रकांत तिवारी
"जहाँ हिमालय की निस्तब्धता बोलती है, वहीं योग जन्म लेता है, और जहाँ श्वास और शून्य का मिलन होता है, वहीं आत्मा अपने स्वर को पहचानती है।"
हिमालय : मौन में लिखी हुई एक जीवंत साधना -
भारतीय सभ्यता की स्मृतियों में यदि कोई भूभाग सबसे अधिक आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में उपस्थित है तो वह हिमालय है। वह केवल पर्वत-श्रृंखला नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का ऊर्ध्वगामी स्वप्न है। उसकी हिमाच्छादित चोटियाँ आकाश से संवाद करती प्रतीत होती हैं और उसकी घाटियों में बहती नदियाँ मानो ऋषियों के अनन्त मंत्रों को अपने साथ लेकर चलती हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा का एक बड़ा भाग हिमालय की गोद में विकसित हुआ। यहाँ प्रकृति पुस्तक बनी, नदियाँ अध्यापक बनीं, वृक्ष आश्रम बने और मौन स्वयं ज्ञान का माध्यम बन गया। इसी कारण भारतीय दर्शन में हिमालय केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि आत्मबोध का प्रतीक है। वह मनुष्य को ऊँचा उठना सिखाता है, परन्तु साथ ही अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश भी देता है।
योग की साधना का वास्तविक वातावरण भी यही है—बाहरी कोलाहल से दूर, भीतर की यात्रा की ओर अग्रसर एक सजग चेतना।
आदियोगी की ध्वनि और योग का प्रथम स्पंदन -
भारतीय परंपरा में योग का उद्गम आदियोगी भगवान शिव से माना जाता है। शिव वह सत्ता हैं जो गति और स्थिरता, सृजन और संहार, मौन और नाद—सभी विरोधाभासों को एक साथ समेटे हुए हैं। वे योग के प्रथम गुरु हैं, जिन्होंने अस्तित्व के गहनतम रहस्यों को साधना के माध्यम से समझने का मार्ग दिखाया।
कथा कहती है कि हिमालय की नीरवता में शिव ने सप्तऋषियों को योग का ज्ञान दिया। किंतु यह कथा केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक संकेत भी है। इसका अर्थ है कि योग किसी एक व्यक्ति का आविष्कार नहीं, बल्कि चेतना के दीर्घ अनुभवों से विकसित वह ज्ञान है जिसने मनुष्य को स्वयं के भीतर उतरना सिखाया।
योग की साधना का मूल उद्देश्य शरीर को मोड़ना नहीं, बल्कि चेतना को विस्तार देना है। यह मनुष्य को उसके सीमित अहंकार से निकालकर व्यापक अस्तित्व से जोड़ती है। इसी जुड़ाव में योग का वास्तविक अर्थ छिपा है।
श्वास : शरीर और आत्मा के बीच का सेतु -
मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन श्वासों के अदृश्य संगीत पर टिका हुआ है। हम प्रतिदिन हजारों बार साँस लेते हैं, किन्तु उसके महत्व को शायद ही समझ पाते हैं। भारतीय योग परंपरा ने श्वास को केवल जैविक क्रिया नहीं माना; उसे प्राण कहा—वह शक्ति जो जीवन को संचालित करती है।
जब मन अशांत होता है तो श्वास बिखर जाती है, और जब श्वास संतुलित होती है तो मन स्वतः संयमित होने लगता है। यही कारण है कि योग में प्राणायाम को विशेष स्थान प्राप्त है। यह केवल श्वसन की तकनीक नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण का विज्ञान है।
आज का मनुष्य सूचना के महासागर में जी रहा है, परन्तु भीतर से थका हुआ और अस्थिर है। उसके पास साधन हैं, परन्तु शांति नहीं; उपलब्धियाँ हैं, परन्तु संतोष नहीं। योग उसकी श्वास को पुनः उसके अस्तित्व से जोड़ता है। वह सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बाहर नहीं, भीतर प्रवाहित हो रही है।
जब साधक अपनी साँसों के स्पंदन को सुनना सीख जाता है, तब वह अपने भीतर के मौन को भी सुनने लगता है। यही मौन धीरे-धीरे आत्मज्ञान का द्वार बन जाता है।
योग : मनुष्य और प्रकृति के मध्य समन्वय का विज्ञान -
भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकृति को वस्तु नहीं, बल्कि चेतना का विस्तार मानती है। नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं, वृक्ष केवल वनस्पति नहीं हैं, और पर्वत केवल पत्थरों का समूह नहीं हैं। प्रत्येक तत्व में जीवन का स्पंदन विद्यमान है।
योग इसी दृष्टि को विकसित करता है। वह मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहभागी बनाता है। योग का साधक जब सूर्य नमस्कार करता है तो वह केवल व्यायाम नहीं करता; वह सूर्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। जब वह ध्यान करता है तो वह स्वयं को प्रकृति की व्यापक लय के साथ जोड़ता है।
वर्तमान समय में पर्यावरणीय संकटों का मूल कारण यही है कि मनुष्य ने स्वयं को प्रकृति से अलग मान लिया है। योग इस विभाजन को समाप्त करता है। वह बताता है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध प्रतिस्पर्धा का नहीं, सह-अस्तित्व का है।
इस दृष्टि से योग केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और पारिस्थितिक चेतना भी है जो जीवन के प्रत्येक रूप के प्रति सम्मान का भाव उत्पन्न करती है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रकाश-रेखा -
आज योग विश्व के कोने-कोने में पहुँच चुका है। विविध संस्कृतियों, भाषाओं और देशों के लोग इसे अपने जीवन का हिस्सा बना रहे हैं। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की उस सार्वभौमिकता का प्रमाण है जो सीमाओं से परे मानवता की साझा धरोहर बन चुकी है।
योग की सबसे बड़ी शक्ति उसकी समन्वयकारी दृष्टि है। वह विभाजन नहीं, एकत्व की बात करता है; संघर्ष नहीं, संतुलन की बात करता है; उपभोग नहीं, संयम की बात करता है। ऐसे समय में जब संसार मानसिक तनाव, सामाजिक विखंडन और अस्तित्वगत संकटों से जूझ रहा है, योग आशा की एक शांत किन्तु शक्तिशाली किरण बनकर उभरता है।
हिमालय से निकली यह साधना आज वैश्विक चेतना का हिस्सा बन चुकी है। उसकी जड़ें भारतीय संस्कृति में हैं, परन्तु उसकी शाखाएँ सम्पूर्ण मानवता को छाया प्रदान कर रही हैं। योग हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य का वास्तविक विकास केवल तकनीकी उन्नति में नहीं, बल्कि आंतरिक परिष्कार में निहित है।
भारतीय ज्ञान परंपरा का यही संदेश है कि बाहर की यात्रा जितनी आवश्यक है, भीतर की यात्रा उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। योग उसी भीतर की यात्रा का पथ है—एक ऐसा पथ जो हिमालय की निस्तब्धता से आरम्भ होकर आत्मा की अनंत संभावनाओं तक पहुँचता है।
शनिवार, 20 जून 2026
अभी आकाश शेष है ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
अभी आकाश शेष है
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
(कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी भूल यह नहीं होती कि हम हार गए, बल्कि यह होती है कि हम एक हार को ही अपना पूरा जीवन मान बैठते हैं। यह कविता उन सभी लोगों के लिए है जिन्होंने किसी स्वप्न को टूटते देखा है, किसी अपने को खोया है, किसी मंज़िल तक पहुँचने की पूरी कोशिश की है और फिर भी खाली हाथ लौटे हैं। यह कविता कहती है कि अतीत सम्मान के योग्य है, निवास के योग्य नहीं; कि हर बंद दरवाज़ा अंत नहीं, किसी नई दिशा का संकेत भी हो सकता है। यदि आपके भीतर अभी भी संघर्ष करने की एक चिंगारी शेष है, यदि आप गिरकर फिर उठने की कला सीखना चाहते हैं, यदि आप अपने कल की राख से अपने आने वाले कल का सूरज गढ़ना चाहते हैं—तो यह कविता शायद आपके लिए ही लिखी गई है। इसे पढ़िए, अपने जीवन से जोड़िए, और देखिए कि आपके भीतर अभी कितना आकाश शेष है।)
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अभी आकाश शेष है (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
मत ठहर
उन उजड़े चौराहों पर
जहाँ प्रतीक्षा के वृक्ष
बरसों पहले पत्तियाँ खो चुके हैं।
समय कोई स्मारक नहीं
कि उस पर बैठकर
मनुष्य अपनी पराजयों को
बार-बार पुष्पांजलि देता रहे।
वह तो हिमालय से उतरती नदी है—
एक ही जल को
दूसरी बार छूने का अवसर नहीं देती।
जो बीत गया,
उसे अपनी आत्मा का स्थायी निवास मत बना।
स्मृतियाँ आवश्यक हैं,
पर वे घर नहीं होतीं;
वे केवल दिशा-सूचक दीप हैं,
जिनकी लौ से
आगे का पथ देखा जाता है।
तू उस दरवाज़े का शोक क्यों करता है
जो कभी खुला ही नहीं?
कभी-कभी बंद किवाड़
भाग्य का निषेध नहीं,
दिशा का संकेत होते हैं।
वन में देख—
एक आँधी
सैकड़ों टहनियाँ तोड़ देती है,
किन्तु वसंत
अगले ही मौसम
उसी वृक्ष के भीतर
नई हरियाली का गुप्त समझौता लिख देता है।
समुद्र भी
हर लौटती हुई लहर के लिए नहीं रोता,
उसे ज्ञात है—
वापसी का अर्थ अंत नहीं,
अगले ज्वार की तैयारी है।
जो नहीं मिला
उसे अभिशाप मत कह।
संभव है
वह तेरे जीवन की पुस्तक का
वह अध्याय रहा हो
जिसे पढ़ना आवश्यक था,
जीना नहीं।
हर असफलता
धरती के भीतर दबे बीज जैसी है—
ऊपर से अंधकार,
भीतर से अंकुरण।
जिसे लोग हार कहते हैं,
अक्सर वही
चरित्र का प्रथम प्रारूप होती है।
सुन—
पर्वत की ऊँचाई
उसकी चोटी से नहीं बनती,
उस असंख्य टूटन से बनती है
जिसे वह शताब्दियों तक
अपने भीतर सहता है।
नदी की गहराई
उसकी चौड़ाई से नहीं मापी जाती,
उस साहस से मापी जाती है
जिससे वह चट्टानों के विरुद्ध
अपना मार्ग गढ़ती है।
और मनुष्य?
मनुष्य का मूल्य
उसकी सफलताओं में नहीं,
उसकी पुनः आरम्भ करने की क्षमता में छिपा होता है।
इसलिए
अपने कल की राख में
उँगलियाँ फेरते मत रहो।
राख में इतिहास मिलता है,
भविष्य नहीं।
क्षितिज की ओर देखो।
सूरज प्रतिदिन डूबता है,
फिर भी अगली सुबह
उदय होने की तैयारी छोड़ता नहीं।
चाँद हर महीने क्षीण होता है,
फिर भी अपनी पूर्णिमा पर
संदेह नहीं करता।
वन के बीज
अंधकार से डरते तो
धरती कभी हरी न होती।
तुम भी
अपने भीतर के अँधेरों से मत डरो।
उन्हीं की कोख में
तुम्हारी अगली रोशनी पल रही है।
यदि एक स्वप्न टूट गया,
तो आकाश खाली नहीं हो जाता।
यदि एक दिशा बंद हो गई,
तो पृथ्वी घूमना नहीं छोड़ती।
यदि एक नाव डूब गई,
तो समुद्र यात्रा का विरोधी नहीं बन जाता।
हजारों तट हैं,
हजारों नावें हैं,
हजारों हवाएँ हैं
जो अभी तुम्हारे पक्ष में चलनी शेष हैं।
बस इतना ध्यान रखना—
सत्य तुम्हारी रीढ़ हो,
परिश्रम तुम्हारी प्रार्थना,
ईमानदारी तुम्हारा एकांत,
और धैर्य तुम्हारा सबसे विश्वसनीय साथी।
फिर देखना—
आज जो रिक्तता
तुम्हें एक निर्जन मरुभूमि लगती है,
वही कल
तुम्हारे श्रम की वर्षा से
स्वर्णिम अन्नक्षेत्र बन जाएगी।
उठो।
अभी तुम्हारे भीतर
कई नदियाँ जन्म लेना चाहती हैं।
कई पर्वत
अपनी ऊँचाई तुम्हारे साहस में खोज रहे हैं।
कई आकाश
तुम्हारी उड़ान की प्रतीक्षा में हैं।
और जीवन—
जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है,
जीवन तो अभी
तुम्हारे निर्णय की देहरी पर खड़ा
तुम्हारा नाम पुकार रहा है।