शनिवार, 7 नवंबर 2026

जै जै हिंवाला (लोकगीत) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

जै जै हिंवाला

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



हिमाल की चोटी मा

सूरज सुनौळो चमके

गंगा की लहरों मा

देवभूमि को रूप दमके।

बुरांश की खुशबू ल्ये

पवन चली मतवाली

धरती स्वर्ग बणि गे

मेरी पहाड़ों वाली।।


जै जै हिंवाला

जै जै हिंवाला

म्यरू गढ़-कुमूँ

म्यरू उत्तराखंड निराला। 

जै बदरी विशाल

जै बाबा केदार

देवभूमि को जय-जयकार।।


घाम चमके चोटियों मा

बादल खेलण डाळी 

ऋषि-मुनियों की तपोभूमि 

देवताओं की थाती।


जागनाथ बागनाथ पुकारें

हरि हरिद्वार हमारा

नीलकंठ अरु त्रिशूलधारी

शिव का धाम निराला।।


जै जै हिंवाला

जै जै हिंवाला

म्यरू गढ़-कुमूँ

म्यरू उत्तराखंड निराला।।


नंदा देवी शिखरों वाली

पंचेश्वर की धारा

गोमुख से गंगा निकली

जग का भाग्य सँवारा।

चौखम्बा की ऊँची चोटी

हिम से सजी हिमाला

पार्वती की जन्मभूमि

शिवजी का घर निराला।।


डाळी-बोंटि राम-श्याम

बसण ढुंगों मा भगवान

कण-कण मा देवत्व बसण 

पग-पग देवस्थान। 

वीरों की यह जन्मभूमि

बलिदानों की माला

ज्ञान-साधना की ज्योति जले

चमके देश हमारा।।


कहीं जागर, कहीं छपेली

कहीं झोड़ा की तान

ढोल-दमाऊँ की थापों मा

बसदु पहाड़ को मान।

घुघुती की बोली गूँजे

बुरांश खिलें डाळी-डाळी

अपणी बोली, अपणी संस्कृति

सबसे न्यारी-निराली।।


जाति-धर्म की दीवार तोड़ि

प्रेम का दीप जलाला

एकता की डोरी मा बाँधि

देश का मान बढ़ाला।

गंगा जैसी निर्मल भावना

हिम जैसा उजियारा

जुग-जुग जीवे देवभूमि 

उत्तराखंड हमारा।।


जै जै हिंवाला

जै जै हिंवाला

म्यरू गढ़-कुमूँ

म्यरू उत्तराखंड निराला।


जै बदरी विशाल

जै बाबा केदार

जै नंदा-सुनंदा

जै देवभूमि अपार।।

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