फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी
(एक टुकड़ा लम्हा)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
हमने हर शख़्स को अपना समझकर जगह दी,
लोगों ने हर रिश्ते को ज़रूरत से तौला।
हम उम्र भर वफ़ा का मतलब ढूँढ़ते रहे,
और वक़्त ने हर चेहरे का मतलब खोला।
दरिया की तरह बहना भी कोई कम सज़ा नहीं,
हर मोड़ पर किनारों से बिछड़ना पड़ता है।
जो समंदर तक पहुँचने का हुनर रखते हैं,
उन्हें रास्ते में अपना वजूद छोड़ना पड़ता है।
कुछ लोग ज़िंदगी में सबक़ बनकर आते हैं,
कुछ ख़्वाब बनकर आँखों में ठहर जाते हैं।
मगर सबसे अजीब है इंसान की फ़ितरत,
लोग मिलते हैं, मगर समझ में नहीं आते हैं।
हमने ख़ामोशी को भी एक ज़ुबाँ बना रखा है,
हर दर्द को सीने में मेहमाँ बना रखा है।
लोग पूछते हैं इतने सुकून में कैसे हो,
हमने टूटकर भी ख़ुद को जवाँ बना रखा है।
न किसी से शिकवा, न किसी से गिला रखते हैं,
हम अपने भीतर अपना ही ख़ुदा रखते हैं।
दुनिया तो फ़ायदे से रिश्ते बदलती रही,
हम आज भी अपने ज़मीर से वफ़ा रखते हैं।
मंज़िलों का गुरूर अक्सर टूट जाता है,
जब सफ़र इंसान को आईना दिखाता है।
जिसे दुनिया फ़क़त हार समझती रही,
कभी-कभी वही तजुर्बा इंसान बनाता है।
अजीब क़र्ज़ है इस ज़िंदगी का इंसान पर,
साँसें देकर हर ख़ुशी का हिसाब माँगती है।
हम उम्र भर दुनिया को जीतने में लगे रहे,
और मौत चुपचाप वक़्त की मुहर लगाती है।
दरिया से पूछना कभी तजुर्बा क्या है उसका,
वह हर किनारे से मिला, मगर किसी का हुआ नहीं।
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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