मंगलवार, 3 नवंबर 2026

बोलती ख़ामोशियों की दरारें ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

बोलती ख़ामोशियों की दरारें 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


हर शख़्स के सीने में एक राज़ पलता है, 

कोई आँखों से कहता है, कोई ख़ामोश रहता है।


किसी के लौट आने की उम्मीद अब भी बाक़ी है, 

किसी के नाम से दिल में हलचल अब भी बाक़ी है। 

हमने तो बहुत पहले उसे रुख़्सत कर दिया, 

मगर भीतर कहीं उसकी आहट अब भी बाक़ी है।


अजीब दस्तूर है इस शहर की मोहब्बत का, 

यहाँ हर शख़्स मुस्कुराता है अपनी ज़रूरत का। 

कोई हाल पूछ ले तो आँखें भर आती हैं, 

लोगों को फ़ुर्सत कहाँ किसी की हक़ीक़त का।


कुछ लोग ज़िंदगी में इस तरह शामिल होते हैं, 

बिछड़ भी जाएँ तो दिल से कहाँ जुदा होते हैं। 

उनके होने का कोई सबूत नहीं मिलता मगर, 

वो हर ख़ामोश लम्हे में मौजूद होते हैं।


हमने भी कुछ ख़्वाब बड़ी शिद्दत से पाले थे, 

कुछ अपने थे, कुछ वक़्त के हाथों संभाले थे। 

जिनके लिए ख़ुद को भी भुला बैठे हम, 

वही लोग हमारी दास्ताँ से निकलने वाले थे।


अब किसी से कोई गिला नहीं करते, 

टूटे हुए लम्हों का ज़िक्र नहीं करते। 

बड़ी मुश्किल से सीखा है ख़ुद को समेटना, 

अब हर किसी के सामने दिल नहीं खोलते।


कभी-कभी कोई पुराना ख़त मिल जाता है, 

बीते हुए वक़्त का चेहरा खिल जाता है। 

हम समझते हैं कि सब कुछ भुला चुके हैं, 

मगर एक नाम आते ही मौसम बदल जाता है।


यह ज़रूरी तो नहीं हर दर्द का बयान हो, 

हर ख़ामोश चेहरे पर कोई तूफ़ान हो। 

कुछ लोग हँसते हुए भी तन्हा रहते हैं, 

क्या पता उनकी मुस्कान के पीछे कितना वीरान हो।


किसी की आँख में ठहरा हुआ पानी देखा है? 

कभी ख़ामोशी का भी कोई मानी देखा है? 

जो लोग हर महफ़िल में हँसते रहते हैं, 

क्या तुमने उनके भीतर का खाली मकान देखा है?


अब न किसी से वफ़ा का दावा करते हैं, 

न बेवजह किसी से कोई शिकवा करते हैं। 

ज़िंदगी ने इतना तो सिखा ही दिया, 

लोग अक्सर वही करते हैं, जो अपने लिए बेहतर समझते हैं।


मगर एक सवाल दिल में ठहर जाता है, 

हर गुज़रता हुआ लम्हा कुछ कह जाता है। 

जिसे हम उम्र भर अपना समझते रहे, 

वही एक दिन अजनबी बनकर रह जाता है।


न जाने कितने लोग अपने भीतर टूटे हैं, 

कितने ख़्वाब बिना आवाज़ के छूटे हैं। 

दुनिया ने तो बस चेहरों को पढ़ा है, 

किसी ने देखा ही नहीं कि अंदर से कितने लोग रूठे हैं।


किसी को खोकर भी ज़िंदगी चलती रहती है, 

मगर एक कमी उम्र भर खलती रहती है। 

लोग कहते हैं कि वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है, 

कुछ यादें हैं जो वक़्त के साथ और गहरी होती रहती हैं।


न कोई शिकवा मुकम्मल, न कोई फ़साना मुकम्मल, 

हर शख़्स के हिस्से में नहीं आता ज़माना मुकम्मल। 

हम उम्र भर तलाशते रहे सुकून अपने भीतर, 

और उम्र गुज़र गई, मगर न हुआ ख़ुद से मिलना मुकम्मल।


कुछ दर्द लफ़्ज़ों में नहीं उतरते, 

बस उम्र भर इंसान के साथ चलते हैं ।



हे ईजा दिदा – मीकू पिछौड़ो रंगै दे ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

गीत का परिचय एवं विवरण

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

'हे ईजा दिदा – मीकू पिछौड़ो रंगै दे' एक मधुर कुमाऊँनी लोकगीत है, जिसमें उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल की पारंपरिक लोकसंस्कृति, पारिवारिक स्नेह, पहाड़ी श्रृंगार और लोकजीवन की सुंदर झलक देखने को मिलती है। गीत में एक पहाड़ी युवती अपनी ईजा और दिदा से लाल बुराँश के फूलों जैसी फुलकारी वाला पिछौड़ा और पैंजणिया माँगती है। हरेला कौतिक, सहेलियों के साथ झोड़ा, ढोल-दमाऊँ की थाप, हुड़ुक की धुन, नंदा-सुनंदा मैया और गोल्ज्यू देवता की आराधना गीत को विशेष सांस्कृतिक पहचान प्रदान करते हैं। इसमें प्रेम, उल्लास, पारिवारिक अपनापन और पहाड़ की प्राकृतिक सुंदरता का सुंदर समन्वय है। यह गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अपनी बोली, परंपरा, संस्कृति और पहाड़ी पहचान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक विनम्र प्रयास भी है।

(अपणि बोली, अपणि पछ्याण, अपणि संस्कृति, अपणि शान!)

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'हे ईजा दिदा – मीकू पिछौड़ो रंगै दे'

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


हे ईजा दिदा...

मीकू पिछौड़ो रंगै दे...

लाल बुराँश फूलों की...

फुलकारी लगै दे...


हे ईजा दिदा...

मीकू पिछौड़ो रंगै दे...



मी आज हरेला कौतिक में जाणूं...

अपणी सहेलिन संग झोड़ा खेलण जाणूं...

मी आज हरेला कौतिक में जाणूं...

अपणी सहेलिन संग झोड़ा खेलण जाणूं...


म्यारो सौंजड़्यो भी वखि मिलण औलो...

म्यारि पिछौड़ी देखि हँसण औलो...

वीं पिछौड़ी परै...

सुनौली गोट लगै दे...


लाल बुराँश फूलों की...

फुलकारी लगै दे...



हे ईजा दिदा...

मीकू पिछौड़ो रंगै दे...

लाल बुराँश फूलों की...

फुलकारी लगै दे...




हे दिदा मीकू पैंजणिया ल्यै दे...

छम-छम बाजण वाली घुँघरू लगै दे...

हे दिदा मीकू पैंजणिया ल्यै दे...

छम-छम बाजण वाली घुँघरू लगै दे...


ढोल-दमाऊँ कौतिक मां बाजण लागल...

सारी चेली झोड़ा खेलण लागल...

हुड़ुक की थाप मां...

मन मेरो रमि ग्यौ...


वीं पैंजणिया परै...

चाँदी की धार लगै दे...




हे ईजा दिदा...

मीकू पिछौड़ो रंगै दे...

लाल बुराँश फूलों की...

फुलकारी लगै दे...



नंदा-सुनंदा मैया का द्वार जाणूं...

गोल्ज्यू देवता का दर्शन करि आणूं...

नंदा-सुनंदा मैया का द्वार जाणूं...

गोल्ज्यू देवता का दर्शन करि आणूं...


फूल चढ़ैऊं...

दीप जलैऊं...

अपणि धरती की खुशहाली मांगूं...

सबका जीवन सुख सैं भरि जालैं...


मंदिर की घंटी...

घन-घन बाजै...




मी जब मेला बीच पहुंचि ग्यौं...

सौंजड़्यो बांसुरी बजांद दिखि ग्यौ...

मी जब मेला बीच पहुंचि ग्यौं...

सौंजड़्यो बांसुरी बजांद दिखि ग्यौ...


वो हँसि कै बोलो...

कख लै रै छू...

मी हँसि कै बोलूं...

तेरि बाट तकै छूं...


वो बोलो झोड़ा खेलण चल...

मी बोलूं पैलि गीत त गा...


वीं बांसुरी परै...

मीठी तान सुनै दे...




घुघुती उड़ि गै डाना-काना मां...

बुराँश खिलि गै सारा पहाड़ मां...


ईजा की ममता...

बाबू को प्यार...

भुला-भुलियों संग खुशियों की बहार...


नई पीढ़ी मिलि कै गीत सुनालैं...

अपणि कुमाऊँ की शान बढ़ालैं...



हे ईजा दिदा...

मीकू पिछौड़ो रंगै दे...

लाल बुराँश फूलों की...

फुलकारी लगै दे...



आ... पिछौड़ो रंगै दे...

ऐ... पिछौड़ो रंगै दे...


लाल बुराँश फूलों की...

फुलकारी लगै दे...