शनिवार, 5 सितंबर 2026

भादों की बरसात ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

भादों की बरसात 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


रात-रात भर मेघ बरसें, भीग गया आकाश,
धुंध ओढ़कर सोई घाटी, खोया अपना प्रकाश।
शिखरों पर बादल ठहरे, श्वेत रुई-से भार,
कभी घाटी से शिखर चढ़ते, कभी शिखर से पार।
हवा चली तो मेघ उड़े, जैसे स्वप्निल पंख,
चीड़-दल की दूर चोटियों पर बज उठे नीरव शंख।

काली की गर्जन सुन पड़ती - वन में सिंह पुकार,
शिलाओं से टकराकर उठती जल की हुंकार।
काला पानी दूर कहीं से लाता गहरा राग,
सीमा की उस घाटी में बहता निर्भय अनुराग।
धारचूला की भोर नहाती धुंधलके के नीर,
आदि कैलाश-पथ पर लिखते मेघ नए तदबीर।

धीरे-धीरे कोहरा छँटता, खुलते पर्वत-रंग,
धुंध-पटों में वृक्ष झलकते, जैसे चित्र अनंग।
सूरज की इक किरण उतरती, काँप उठे वन-पात,
ओस-बिंदुओं में झिलमिल करती स्वर्णिम प्रभात।
दूर किसी अनदेखे कीटों का मधुर गान,
काली की गर्जन में घुलता प्रकृति का संगीत महान।



मक्के की सुनहरी बालें भरती खेतों में हास,
बैंगनों के गोल फलों पर ठहरी हरित सुवास।
घास भरे पथ, भीगी धरती, हरियाली का छोर,
बादल, वर्षा, वन और घाटी - एक अलौकिक भोर।
फिर मेघ घिरें, फिर जल बरसे, फिर धुंध करे श्रृंगार,
भादों अपने भीगे आँचल में रचता नया संसार।

सीधी ढलती पर्वत-देह पर पानी दौड़े तेज,
कंकड़-पत्थर साथ बहाएँ, जल का कैसा वेग।
छोटी-छोटी धाराएँ मिलकर बनतीं जल की धार,
चट्टानों की देह तराशे बहता निर्मल प्यार।
ऊपर से झरने टूट पड़ें, शैल-वक्ष को चीर,
दूधिया धार लिपटती जाए, बनकर जल की लकीर।

फिर घिर आते मेघ अचानक, नभ हो जाता श्याम,
बिजली की तीखी रेखा लिखती अग्नि-पैगाम।
गरज-गरजकर मेघ बरसते, काँपे घाटी-पार,
गूँज उठें वन, शैल-शिखर सब, दहके नभ के द्वार।
एक चमक में दूर शिखर फिर उजले होकर हँसते,
दूजी चमक में वही शिखर धुंध के भीतर बसते।



कभी बादल घाटी उतरें, कभी शिखरों पर जाएँ,
एक चोटी से दूसरी चोटी उड़ते-उड़ते छाएँ।
हवा चले तो धुंध उड़े, उड़ते जाएँ मेघ,
पर्वत जैसे चित्रकार हों, बदल रहे हों लेख।
कहीं अचानक खुलता आकाश, कहीं घना अँधियार,
भादों हर पल बदल रहा है अपना रूप-श्रृंगार।

काली फैलाती जल-आँचल, भरती अपना पार,
शिलाओं से टकरा-टकराकर करती प्रचंड पुकार।
काला पानी गहरे स्वर में गाता अपना राग,
उसकी लहरों में सुन पड़ता शताब्दियों का जाग।
बिजली, बादल, काली, झरने - एक हुआ हुंकार,
भादों की इस घोर घड़ी में जाग उठा पहाड़।

फिर धीरे-धीरे वर्षा थमती, थकता नभ का शोर,
धुंध उतरकर बाँहों में ले ले पर्वत का छोर।
गीली चट्टानों पर चमके दिन का पहला नूर,
बादल की पतली चादर से झाँके पर्वत दूर।
और प्रकृति फिर मौन खड़ी हो, जैसे ध्यान लगाए,
भादों के इस भीगे मन में अपना गीत सुनाए।

टीन-छतों पर बूँदें बजतीं, टप-टप तीव्र पुकार,
पीतल, काँसे, मिट्टी-बर्तन - सबका अपना तार।
जिस पात्र में जलधुन उतरे, वैसा उसका राग,
भादों जैसे स्वयं रचता वर्षा का अनुराग।
अरबी के पत्तों पर जल ठहरे, मोती बनकर चमके,
केले के विस्तृत पत्ते जल से भर-भर दमके।

हल्दी-पत्र की कोमल देह में बूँदें जाएँ समा,
हवा चले तो सेमल झूमे, झरे जलधारा-सा।
सड़क किनारे शाखें डोलें, भीगे पत्ते भरपूर,
लंगूरों की आँखों से झाँके वर्षा का दस्तूर।
लंबी सड़क काली के संग-संग जाती जाए,
ऊँचे पर्वत से बहता पानी कंकड़ साथ बहाए।

भारत की हरित ढलानों का जल उतरे उस धार,
नेपाल की पर्वत-देह से आए जल अपार।
दोनों देशों की जल-धाराएँ काली में मिल जाएँ,
सीमा के सारे अर्थ उसी क्षण जैसे धुल जाएँ।
भादों जब धरती पर उतरता, सीमा कहाँ रह जाती,
काली मानव-खींची रेखाओं पर अपना गीत सुनाती।

पिथौरागढ़, सतगढ़, कनालीछीना, अस्कोट - मेघों का हरित विस्तार,
ओगला, डीडीहाट, थल, बेरीनाग - भीगा पर्वत-पार।
मुनस्यारी-मिलम से उतरी गोरी, गाती जल-राग अविराम,
जौलजीबी में काली से मिलकर गढ़ती जल का नया आयाम।
बलुवाकोट, धारचूला, दार्चुला - कुहासे में डूबा संसार,
आदि कैलाश की ओर बढ़ता भादों - मेघ, नदी, पर्वत-राग अपार।

धीरे-धीरे भोर उतरती, धुलता नभ का द्वार,
कोहरे की चादर में लिपटे, मौन शिखर अपार।
क्षण-क्षण धुंध की ओट हटे, उभरे पर्वत-रेख,
फिर कुहासा बाँहें फैलाकर ढक दे उनका लेख।
काली की गंभीर गूँज में घुलता भादों का गान,
प्रकृति को निहारो तो लगता - पर्वत स्वयं भगवान।




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