फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
संभल कर बोलना, लफ़्ज़ों का मोल होता है,
हर इक ज़ख़्म का दुनिया में खुला मरहम नहीं होता।
बहुत ऊँचा उड़ोगे तो हवा पहचान लेगी फिर,
परिंदों का हमेशा आसमाँ अपना नहीं होता।
जो चेहरे मुस्कुराते हैं, वही सबसे थके होते,
हर इक हँसते हुए चेहरे में इक दरिया नहीं होता।
कभी हालात इंसाँ को किताबों से बड़ा करते,
हर इक उस्ताद का हर सबक़ किस्सा नहीं होता।
कई रिश्ते तो बस ख़ामोशियों पर साँस लेते हैं,
हर इक झगड़े का मतलब फ़ैसला नहीं होता।
गिरा देता है अक्सर आदमी को उसका ही गुरूर,
हवा से लड़ने वाला पेड़ फिर ज़िंदा नहीं होता।
किसी की जीत पर इतना कभी मत इतराना तुम,
समय के हाथ में कोई मुकद्दर स्थिर नहीं होता।
जो अपने दर्द पर हर रोज़ हँसना सीख जाते हैं,
उन्हें दुनिया का कोई ग़म बहुत भारी नहीं होता।
भरोसा टूट जाए तो सदा आवाज़ रहती है,
मगर टूटा हुआ रिश्ता कभी पहला नहीं होता।
जहाँ मतलब की ख़ातिर लोग चेहरे बदल लेते,
वहाँ हर मुस्कुराता आदमी अपना नहीं होता।
कभी चुप रह के भी इंसाँ बहुत कुछ बोल देता है,
हर इक एहसास का लफ़्ज़ों में तरजुमा नहीं होता।
सफ़र में धूप जितनी हो, वही मंज़िल सिखाती है,
हमेशा छाँव में रहकर कोई दरख़्त बड़ा नहीं होता।
जो आँसू पी गया हँसकर, वही मज़बूत कहलाया,
हर इक रोने वाला कमज़ोर हो ऐसा नहीं होता।
किसी की हार पर खुशियाँ मनाना छोड़ दो यारों,
गिरा कल जो था, वो हर रोज़ गिरे, ऐसा नहीं होता।
मुसीबत जब भी आती है, पता सबका बता देती,
हर इक अपना मुसीबत में दिखाई नहीं होता।
कभी किरदार की ख़ुशबू भी महका कर तो देखो तुम,
महकने के लिए हर बार इत्र ज़रूरी नहीं होता।
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जो ख़ुद से जीत जाता है, वही दुनिया भी जीतता है,
हर इक मैदान में तलवार, होने से ही नहीं होता।
समंदर भी कभी-कभी किनारों से सीखता होगा,
हमेशा डूब जाने से ही गहराई का पता नहीं होता।
वक़्त की धूप ने हमको बहुत कुछ सिखला डाला है,
हर इक ठोकर का मतलब, सिर्फ़ गिर जाना नहीं होता।
उसी इंसान की बातें सदा दिल में उतरती हैं,
जिसे ख़ुद पर गुरूर-ए-इल्म का पर्दा नहीं होता।
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 04 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
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