प्रकृति-सुषमा
🌸 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सुरम्य, सुकोमल, सुकुमार, सुरभित,
सजल, स्निग्ध, सौम्य, सतरंगी, सुषमामयी सुशोभित।
सुकांति, सुवासित, सजीली, सदाबहार,
सघन, शीतल, स्वच्छंद, स्वर्णिम - अपरंपार ।
सरस सलिल-सी निर्मल, स्नेहिल समीर-सी प्यारी,
सुधामयी, स्वप्निल, सुषमा से सजी धरा न्यारी ।
सृष्टि की सरगम-सी मुखरित, सरस मधुरिमा ढलती,
सुकुमार किरणों में छिपकर स्वप्निल कलियाँ खिलती।
सिहरती सरिता, सरसिज मुसकाते, सघन वन झूमते,
सुगंधित समीर के संग सहस्र स्वप्न मन में घूमते।
साँझ की सुनहरी छाया में सिमटती धरा सुहानी,
सृष्टि की इस सुषमा के सम्मुख फीकी लगे कल्पना की कहानी।
सच तो यह है - शब्द जहाँ मौन हो जाएँ, वहाँ प्रकृति मुस्काती है,
प्रकृति हमारी कल्पना से भी अधिक सुंदर है - वह स्वयं कविता बन जाती है। 🌿🍃🌸 ☘️
सधन्यवाद
पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ाए।


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