प्रकृति का मौन
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कहा जाता है
कि प्रकृति मौन है।
पर कौन जानता है
कि मौन भी एक भाषा होता है—
जिसकी वर्णमाला में
पत्तों की थरथराहट,
धूप की धीमी चाल
और जल की अनकही स्मृतियाँ लिखी होती हैं।
मैंने देखा है—
एक पहाड़ को
सदियों से खड़े हुए।
उसने कभी अपनी ऊँचाई का परिचय नहीं दिया,
फिर भी बादल
उसके कंधों पर सिर रखकर
विश्राम करते रहे।
शायद स्थिरता
अपना परिचय स्वयं नहीं देती।
और नदी...
वह किसी ग्रंथ की रचयिता नहीं,
फिर भी उसकी देह पर
अनगिनत भूगोल लिखे हुए हैं।
वह जहाँ-जहाँ मुड़ी,
धरती का चेहरा बदलता गया।
मानो गति ही
जल की आत्मकथा हो।
वन के भीतर खड़े वृक्ष
मुझे हमेशा वृद्ध ऋषियों जैसे लगे हैं।
वे बोलते नहीं,
केवल अपनी छाया को
धीरे-धीरे पृथ्वी पर उतारते रहते हैं।
जैसे कोई अनुभवी मन
अपने निष्कर्षों को नहीं,
अपनी करुणा को बाँटता हो।
फूलों के पास
कोई इतिहास नहीं होता।
वे केवल एक सुबह खिलते हैं
और संध्या तक
अपने रंगों को समय के हवाले कर देते हैं।
किन्तु उनकी अल्पायु में भी
एक ऐसा वैभव होता है
जो साम्राज्यों की दीर्घायु को
निस्तेज कर देता है।
इधर शहर हैं।
काँच की दीवारों में कैद
अनगिनत प्रतिबिंब।
हर चेहरा
अपने ही बनाए हुए किसी दर्पण में
लगातार प्रवेश करता हुआ।
संचार के असंख्य माध्यम हैं,
पर संवाद
जाने किस पुराने जंगल में
रास्ता भटक गया है।
लोग जुड़े हुए दिखाई देते हैं,
पर भीतर कहीं
द्वीपों की तरह अलग-अलग पड़े हैं।
उनकी आँखों में
सूचनाओं की चमक है,
किन्तु सपनों की नमी
धीरे-धीरे वाष्पित होती जा रही है।
ऐसे समय में
एक पक्षी का अचानक गाना
मुझे किसी भूली हुई सभ्यता का
अंतिम शिलालेख लगता है।
एक पत्ती का गिरना
किसी ऋतु का नहीं,
अहंकार के एक और भ्रम का अंत प्रतीत होता है।
और आकाश...
वह आज भी उतना ही फैला है।
हमने देशों की रेखाएँ खींचीं,
धर्मों के घेरे बनाए,
पहचानों के दुर्ग खड़े किए,
किन्तु उसके विस्तार में
कहीं कोई सीमा अंकित नहीं हुई।
मानो अनन्तता
हर दिन हमारे ऊपर झुककर
हमारी छोटी-छोटी परिभाषाओं पर
मुस्करा देती हो।
तब लगता है—
प्रकृति का सौंदर्य
उसके रूप में नहीं,
उसकी विरक्ति में है।
वह सब कुछ रचती है,
पर किसी स्वामित्व का दावा नहीं करती।
वह सबको आश्रय देती है,
पर किसी स्मारक की आकांक्षा नहीं रखती।
और शायद यहीं
मनुष्य और प्रकृति के बीच
सबसे गहरा अंतर छिपा है।
मनुष्य अपने होने को सिद्ध करना चाहता है,
प्रकृति केवल होती है।
मनुष्य स्मृति में अमर होना चाहता है,
प्रकृति प्रत्येक क्षण में पूर्ण।
इसीलिए जब कभी
सभ्यता का शोर
बहुत अधिक हो जाता है,
मैं किसी जंगल की ओर नहीं,
अपने भीतर की उस जगह की ओर लौटता हूँ
जहाँ अब भी
एक नदी बह रही है,
एक पहाड़ खड़ा है,
एक वृक्ष छाया दे रहा है,
और एक आकाश
बिना किसी शर्त के फैला हुआ है।
वहीं समझ में
आता है—
कि जीवन का सबसे गहरा सत्य
किसी उद्घोषणा में नहीं,
बल्कि उन चीज़ों में छिपा है
जो चुप रहकर भी
समय की सबसे लंबी बातचीत करती रहती हैं।


