मौन शिखर के महायोगी (कविता)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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मौन शिखर पर ध्यानमग्न यह दिव्य पुरुष भगवान कौन,
श्वास-श्वास में सृष्टि समेटे, कालजयी यह ध्यान कौन।
हिम भी जिसके चरण पखारे,
भोर जिसे प्रणाम उचारे,
जटा-जूट में सिंधु समेटे, वह असीम वरदान कौन।
चन्द्रकला मुस्कान बनी है,
भस्म विभूति पहचान बनी है,
तीनों लोकों का पथ आलोकित, वह ज्योतिर्मय प्राण कौन।
डमरू की गंभीर थाप पर,
नाच उठे युग, देश और अंबर,
नाद-ब्रह्म की पहली धड़कन, उसका दिव्य विधान कौन।
विष पीकर भी अमृत बरसाए,
रोते मन को हँसना सिखलाए,
नीलकण्ठ की करुणा जैसा, जग में और महान कौन।
त्रिनयन की ज्वाला में जलकर,
मिट जाए हर छल भीतर का,
सत्य-अग्नि का मौन पुजारी, ऐसा तप का धाम कौन।
नाग बने हैं हार गले के,
भूत-गणों के साथ चले वे,
राजसिंहासन छोड़ विराजे, वन का वह सुलतान कौन।
शब्द जहाँ सब थम से जाते,
मंत्र स्वयं स्वर बनकर गाते,
शून्य स्वयं जिसकी वंदना करे, वह परम प्रमाण कौन।
कैलासों की नीरव चोटी,
जिससे पाती अमर ज्योति,
कण-कण में जो स्वयं प्रकाशित, वह अनंत अविराम कौन।
मन के भीतर द्वार खुलें जब,
अहंकार के बादल छँटें तब,
अपनी ही धड़कन से बोले— "शिवोऽहम्" का ज्ञान कौन।
प्राण-प्राण में वही समाया,
जग ने जिसको शिव कहलाया,
आदि न जिसका, अंत न जिसका— वह सनातन प्राण कौन।
हर-हर महादेव। भक्ति -भाव से परिपूर्ण अत्यंत मनमोहक अभिव्यक्ति सर।
जवाब देंहटाएंसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ११ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
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सादर
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