बुधवार, 5 अगस्त 2026

मंगल गीत (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

मंगल गीत (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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"मंगल गीत" प्रकृति के विविध रूपों में निहित जीवन-दर्शन का सहज, सरस और प्रेरणादायी काव्य है। इसमें सूर्य, नदी, वृक्ष, पवन, पंछी, धरती और चाँद जैसे प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से साहस, निरंतरता, विनम्रता, प्रेम, विश्वास, सेवा, करुणा और मानवता जैसे शाश्वत जीवन-मूल्यों का संदेश दिया गया है। यह कविता केवल प्रकृति का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन जीने की दिशा दिखाती है और उसे स्वयं के साथ-साथ समस्त सृष्टि के कल्याण का पथ अपनाने की प्रेरणा देती है।

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सूरज कहता रोज़ निकलकर,

तम से कभी न घबराना।

दीपक बनकर स्वयं जलो तुम,

औरों का पथ भी चमकाना।


नदियाँ कहतीं बहते रहना,

रुकना जीवन की रीति नहीं।

चट्टानों से हँसकर मिलना,

संघर्षों से प्रीति सही।


वृक्ष सिखाते फल से झुकना,

छाया देना जीवन भर।

पत्थर खाकर भी मुस्काना,

यही मनुज का सच्चा स्वर।


पवन कहता मुक्त विचरना,

मन में निर्मल गंध बसाओ।

जहाँ पहुँचो वहाँ प्रेम की,

मधुर सुवास सदा फैलाओ।


पंछी कहते नभ छोटा है,

यदि विश्वास तुम्हारे संग।

साहस के दो पंख लगाओ,

जीत सुनिश्चित हर एक जंग।


धरती कहती बीज बनो तुम,

जिससे हरियाली मुस्काए।

प्रेम, दया, सेवा के अंकुर,

हर मानव के मन उपजाए।


चाँद सिखाता शीतल रहना,

तपते मन को शांति देना।

अपने सुख से पहले सीखो,

दुखियों को भी हँसी देना।


प्रकृति पुकारे एक स्वर में—

मानव! अपना धर्म निभाओ।

स्वार्थ छोड़कर प्रेम जगाओ,

धरती को स्वर्ग स्वयं बनाओ।


सोमवार, 3 अगस्त 2026

तुम्हारे घर के पास (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

तुम्हारे घर के पास (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



तुम्हारे घर के पास

एक सड़क है—

जो किसी नक़्शे में

सिर्फ़ सड़क है,

पर मेरी स्मृतियों में

वह आज भी धड़कती हुई नस है।


उस पर चलते हुए

मैंने कई बार

अपने कदमों की आहट से अधिक

अपने मौन को सुना है।


तुम्हारे घर के पास

एक गुलमोहर है।


वह हर साल

लाल हो जाता है,

पर किसी ने कभी नहीं पूछा—

फूल खिलते हैं,

या पेड़

अपना रक्त धीरे-धीरे

धरती को सौंप देता है?


कभी वहीं

हमने भविष्य का एक छोटा-सा घर बनाया था—

ईंटों से नहीं,

उन शब्दों से

जिन्हें बोलते समय

हम दोनों को लगता था

कि भाषा अमर होती है।


फिर समय आया।


उसने कोई शोर नहीं किया।

बस

तुम्हारे नाम के आगे

किसी और का उपनाम जोड़ दिया,

और मेरे भीतर

एक पूरा नगर

बिना भूकम्प के

ढह गया।


अब भी

तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हूँ।


वहाँ

न तुम मिलती हो,

न वह लड़का

जो तुम्हें देखकर

अपनी उम्र से बड़ा हो जाता था।


केवल एक कुत्ता

मुझे पहचानकर

क्षणभर ठहर जाता है।


सोचता हूँ—

क्या स्मृतियाँ

मनुष्यों से पहले

जानवरों के पास शरण ले लेती हैं?


तुम्हारे घर की खिड़की

अब भी वहीं है।


पर परदे बदल गए हैं।


अजीब है—

कभी-कभी

जीवन में सबसे पहले

रंग बदलते हैं,

फिर चेहरे,

फिर संबोधन,

और अंत में

हम स्वयं अपने लिए

अजनबी हो जाते हैं।


मोबाइल की स्क्रीन पर

अब प्रेम

हरे बिंदुओं में जलता है,

नीले टिकों में टूटता है,

और आख़िरी बार

'ऑनलाइन' दिखकर

सदैव के लिए

अनुपस्थित हो जाता है।


किसी ने कहा था—

प्रेम मिलन है।


पर मुझे लगता है,

प्रेम शायद वह है

जो बिछड़ जाने के बाद भी

किसी अनजान मोड़ पर

अचानक

तुम्हारे शहर की हवा बनकर

फेफड़ों में उतर आता है।


मैंने कई बार चाहा

कि तुम्हारे घर के पास से

किसी दूसरी सड़क पर मुड़ जाऊँ।


पर कुछ रास्ते

पैर नहीं चुनते,

वे भीतर का कोई अधूरा वाक्य चुनता है।


तुम्हारे घर के पास

अब एक नया कैफ़े खुल गया है।


वहाँ

नए प्रेमी बैठते हैं।


उनकी हँसी में

मैं अपना बीता हुआ कल नहीं खोजता,

केवल यह सोचता हूँ—

क्या हर पीढ़ी

प्रेम को पहली बार जीती है,

या हर बार

उसी प्राचीन घाव पर

एक नया नाम लिख देती है?


मैं लौट आता हूँ।


पर सच कहूँ—

मैं कभी लौट नहीं पाता।


क्योंकि मनुष्य

घर से नहीं,

अपने अनकहे प्रेम से सबसे अधिक निर्वासित होता है।


और तब

रात के सबसे शांत पहर में

एक प्रश्न

दरवाज़े पर दस्तक देता है—


क्या सचमुच

मैं तुम्हारे घर के पास से गुज़रता हूँ...


या आज भी

तुम ही

मेरे भीतर बने उस घर के पास रहती हो,

जिसका पता

समय कभी बदल नहीं पाया?

एक टूटी हुई शाम (कविता) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

एक टूटी हुई शाम (कविता)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

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"एक टूटी हुई शाम' केवल संध्या का दृश्य नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे फैलती उस अदृश्य दरार का प्रतीक है, जहाँ संबंध, विश्वास, स्मृतियाँ और संवेदनाएँ मौन होकर बिखरने लगती हैं। यह कविता प्रकृति के बिंबों के माध्यम से हमारे समय की आत्मिक विडंबनाओं, अकेलेपन और मानवीय मूल्यों के क्षरण को अभिव्यक्त करती है। कविता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती; बल्कि एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाती है, जिसका उत्तर प्रत्येक पाठक को अपने भीतर खोजना होगा। यही इसकी संवेदना है, यही इसका प्रतीकात्मक सौंदर्य।"
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शाम आज फिर

किसी पुराने आईने की तरह

बिना आवाज़ के चटक गई।


सूरज ने

अपने सुनहरे वस्त्र

क्षितिज की देहरी पर उतार दिए,

और आकाश ने

लालिमा नहीं,

एक मौन शोक पहन लिया।


हवा गुज़री—

पर पेड़ों ने

पत्तों से कोई संवाद नहीं किया।

लगता था

जड़ों तक पहुँच चुकी है

किसी अदृश्य दरार की ख़बर।


नदी बहती रही,

किन्तु उसका जल

जैसे अपने ही प्रतिबिंब से

नज़रें चुरा रहा था।


एक पक्षी लौटा,

पर अपने घोंसले पर नहीं बैठा।

शायद

घोंसले भी कभी-कभी

घर होने से इनकार कर देते हैं।


दीपक जल रहा था,

पर लौ की थरथराहट में

हवा का दोष नहीं था;

कुछ अँधेरे

बाहर से नहीं,

मनुष्य के भीतर से उठते हैं।


मैंने देखा—

शाम केवल आकाश में नहीं टूटती,

वह टूटती है

उन आँखों में

जो अब भी प्रतीक्षा करती हैं।


वह टूटती है

उन रिश्तों में

जहाँ शब्द जीवित हैं,

पर अर्थ मर चुके हैं।


वह टूटती है

उन नगरों में

जहाँ रोशनी बहुत है,

पर किसी चेहरे पर

सवेरा नहीं उतरता।


और तब लगा—

हर टूटी हुई शाम

दरअसल समय की नहीं,

मनुष्य की आत्मा में पड़ी

उस महीन दरार का नाम है

जिसे सभ्यता

विकास कहकर छिपा देती है।


अब प्रश्न शाम का नहीं है...


टूटा कौन है—

क्षितिज,

सूरज,

या वह मनुष्य

जिसने अपने भीतर का उजाला

सबसे पहले खो दिया था?

रविवार, 2 अगस्त 2026

फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी (एक टुकड़ा लम्हा) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

फ़लसफ़ा ऐ ज़िंदगी 

(एक टुकड़ा लम्हा)

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


कोई याद रखे न रखे, तुम याद रखना,

अपना हर कदम इंसानियत के साथ रखना।


उठे हाथ तो किसी मूरत को नहीं,

किसी टूटे हुए मन का आसमान थाम लेना।


बहुत नासमझ मिलेंगे राहों में,

उनकी आवाज़ नहीं, उनकी खामोशी पढ़ना।


अपने हिस्से की लड़ाई लड़ना,

पर किसी और की रोटी पर तलवार मत रखना।


जब भी आईना देखो,

चेहरा नहीं, अपने भीतर का मौसम देखना।


हर चमक सोना नहीं होती,

कुछ उजाले कब्रों से भी उठते हैं।


पेड़ बन सको तो छाँव देना,

दीवार बनो तो किसी का रास्ता मत रोकना।


शहर तुम्हें तालियाँ देगा,

गाँव तुम्हें दुआएँ देगा—फ़ैसला तुम्हारा होगा।


समंदर बनने की ज़िद से पहले,

किसी प्यासे की हथेली भर प्यास बनना।


जो लोग बहुत ऊँचा उड़ते हैं,

अक्सर उन्हें ज़मीन की ख़ुशबू याद रहती नहीं।


हर जीत के बाद थोड़ा हार रखना,

अपने ही अहंकार से खुद को पार रखना


कभी किसी रोते हुए चेहरे के पास बैठना,

सलाह से पहले अपना मौन रखना।


रिश्ते धागों से नहीं टूटते,

अनकहे शब्दों के बोझ से बिखरते हैं।


जिस दिन तुम्हारे पास सब कुछ हो,

उस दिन किसी अभावग्रस्त की आँखों में अपना कल देखना।


किताबों से ज्ञान लेना,

पर जीवन का अर्थ किसी मज़दूर की हथेलियों से पढ़ना।


फूल बनो तो ख़ुशबू बाँटना,

काँटे बनो तो अपने ही अहंकार को चुभना।


समय कभी किसी का नहीं हुआ,

फिर भी लोग घड़ियों पर उम्र टाँगते रहे।


जो टूटकर भी मुस्कुराते हैं,

असल में वही दुनिया को सहारा बांटते हैं।


अगर कभी बहुत अकेले पड़ जाओ,

तो किसी बूढ़े बरगद से बातें कर लेना।


हर सवाल का जवाब मत ढूँढना,

कुछ प्रश्न ही मनुष्य को मनुष्य बनाए रखते हैं।


जब दुनिया तुम्हें सफल कहे,

तो अपने भीतर बैठे बच्चे से पूछ लेना—

क्या वह अब भी बेवजह हँसता है?


और अंत में...

यदि कभी तुम्हारे जाने के बाद

लोग तुम्हारा नाम भूल भी जाएँ,

तो इतना भर होना चाहिए—

किसी अनजान की दुआ में

तुम्हारा किया हुआ एक छोटा-सा अच्छा काम

अब भी साँस ले रहा हो।