अपने हिस्से की धूप
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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मनुष्य का जीवन केवल समय का नहीं, बल्कि रिश्तों, दायित्वों और अपेक्षाओं का भी एक लंबा सफ़र है। इस यात्रा में वह अपनों के लिए जीते-जीते अक्सर स्वयं से ही दूर हो जाता है। यह कविता उसी मौन पीड़ा और जीवन-सत्य की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है—जहाँ रिश्तों का सम्मान भी है और अपने अस्तित्व को बचाए रखने की विनम्र पुकार भी। "अपने हिस्से की धूप" हमें स्मरण कराती है कि यदि जीवन में कुछ पल स्वयं के लिए भी बचा लिए जाएँ, तभी रिश्तों की छाँव और जीवन की धूप दोनों का वास्तविक अर्थ समझा जा सकता है।
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अपने हिस्से की धूप
जीवन सब रिश्तों में बाँटा, मेरे हिस्से कुछ बचा नहीं,
दूर क्षितिज को ताक रहा था, पास पड़ा कुछ दिखा नहीं।
आते-जाते हर रिश्ते में, कोई रिश्ता बचा नहीं,
जीवन भर क्या पाया जग में, मेरे हिस्से कुछ बचा नहीं।
सुबह उगी तो स्वप्न बटोरें, साँझ हुई तो थककर सोए,
दिन की धूप पराई निकली, अपने आँगन दीप न रोए।
नदियों-सा बहते ही गुज़रे, सागर बनना याद रहा नहीं,
पत्तों जैसे झरते मौसम, मन का वन फिर हरा नहीं।
सबके आँसू अपनी आँखों में, अपनी पीड़ा कह पाया नहीं,
हर मुस्कान की कीमत दी, अपना चेहरा पढ़ पाया नहीं।
पर्वत-सा दायित्व उठाया, पंछी-सा उन्मुक्त उड़ा नहीं,
भीड़ बहुत थी जीवन-पथ पर, स्वयं से लेकिन मिला नहीं।
थोड़ी देर स्वयं के संग भी, बैठ सकूँ तो बात बने,
मन के सूने आँगन में फिर, कोई चुप-सी भोर तने।
साँस-साँस जग को सौंप दी, अपने लिए जिया नहीं,
भीतर बैठा जो मैं था, उससे कभी मिला नहीं।
रिश्ते जीवन की छाया हैं, उनसे सुंदर जग में क्या,
पर अपने मन का द्वार खुला हो, इससे बढ़कर सुख भी क्या।
जो हर दिन थोड़ा स्वयं से मिले, वही सचमुच जीता है,
वरना जीवन सबको देकर, मन अपना ही रीता है।
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