फ़लसफ़ा-ए-ज़िंदगी
(एक टुकड़ा लम्हा)
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
कोई रिश्ता अगर ख़ामोश होकर भी महकता है,
यक़ीन मानो वही रिश्तों का सबसे सच्चा मौसम है।
हमने चेहरों से ज़्यादा आँखें पढ़ना सीख लिया,
लफ़्ज़ अक्सर झूठ बोलते हैं, ख़ामोशियाँ नहीं।
बहुत ऊँचा था वो अपने ही तकब्बुर की वजह से,
हवा चली तो सबसे पहले वही दरख़्त टूटा।
घर बड़ा होने से तन्हाई नहीं मर जाती,
एक अपना-सा इंसान हो तो झोपड़ी भी काफ़ी है।
उम्र भर आईने बदलने में लगे रहे लोग,
किसी ने ख़ुद को बदलने की ज़हमत न उठाई।
धूप ने मुझसे कहा—चल, मैं तुझे तपाऊँगी,
छाँव ने हँसकर कहा—पहले सफ़र तो कर।
जो अपने दर्द को दुनिया की दुआ कर दे,
वही इंसान ज़माने से बड़ा हो जाता है।
मिट्टी ने हर बार मुझे झुकना सिखाया,
इसीलिए शायद मैं गिरकर भी बिखरा नहीं।
रात भर चाँद से बातें तो बहुत की हमने,
सुबह मालूम हुआ, जवाब अपने भीतर था।
बहुत संभाल के रखिए जनाब अपने लहजे को,
यही एक चीज़ है जो लौटकर नहीं आती।
हर एक जीत का चेहरा चमकता ज़रूर है,
मगर उसके पीछे कई हारें दफ़्न होती हैं।
दुआ देने वाले हाथ कभी ख़ाली नहीं रहते,
ये कारोबार किसी बाज़ार का मोहताज नहीं।
जिस दिन अपने होने का गुरूर उतर जाएगा,
उसी दिन हर आदमी अपना-सा लगने लगेगा।
कुछ लोग किताबों की तरह उम्र भर खुले रहे,
कुछ लोग एक सफ़्हा भी पढ़ने न दिए गए।
वक़्त ने जब भी मुझे आईना दिखलाया है,
मैंने अपने ही सवालों को खड़ा पाया है।
चराग़ बनने की चाहत हो तो जलना सीखो,
उजाले मुफ़्त में किसी के हिस्से नहीं आते।
रिश्ते आवाज़ से नहीं, एहसास से ज़िंदा रहते हैं,
वरना रोज़ मिलने वाले भी अजनबी निकलते हैं।
अपनी ख़ुशबू को हवाओं का सहारा न बनाओ,
फूल बनना है तो ख़ुद अपनी पहचान बनो।
ज़िंदगी ने यही सिखाया है मुसाफ़िर बनकर,
जो बाँटते चले गए, वही सबसे अमीर निकले।
मरने के बाद तस्वीरें ही नहीं बचतीं साहब,
अगर किरदार अच्छा हो तो लोग दुआओँ में भी रखते हैं।
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