बुधवार, 24 जून 2026

सूर्य से पहले की आग ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

सूर्य से पहले की आग

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


किसी ने नहीं देखा

कि पहाड़ की ऊँचाई में

कितनी टूटनों की राख मिली हुई है।

जो शिखर दूर से अटल दिखाई देता है,

वह भीतर

अनगिनत दरारों का संयम है।


नदी जब चट्टानों से टकराती है,

तो वह केवल रास्ता नहीं बनाती,

वह अपने ही स्वर का जन्म करती है।


जल का संगीत

कभी शांत घाटियों में नहीं,

प्रतिरोध की कठोर देह पर लिखा जाता है।


बीज को देखो—


धरती उसे फूलों का वचन देकर नहीं बुलाती।


पहले उसे

अँधेरे की गीली सुरंगों से गुजरना पड़ता है।


मिट्टी के नीचे,

जहाँ कोई ताली नहीं बजती,

जहाँ कोई नाम नहीं पुकारता,

वहीं से

हर हरियाली की शुरुआत होती है।


बाँस के भीतर

बहुत पहले से संगीत नहीं रहता।


हवा को स्वर बनने से पहले

घावों की एक पूरी वर्णमाला से गुजरना पड़ता है।


जंगल इसलिए नहीं गूँजता

कि बाँस मजबूत था,

जंगल इसलिए गूँजता है

कि उसने अपने रिक्त स्थानों को

स्वीकार कर लिया था।


सीप के भीतर पलता मोती

समुद्र का उपहार नहीं,

एक चुभन की दीर्घ साधना है।


दर्द जब भागना छोड़ देता है,

तब वह

सौंदर्य में बदलने लगता है।


दीपक की लौ को भी

रात विरासत में नहीं मिली।


उसे हर क्षण

अपने ही तेल से

अँधेरे का मूल्य चुकाना पड़ता है।


बादल जब बरसते हैं,

तब केवल जल नहीं गिरता।


उनमें उड़ चुकी नदियों की स्मृतियाँ,

समुद्र की बेचैनियाँ,

और आकाश की लंबी यात्राएँ भी

धरती पर उतरती हैं

धूल कणों के साथ।


इस संसार में

कुछ भी अचानक नहीं खिलता।


न फूल,

न प्रकाश,

न मनुष्य।


सब कुछ

धीरे-धीरे पकता है—


जैसे धूप फलों में,

जैसे समय वृक्षों में,

जैसे विश्वास

एक थके हुए हृदय में।


कुम्हार के चाक पर घूमती मिट्टी

पहले चक्कर खाती है,

फिर आकार पाती है।


अग्नि से गुज़रे बिना

घड़ा कभी

जल का घर नहीं बनता।

कोयले की कालिमा में ही

हीरे का धैर्य पलता है।


और शंख की निस्तब्धता में

समुद्र

अपनी सबसे गहरी ध्वनि

छिपाकर रखता है।


तितली के रंगों के पीछे

एक कैद पड़ा हुआ कोकून होता है,

जिसे फाड़े बिना

आकाश तक पहुँचना संभव नहीं।


इसलिए

जब तुम्हें लगे

कि तुम्हारी मेहनत

पत्थरों में बोया गया बीज है,

जब प्रतीक्षा की सर्दियाँ

अस्थियों तक उतर आएँ,


जब पराजय


तुम्हारे दरवाज़े पर बैठकर

तुम्हारा नाम पुकारने लगे,

जब तुम्हारे श्रम का वृक्ष


सूखा हुआ प्रतीत हो—


तब स्मरण करना,


क्षितिज पर उगने वाला सूर्य

पहले कहीं दिखाई नहीं देता।


वह बहुत पहले


धरती के गर्भ में,

बीज की नमी में,

दीपक की लौ में,

सीप के घाव में,

कोयले की कालिमा में,

तितली के बंद पंखों में,

और मनुष्य के मौन धैर्य में

जलना शुरू हो चुका होता है।


भाग्य


आकाश से उतरने वाली

कोई रेखा नहीं।


वह पसीने की बूँदों में

धीरे-धीरे उभरता हुआ

प्रकाश है।


जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार

सफलता नहीं है—


बल्कि यह है


कि इतने अँधेरों के बाद भी


मनुष्य

प्रकाश पर विश्वास करना

नहीं छोड़ता।


और शायद

यही विश्वास

समय की सबसे कठिन रातों में भी


एक अदृश्य सूर्य की तरह


हमारे भीतर

जलता रहता है।


जब तक वह जलता है,

तब तक

कोई पराजय

अंतिम नहीं होती।


क्योंकि

हर भोर के पीछे

एक अनदेखी रात का तप होता है।


हर वृक्ष के पीछे

एक मौन बीज का विश्वास।


हर संगीत के पीछे

किसी पीड़ा की साधना।


और हर मनुष्य के भीतर

एक ऐसा सूर्य छिपा होता है

जो अवसर नहीं,

साहस की

प्रतीक्षा करता है।


जब वह जागता है,

तब इतिहास बदलता है।


तब रास्ते नहीं मिलते—

रास्ते बनते हैं।


तब मनुष्य

अपनी परिस्थितियों का उत्तर नहीं रहता,

वह स्वयं

एक संभावना बन जाता है।



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