शुक्रवार, 29 मई 2026

किस्से किस्तों में... ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 तेरी बेरुख़ी ने भी क्या कमाल कर दिया,

हम हँसते रहे और दिल बेहाल कर दिया।


वो इश्क ही क्या जिसमें तड़प बाकी न रहे,

आँखें सूख जाएँ मगर नमी बाकी न रहे।


तू छोड़ गया यूँ जैसे कभी था ही नहीं,

और हम आज तक तुझे खोया मानते रहे।


तेरे बाद ख़ामोशी भी चीख़ती रही,

हम रोते रहे और दुनिया देखती रही।


मोहब्बत में हारकर भी तुझी को चाहा,

ये कैसा ज़हर था जो मुस्कुरा के पिया।


दिल टूटा तो आवाज़ तक न आई,

जैसे टूटकर तारा कहीं खो गया हो।


वो कहकर गया था “ख़ुश रहना”,

और सारी ख़ुशियाँ साथ ले गया।


तेरे इश्क में खुद को मिटा बैठे,

अब आईना भी हमें पहचानता नहीं।


तू मिला भी अधूरा, तू गया भी अधूरा,

हमारा हर सपना रह गया अधूरा।


तेरी यादों का धुआँ आज भी उठता है,

दिल का शहर अब भी धीरे-धीरे जलता है।


हमने चाहा तुझे सजदे की तरह,

और तूने छोड़ा हमें गुनाह की तरह।


तेरी चुप्पी ने सबसे ज़्यादा मारा,

लफ़्ज़ कम थे मगर दर्द बहुत सारा।


तू किसी और की बाहों में हँसता रहा,

और मेरा दिल रातभर मरता रहा।


मोहब्बत की किताब में बस इतना पढ़ा,

जिसे टूटकर चाहो वही छोड़ जाता है।


वो इश्क भी क्या इश्क था साहिब,

जिसमें आँसू न हों और रातें न जागें।


तेरे बिना अब कोई शिकायत भी नहीं,

तू मेरा था ही नहीं — ये यक़ीन अब हुआ।


हमने दिल दिया था रोशनी समझकर,

वो अँधेरा देकर चला गया।


तूने पूछा भी नहीं हाल मेरे दिल का,

और हम तेरे हर दर्द की दुआ करते रहे।


कुछ रिश्ते टूटकर भी खत्म नहीं होते,

बस लोग चुप हो जाते हैं।


अब मोहब्बत से डर लगता है,

क्योंकि दिल आज भी तेरा नाम सुनकर धड़कता है।


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