बसंत पंचमी : ऋतुचक्र, चेतना और भारतीय जीवनबोध का उजास
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सारांश -
बसंत पंचमी भारतीय ऋतु-दर्शन, सांस्कृतिक चेतना और शैक्षिक परंपरा का ऐसा पर्व है, जिसमें प्रकृति और मनुष्य के बीच विद्यमान गहन संवाद स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होता है। यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन की सूचना नहीं देता, बल्कि जीवन में नवसृजन, सौंदर्य, बौद्धिक सक्रियता और मानसिक प्रसन्नता के पुनर्जागरण का संकेतक है। 23 जनवरी 2026 को मनाई जाने वाली बसंत पंचमी विशेष रूप से इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह शीत ऋतु के अवसान और बसंत ऋतु के औपचारिक प्रवेश का बौद्धिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक उद्घोष है।
इस शोध-लेख में बसंत पंचमी को केवल धार्मिक या अनुष्ठानिक पर्व के रूप में नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आलेख में प्रकृति के रूपात्मक परिवर्तन, पर्वत–नदी–झरनों की भूमिका, पीत वर्ण की प्रतीकात्मकता, संस्कृत भाषा और साहित्य की बसंती चेतना, विद्यार्थी जीवन पर इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा शिक्षा के सांस्कृतिक आधार का विश्लेषण किया गया है। यह लेखन प्रतीकात्मकता, सृजनात्मकता और यथार्थ—तीनों के संतुलन के साथ बसंत पंचमी के बहुआयामी अर्थ को उद्घाटित करता है।
प्रस्तावना -
भारतीय संस्कृति में ऋतुएँ केवल मौसम की अवस्थाएँ नहीं हैं; वे जीवन की आंतरिक लयों और चेतनात्मक परिवर्तनों की अभिव्यक्ति हैं। ऋतुचक्र के इसी क्रम में बसंत ऋतु को “ऋतुराज” की संज्ञा दी गई है—क्योंकि यह न केवल प्रकृति को नवजीवन प्रदान करती है, बल्कि मानव मन को भी नवीन ऊर्जा, उल्लास और सृजनशीलता से भर देती है। बसंत पंचमी इसी ऋतु का प्रथम मंगलाचरण है।
माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व उस क्षण का प्रतीक है, जब ठंड की जकड़न ढीली पड़ने लगती है, आकाश अधिक निर्मल प्रतीत होता है और धरती अपने भीतर सुप्त बीजों को अंकुरण के लिए प्रेरित करती है। 23 जनवरी 2026 की बसंत पंचमी इस दृष्टि से विशेष है कि यह पर्वतीय और मैदानी—दोनों भूभागों में प्रकृति के संक्रमण काल को स्पष्ट रूप से रेखांकित करती है।
बसंत पंचमी भारतीय समाज में शिक्षा, भाषा, साहित्य और बौद्धिक चेतना से गहराई से जुड़ी हुई है। यह दिन ज्ञान को बोझ नहीं, बल्कि उत्सव के रूप में देखने की प्रेरणा देता है। विद्यार्थी, शिक्षक और साधक—सभी के लिए यह आत्मपरीक्षण और नवआरंभ का अवसर होता है।
यह लेखन बसंत पंचमी को एक प्रतीकात्मक और मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से देखता है—जहाँ ऋतु परिवर्तन मनुष्य की आंतरिक चेतना के परिवर्तन से जुड़ जाता है।
1. बसंत ऋतु : प्रकृति का मनोविज्ञान और नवसृजन का क्षण -
बसंत ऋतु प्रकृति की वह अवस्था है, जब वह अपने मौन को तोड़कर पुनः संवाद करने लगती है। शीत ऋतु की जड़ता के बाद धरती में जो कंपन उत्पन्न होता है, वही बसंत का प्रथम संकेत है। पेड़ों की शाखाओं पर नई कोंपलें, सूखे तनों में हरियाली की हल्की रेखा और मिट्टी से उठती सोंधी गंध—ये सभी प्रकृति के मनोविज्ञान को उद्घाटित करते हैं।
पर्वतीय अंचलों में बसंत का आगमन और भी अर्थपूर्ण हो जाता है। हिम से ढके पर्वत जब धीरे-धीरे अपनी श्वेत चादर उतारते हैं, तब उनके भीतर से झरनों की कलकल ध्वनि फूट पड़ती है। यह ध्वनि केवल जल का प्रवाह नहीं, बल्कि जीवन की पुनर्स्थापना का घोष है। नदियाँ, जो शीत ऋतु में स्थिर और मौन हो जाती हैं, बसंत में पुनः चंचल हो उठती हैं।
हवा में हल्की-हल्की ठंड के साथ एक कोमल ऊष्मा का संचार होता है। यह वही क्षण है जब मौसम भी मनुष्य के साथ-साथ बदलता हुआ प्रतीत होता है। न अधिक ठंड, न अधिक गर्मी—बस एक संतुलित अनुभूति। यही संतुलन बसंत का मूल दर्शन है।
प्रकृति इस ऋतु में संगीतात्मक हो जाती है। पक्षियों का कलरव, पत्तों की सरसराहट और जल की लय—सब मिलकर ऐसा प्रतीत होता है मानो धरती स्वयं राग बसंत का आलाप कर रही हो। यह ऋतु मनुष्य को सिखाती है कि सृजन तभी संभव है, जब भीतर और बाहर—दोनों स्तरों पर संतुलन हो।
2. पीत वर्ण : प्रकाश, ऊर्जा और बौद्धिक चेतना का प्रतीक -
बसंत पंचमी का सबसे सशक्त प्रतीक पीला रंग है। यह रंग केवल दृश्य सौंदर्य तक सीमित नहीं, बल्कि गहन दार्शनिक अर्थ रखता है। पीला रंग सूर्य का प्रतिनिधि है—जो प्रकाश, ऊष्मा और जीवन का मूल स्रोत है।
बसंत में सरसों के पीले खेत धरती की प्रसन्नता का उद्घोष करते हैं। यह पीतिमा केवल रंग नहीं, बल्कि आशा का विस्तार है। मानव मन पर भी पीले रंग का विशेष प्रभाव पड़ता है—यह स्मरण शक्ति को जाग्रत करता है, मानसिक आलस्य को दूर करता है और बौद्धिक सक्रियता को प्रोत्साहित करता है।
यही कारण है कि बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र, पीले पुष्प और पीले व्यंजन प्रचलित हैं। यह परंपरा मनोवैज्ञानिक रूप से भी सार्थक है, क्योंकि यह मानव चेतना को उजास की ओर उन्मुख करती है।
पर्वतीय जीवन में पीला रंग और भी अर्थपूर्ण हो जाता है। सीमित समय के लिए खिलने वाले पीले पुष्प यह स्मरण कराते हैं कि सौंदर्य क्षणिक होते हुए भी गहन होता है। बसंत पंचमी इस क्षणिकता को स्वीकार करने और उसमें आनंद खोजने की शिक्षा देती है।
3. संस्कृत भाषा और बसंती चेतना : शब्दों में ऋतु का स्पंदन -
संस्कृत साहित्य में बसंत ऋतु का वर्णन केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि गहन भावात्मक और प्रतीकात्मक है। कालिदास के काव्य में बसंत केवल ऋतु नहीं, बल्कि चेतना की अवस्था है। “ऋतुसंहार” में बसंत का आगमन जिस प्रकार प्रेम, सौंदर्य और सृजन से जुड़ता है, वह भारतीय काव्य परंपरा की विशिष्टता है।
संस्कृत भाषा स्वयं ऋतुचक्र की भाँति प्रवाहमयी है। इसके शब्दों में प्रकृति की लय, नदी का प्रवाह और पर्वत की स्थिरता—तीनों समाहित हैं। बसंत पंचमी पर संस्कृत अध्ययन और साहित्यिक चिंतन का विशेष महत्व इसलिए है क्योंकि यह भाषा मनुष्य को प्रकृति के निकट ले जाती है।
विद्यार्थियों के लिए यह पर्व भाषा के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने का अवसर है। शब्द केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं रहते, बल्कि अनुभूति का माध्यम बन जाते हैं। बसंत पंचमी इस बोध को गहरा करती है कि भाषा और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
4. शिक्षा और विद्यार्थी जीवन में बसंत पंचमी का मनोविश्लेषणात्मक पक्ष -
बसंत पंचमी भारतीय शिक्षा परंपरा में एक विशेष स्थान रखती है। यह दिन विद्यारंभ, लेखन आरंभ और साधना के शुभारंभ से जुड़ा हुआ है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह समय अत्यंत अनुकूल होता है, क्योंकि प्रकृति का परिवर्तन मानव मस्तिष्क को भी सक्रिय करता है।
शीत ऋतु में मन अक्सर अंतर्मुखी और संकुचित हो जाता है, जबकि बसंत में वह विस्तार चाहता है। यही कारण है कि इस ऋतु में नई योजनाएँ, नए विचार और नए संकल्प जन्म लेते हैं।
बसंत पंचमी विद्यार्थियों को यह संदेश देती है कि शिक्षा केवल परीक्षा और परिणाम तक सीमित नहीं, बल्कि एक निरंतर साधना है। यह पर्व ज्ञान को बोझ नहीं, बल्कि आनंद के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।
शिक्षक और विद्यार्थी—दोनों के लिए यह दिन आत्ममूल्यांकन का अवसर होता है। क्या शिक्षा हमें अधिक संवेदनशील, अधिक विवेकशील और अधिक मानवीय बना रही है—बसंत पंचमी यही प्रश्न हमारे सामने रखती है।
5. पर्वत, नदी, आकाश और बसंत पंचमी का समग्र जीवनबोध -
पर्वतीय अंचलों में बसंत पंचमी का अनुभव विशेष रूप से गहन होता है। यहाँ पर्वत स्थिरता का, नदियाँ प्रवाह का और आकाश विस्तार का प्रतीक हैं। बसंत ऋतु इन तीनों के बीच संतुलन स्थापित करती है।
नदियों की कलकल ध्वनि, झरनों की छाल-छाल और आकाश में फैलती धूप—सब मिलकर जीवन के उस संगीत को रचते हैं, जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं, बल्कि उसका एक अंग अनुभव करता है।
बसंत पंचमी हमें यह बोध कराती है कि मानव जीवन भी एक ऋतुचक्र है—जहाँ ठहराव के बाद गति और अंधकार के बाद प्रकाश अनिवार्य है।
निष्कर्ष -
बसंत पंचमी भारतीय जीवन-दर्शन का उजास है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन केवल संघर्ष नहीं, बल्कि सौंदर्य, संतुलन और सृजन का नाम भी है। 23 जनवरी 2026 को मनाई जाने वाली बसंत पंचमी इस बार हमें यह स्मरण कराती है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष स्वयं को नवीकृत करती है, वैसे ही मानव को भी अपने विचारों, मूल्यों और दृष्टि का पुनर्संस्कार करना चाहिए।
यह पर्व शिक्षा को संवेदना से, ज्ञान को प्रकृति से और मनुष्य को चेतना से जोड़ता है। बसंत पंचमी वास्तव में उस उमंग का नाम है, जब जीवन स्वयं अपने भीतर से संगीत रचने लगता है।