Daman
रविवार, 31 अक्टूबर 2021
माइग्रेशन और रिवर्स-माइग्रेशन : एक पुनर्मूल्यांकन-* डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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*माइग्रेशन और रिवर्स-माइग्रेशन : एक पुनर्मूल्यांकन- *डॉ. चंद्रकांत तिवारी --------------------------------------- समाज समाजिक स...
रविवार, 25 जुलाई 2021
आंखों पर हिमालय भाग-2 ©डॉ चंद्रकांत तिवारी
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*आंखों पर हिमालय* * भाग-2 © डॉ. चंद्रकांत तिवारी बर्फीली चोटियां किसका मन नहीं मोहती। कौन है जो बरसात के सुखद आनंद को ना लेना चाहे। हर...
*जब मैंने हिमालय को देखा-*भाग-1*©डॉ. चंद्रकांत तिवारी-*
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*जब मैंने हिमालय को देखा-* भाग-1 *©डॉ. चंद्रकांत तिवारी-* - उत्तराखंड प्रांत जब मैंने हिमालय को देखा तो मैं कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया।...
रविवार, 20 जून 2021
Happy father's day-- Dr. Chandra Kant Tewari
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एक सीधी रेखा-सा बचपन रस्सी के दोनों छोर से गुजरता हम सबकी यादों का बचपन बहती नदी की धाराओं-सा लड़खड़ाता शोर कसकर तुम्हारे कंधों पर बैठा बाल...
शनिवार, 19 जून 2021
मेरा प्यारा उत्तराखंड ( कविता-डॉ. चंद्रकांत तिवारी)
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*_प्रकृति मनुष्य को जीवन देती है। उत्तराखंड जिसकी भौगोलिक संपदा का विशाल क्षेत्रफल पेड़ पौधों, वनस्पतियों,औषधियों से आच्छादित है। पर्वतीय प...
रचनात्मकता का प्रयास (डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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मानव सभ्यता का इतिहास रचनात्मकता एवं नवाचारों से भरा है। रचनात्मकता प्लेटो के अनुकरण सिद्धांत की परिधि से गुजरते हुए अरस्तू के अनुकरण सिद्ध...
भाषा का उदय और विस्तार ( डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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"भाषा का उदय और विस्तार"- जब समाज में विश्रृंखलता उत्पन्न होकर उसकी गति को अवरुद्ध कर देती है, चारों ओर अव्यवस्था का साम्...
वियोग की अनुभूति के कवि (डॉ.चंद्रकांत तिवारी)
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*'कविता लिखने की पहली शर्त कवि होना है'* *(वियोग की अनुभूति के कवि- कविवर श्री सुमित्रानंदन पंत जी के जन्मदिन पर विशेष-* *© डॉ चंद्...
मिट्टी के रंग (कविता-डॉ. चंद्रकांत तिवारी)
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किस मिट्टी के बनते हैं दीये जो रोशन करते हैं अंधेरे घर को झोपड़ी को और चौखट को खुशियों से भरते हैं। किस मिट्टी के बनते हैं दीये किस मि...
क्या अनिवार्य मिलिट्री सेवा से सेना का हित होगा ? पक्ष और विपक्ष* डॉ.चंद्रकांत तिवारी
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*क्या अनिवार्य मिलिट्री सेवा से सेना का हित होगा ? पक्ष और विपक्ष* ©डॉ.चंद्रकांत तिवारी *पक्ष-* मुझे तोड़ लेना बनमाली, उस पथ प...
प्रकृति का पुनर्मूल्यांकन डॉ. चंद्रकांत तिवारी
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*प्रकृति का पुनर्मूल्यांकन-* ©चंद्रकांत संपूर्ण ब्रह्मांड में एक से बढ़कर एक ग्रह, नक्षत्र उपग्रह मौजूद हैं। इन सबके बीच हमारी पृथ्वी भी अ...
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भोर की किरणें ( कविता- चंद्र कांत)
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ओस की बूंदों में सिमटी पत्तियां हरी घास के घरों में लिपटी पत्तियां डाल से टूटती-बिखरती पत्तियां अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाती पत्तियां। ...
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दीवारें ख़ामोश हैं (कविता- चंद्र कांत)
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आज बहुत लंबी बातें हुई चुपचाप,मौन बनकर एकटक निहारते देहली,छज्जे,आंगन के पत्थर और कुछ पेड़ों से झूलती टहनियों से आज बहुत वर्षों बाद गीली हो...
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