शुक्रवार, 29 सितंबर 2023

Nation is the only option above all - Dr. Chandra Kant Tewari - UTTARAKHAND - BHARAT

"Nation is the only option above all"

@Dr. Chandra Kant Tewari

UTTARAKHAND - BHARAT

The foundation of Indian culture and Indian knowledge tradition is nationalism, the feeling of dying for the nation, the feeling of sacrificing everything and becoming a world conqueror, the feeling of molding Indian culture, tradition and modernity in language, literature and cultural conduct and at the global level. But the feeling of making one's own stability can be seen as "Nation is the only option above all".

First of all, I am a common man from Bharat. I know how to repay the debt of my tradition and soil by giving place to the awakening song of India's cultural traditions in the heart temple. I am an ordinary person from Bharat and want to spread the sound of Hindutva in the whole world.

I am made of the soil of God's birthplace. I am made of the touch of every person of Bharat, the workers, the youth, the mother who gave birth, the sensitivities that provide unbreakable trust in relationships, the earth, fire, air, sky and the touch of Mother Ganga that provides salvation to life. . That is why I am an ordinary person of Bharat and am always ready to sacrifice for the nation while doing extraordinary work.

“Me for my country” is the only aim of my life. We have to move forward with the development journey of modern society, keeping our ancient culture intact. We have to recognize ourselves.

We should not forget who we were? Our past was glorious and rich. We were rich in character. Our country and countryside have always been rich in character. Many students are spreading knowledge and science in their countries by taking education from our country. India is a country of Guru tradition. Foot journeys have been undertaken here by saints like Guru Nanak Ji for the development of humanity.

We saw God in the stone and worshiped him. He kept Ganga in his head and gave her the status of mother. We worship the sun, moon and stars. This is our Bhartiya knowledge tradition. We have established all the principles and objectives of life on the formula “Atithi Devo Bhava”. Vedas, Upanishads and epics all present glimpses of Bhartiya knowledge tradition and national spirit. This is our nationality.

This is what gives us new energy and vibrancy with the inspiration of being Bhartiya. This is an ocean of sensations. Taking this ocean to heart, we will have to contribute our 100 percent towards the Indian nation, only then we will be able to establish justice towards the nation and every Bhartiya.

Bhartiya nationalist poets call for such heroes who sacrifice their lives for the service of the nation, who always remain in the front line for the service of the country by getting emotionally attached to the motherland. The call of such brave men is going to take the country on the path of progress and development. If the country has to develop, every person will have to contribute his 100 percent. We will have to move forward with the spirit of sacrificing everything for the motherland.

Calling upon us to have a self-motivated, self-disciplined and self-cultured spiritual consciousness which helps in the development journey of the organization while being disciplined by the mother, motherland and mother tongue, and to remain happy even in adverse circumstances and sacrifice everything for the nation. Work will have to be done taking the feelings into consideration.

Being Bhartiya, I inspire people to sacrifice everything for the country and appeal to the Bhartiya people to always remain dedicated to the unity, sovereignty and integrity of the country. This is the true national religion. Religion is supreme.

गुरुवार, 21 सितंबर 2023

वर्तमान दौर में अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस की उपादेयता -डॉ. चंद्रकांत तिवारी उत्तराखंड प्रांत

 वर्तमान दौर में अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस की उपादेयता - 

डॉ. चंद्रकांत  तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

 गुरुवार, 21 सितंबर

अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस 

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सर्व शान्ति: 

शान्तिरेव शान्ति:

सा मा शान्तिरेधि

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

यजुर्वेद के उपर्युक्त इस शांति पाठ मंत्र में सृष्टि के समस्त तत्वों व कारकों से शांति बनाये रखने की प्रार्थना की गई है।

मनुष्य प्रकृति की देन है जीवन अमूल्य है सुख शांति यश और वैभव के लिए मानव सभ्यता को शांति स्थापित करते हुए सतत विकास की संभावनाओं को अपनाते हुए सृजनात्मक कार्यों में अपना समय पूर्ण व्यतीत करना चाहिए।

वैश्वीकरण के इस दौर में युद्ध, असंतोष, अवसाद, पलायन, पर्यावरणीय असंतुलन संपूर्ण विश्व के समक्ष प्रमुख चुनौती है। इसलिए वर्तमान विश्व की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता शांति एवं भाईचारे की स्थापना करना भी है। आज कई लोगों का मानना है कि विश्व शांति को सबसे बड़ा खतरा साम्राज्यवादी आर्थिक और राजनीतिक चाल से है। विकसित देश युद्ध की स्थिति उत्पन्न करते हैं, ताकि उनके सैन्य साजो-समान बिक सकें। यह एक ऐसा कड़वा सच है, जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता।

विश्व शांति को लेकर भारत दुनिया के सबसे रिस्पॉन्सिबल देश के तौर पर देखा जाता है। आजादी के संघर्ष के समय से लेकर आजादी के बाद और आज के दौर तक भारत दुनिया के देशों के बीच हर प्रकार की शांति के लिए प्रयासरत रहा है। आज यूनाइटेड नेशन की पीस कीपिंग आर्मी में तीसरा सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन भारत का है।

यह शान्ति धर्ममूलक है। धर्मों रक्षित रक्षितः-ऐसा प्राचीन संदेश विश्व का अस्तित्व और रक्षा के लिए ही प्रेरित है। इसका मुख्य उद्देश्य, व्यक्ति, समाज और राष्ट्रों को आपसी द्वेष, असंतोष आदि से दूर कर शान्ति, सहिष्णुता आदि का पाठ पढ़ाना है।

वैश्विक शांति की स्थापना हेतु प्रतिवर्ष 21 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस या ‛विश्व शांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इसकी घोषणा 1981 में की गई तथा 1982 में पहली बार ‛अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस’ मनाया गया। 1982 से 2001 तक अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस सितंबर माह के तीसरे मंगलवार को मनाया जाता था लेकिन सन 2002 से 21 सितंबर को ‛अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस’ मनाने की तारीख निर्धारित की गई। इसका प्रमुख उद्देश्य है अहिंसा और संघर्ष विराम का अवलोकन करते हुए शांति के आदर्शों को मजबूत करना। संयुक्त राष्ट्र संघ कला, साहित्य, सिनेमा संगीत एवं खेल जैसे क्षेत्रों से अंतर्राष्ट्रीय शांति को बढ़ावा देने के लिए शांति दूतों की नियुक्ति भी करता है। इस दिवस को सफेद कबूतर उड़ाकर शांति का पैगाम भी दिया जाता है।

संप्रदायवाद एवं आतंकवाद वैश्विक शांति के समक्ष सबसे बड़े अवरोधक हैं। विविध प्रकार की आतंकी गतिविधियों से दुनिया के किसी न किसी कोने में हर रोज अस्थिरता देखने को मिलती है। हिंसा से हिंसा बढ़ती है, 'घृणा', घृणा को जन्म देती है और प्रेम से प्रेम की अभिवृद्धि होती है। अतः यह निश्चित है कि बिना प्रेम और अहिंसा के विश्व में शान्ति स्थापित नहीं हो सकती। शान्ति के अभाव में मानव जाति का विकास सम्भव नहीं।

आज विश्व के सभी धर्म, संप्रदाय, पंथ और आध्यात्मिक आस्था वाले समूहों में समन्वय की आवश्यकता है। अब परंपराओं और सिद्धांतों का सार लेकर रहन सहन के स्वस्थ तौर-तरीकों को विकसित करने की आवश्यकता है। आज सामाजिक संगठन की सबसे छोटी इकाई परिवार के पुनर्गठन की भी आवश्यकता है जोकि सदैव मानव की प्राथमिक पाठशाला रही है।

वर्तमान विश्व युद्ध, संघर्ष, पलायन, महामारी एवं पर्यावरण संकट जैसी अनगिनत समस्याओं का सामना कर रहा है। वर्तमान विश्व को सशंकित दृष्टि से देखते हुए इतिहासकार युवाल नोआ हरारी अपनी पुस्तक ‛21 Lessons for the 21st Century’ में कहते हैं कि, “अपनी प्रजाति को संगठित करने के लिए हमने मिथक रचे। खुद को शक्तिशाली बनाने के लिए हमने प्रकृति को वश में किया। अपने विचित्र उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हम जीवन की पुनर्रचना कर रहे हैं। लेकिन क्या हम अब भी खुद को जान पाए हैं या हमारे आविष्कार हमें अप्रासंगिक बना देंगे?

विश्‍व शांति का अर्थ केवल हिंसा न होना नहीं है, बल्कि ऐसे समाजों का निर्माण है जहां सभी को यह अहसास हो कि वे आगे बढ़ सकते हैं और फल-फूल सकते हैं. हमें एक ऐसी दुनिया का निर्माण करना है जहां सभी के साथ उनकी जाति, नस्‍ल, धर्म की परवाह किए बिना समान व्यवहार किया जाए. 1981 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिन, मानवता के लिए सभी मतभेदों से ऊपर उठने, शांति के लिए प्रतिबद्ध होने और शांति की संस्कृति के निर्माण में योगदान करने का दिन है।

पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने विश्व में शांति और अमन स्थापित करने के लिए पाँच मूल मंत्र दिए थे, इन्हें 'पंचशील के सिद्धांत' भी कहा जाता है। यह पंचसूत्र, जिसे 'पंचशील' भी कहते हैं, मानव कल्याण तथा विश्व शांति के आदर्शों की स्थापना के लिए विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था वाले देशों में पारस्परिक सहयोग के पाँच आधारभूत सिद्धांत हैं।

 इसके अंतर्गत निम्नलिखित पाँच सिद्धांत निहित हैं-

1- एक दूसरे की प्रादेशिक अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना।

2- एक दूसरे के विरुद्ध आक्रामक कार्रवाई न करना।

3- एक दूसरे के आंतरिक विषयों में हस्तक्षेप न करना।

4- समानता और परस्पर लाभ की नीति का पालन करना।

5- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति में विश्वास रखना।

माना जाता है अगर विश्व उपर्युक्त पाँचों बिंदुओं पर अमल करे तो हर तरफ़ सुख शांति समृद्धि होगी।

वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए अब तक अनगिनत प्रयास किए गए हैं। स्टॉकहोम सम्मेलन(1972) से लेकर ग्लासगो(2021) तक सतत प्रयास इसके प्रमुख उदाहरण हैं। दुनिया भर को परमाणु खतरों से बचाने के लिए अब तक पीटीबीटी(1963), एनपीटी(1968) तथा सीटीबीटी(1996) जैसी अनेक महत्त्वपूर्ण संधियाँ की गई हैं। युद्ध की परिस्थितियों तथा हथियारों की होड़ को खत्म करने के लिए निशस्त्रीकरण तथा शस्त्र नियंत्रण जैसी अवधारणाएं काम कर रही हैं। 

असंतुलित आर्थिक विकास भी संपूर्ण विश्व के समक्ष एक प्रमुख चुनौती है। अंधाधुंध औद्योगीकरण ने पर्यावरण असंतुलन को जन्म दिया है जोकि वैश्विक शांति की स्थापना में बाधक है।

लंबे उपनिवेशवादी दौर से मुक्त हुई दुनिया के समक्ष आज भी साम्राज्यवाद, बाजारवाद एवं उपभोक्तावाद की गंभीर चुनौती है जिसने गहरे असंतोष को जन्म दिया है। हथियारों की होड़ ने सम्पूर्ण विश्व को अब बारूद के मकान के रूप में तब्दील कर दिया है। हथियार निर्माण अब एक उद्योग का रूप ले चुका है जिसका उद्देश्य वैश्विक तनाव निर्मित कर हथियार बेचना है। रूस-यूक्रेन युद्ध समकालीन दुनिया का एक नग्न यथार्थ है कि विज्ञान एवं तकनीकी विकास के साथ हम आज भी युद्धों में उलझे हुए हैं। युद्ध और आंतरिक विघटन से पलायन की समस्या उत्पन्न हो रही है जिससे शरणार्थी समस्या समस्त विश्व के समक्ष एक बड़ी चुनौती साबित हो रही है।

शिक्षा में मानव सभ्यता का विकास है सकारात्मक और नैतिक मूल्य से संपन्न शिक्षा मानव चरित्र का आदर्श स्थापित करती है शिक्षा में समग्र मानव कल्याण की भावना शांति शिक्षा के रूप में पाठ्यक्रम में समाहित होनी चाहिए। क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य मानव कल्याण ही है और चरित्रवान व्यक्तित्व का निर्माण करना भी।

पाठ्यक्रम में ऐसी विश्व शांति संबंधी शिक्षा की परिकल्पना को स्थापित करते हुए विद्यालयी शिक्षा को नया आकार और रूप दिया जा सकता है। ऐसी व्यापक और समावेशी लोक हितकारी शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्यों में क्रमशः -

(1) व्यक्तियों का उचित बौद्धिक और भावनात्मक विकास हो सकेगा।

(2) सामाजिक जिम्मेदारी और एकजुटता की भावना विकसित हो सकेगी ।

(3) सभी के प्रति समानता और भाईचारे के सिद्धांतों का पालन किया जा सकेगा।

 (4) व्यक्ति की आलोचनात्मक एवं तर्कशील समझ विकसित एवं सक्षम बनाया जा सकेगा

उपर्युक्त शांति शिक्षा की अवधारणा काफी व्यापक और वास्तव में सकारात्मक एवं सृजनात्मक है। शांति शिक्षा की आवश्यकता और महत्व अपरिहार्य है । क्योंकि इसका उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को एक-दूसरे के साथ शांति से रहना सिखाना है। यह हिंसा को हतोत्साहित करता है और समानता को बढ़ावा देता है। विश्व बंधुत्व की भावना का विकास करता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, विश्‍व शांति का अर्थ केवल हिंसा न होना नहीं है, बल्कि ऐसे समाजों का निर्माण है जहां सभी को यह अहसास हो कि वे आगे बढ़ सकते हैं और फल-फूल सकते हैं. हमें एक ऐसी दुनिया का निर्माण करना है जहां सभी के साथ उनकी जाति, नस्‍ल, धर्म की परवाह किए बिना समान व्यवहार किया जाए।

वैश्विक शांति स्थापित करने में भारत सदैव अग्रणी देशों में शामिल रहा है। प्राचीन काल से ही शांति एवं सद्भाव भारतीय संस्कृति की मूल विशेषताएं रही हैं। भारत अनेक धर्मो की जन्मस्थली है। इन धर्मों ने दुनिया भर में शांति एवं मानवता का संदेश दिया। “वसुधैव कुटुंबकम” की अवधारणा हिंदू धर्म की प्रभु प्रमुख विशेषता रही है। बौद्ध एवं जैन धर्म ने दुनिया भर में अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह का पाठ पढ़ाया। सल्तनत काल, मुगल काल एवं ब्रिटिश काल में भी भारत ने सहिष्णुता को ही बढ़ावा दिया। भारत ने बाहर से आयी संस्कृतियों को भी अपने में समाहित किया। विभिन्न धर्मों के असंख्य संप्रदायों ने भी सदैव शांति एवं सद्भाव स्थापित करने की दिशा में न सिर्फ सैद्धांतिक विचारों का प्रतिपादन किया बल्कि सक्रियतापूर्वक आम जनमानस में उसका प्रचार प्रसार भी किया। उपनिवेशवाद के दौर में भी भारत ने रचनात्मक तरीके से संपूर्ण विश्व को शांति का संदेश दिया। स्वामी विवेकानंद का शिकागो में दिया गया भाषण आखिर कौन भूल सकता है? पराधीनता की स्थिति में भी यहां के विद्वानों ने न सिर्फ भारतीय समाज को जागृत किया बल्कि उनका असर पूरी दुनिया पर पड़ा। महात्मा गाँधी और उनका चिंतन मुख्य रूप से सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के तरीके पूरी दुनिया में लोकप्रिय हैं। महात्मा गाँधी के अहिंसक आंदोलन ने कई पराधीन देशों में स्वतंत्रता की अभिलाषा उत्पन्न की और उनके साधन अनेक देशों को स्वाधीनता प्राप्ति में सहायक साबित हुए। नेल्सन मंडेला जैसे लोगों को स्वाधीनता प्राप्ति की प्रेरणा और आत्मबल गाँधी से ही मिला। आज गाँधी की ‛सर्वोदय’ की अवधारणा समस्त विश्व के समक्ष विकास का एक समावेशी मॉडल है। 

वर्तमान दौर में हम एक वैश्वीकृत दुनिया में रह रहे हैं। यह दुनिया एक गाँव के रूप में तब्दील हो गई है जिसे मैकलुहान ने “ग्लोबल विलेज” की संज्ञा दी है। एक प्रक्रिया और प्रवाह के रूप में वैश्वीकरण ने दुनिया को एक दूसरे से जोड़ते हुए अंतरनिर्भरता को बढ़ावा दिया है। वैश्वीकरण के इस दौर में युद्ध, असंतोष, अवसाद, पलायन, पर्यावरणीय असंतुलन संपूर्ण विश्व के समक्ष प्रमुख चुनौती है। इसलिए वर्तमान विश्व की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता शांति एवं भाईचारे की स्थापना करना है। 

आज प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना होगा कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। मानव कल्याण की सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। भाषा, संस्कृति, पहनावे भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, लेकिन विश्व के कल्याण का मार्ग एक ही है। मनुष्य को नफरत का मार्ग छोड़कर प्रेम के मार्ग पर चलना चाहिए। 

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

संदर्भ - wikipedia-org

bharatdiscovery.org

hindicurrentaffairs.adda

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शनिवार, 2 सितंबर 2023

देव-मंदिर प्रकृति के अंश मात्र बिंब...! डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

देव-मंदिर प्रकृति के अंश मात्र बिंब...!

डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि ।

ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही ।

कबीर दास जी ने ईश्वर की महत्ता बताते हुये कहा है कि कस्तूरी हिरण की नाभि में होता है ,लेकिन इससे वो अनजान हिरन उसके सुगन्ध के कारण पूरे जगत में ढूँढता फिरता है ।ठीक इसी प्रकार से ईश्वर भी प्रत्येक मनुष्य के ह्रदय में निवास करते है, परन्तु मनुष्य इसें नही देख पाता । वह ईश्वर को मंदिर ,मस्जिद, और तीर्थस्थानों में ढूँढता रहता है ।

कबीर ने अन्यत्र भी कहा है कि -

मोको कहां ढूंढे रे बंदे,

मैं तो तेरे पास में ।

ना मंदिर में, ना मस्जिद में,

ना काबे कैलाश में ।

मैं तो तेरे पास में ।

निस्संदेह देव मंदिर आस्था के आध्यात्मिक केंद्र हैं। मनुष्य अपनी निष्क्रिय पड़ी हुई आध्यात्मिक चेतना को जगाने के लिए आस्था के केंद्र मंदिरों का भ्रमण करता है। परंतु आध्यात्मिक चेतना के लिए भक्तिमय होकर अपने आराध्य देव को ढूंढने का प्रयत्न करता है।

अनुभूति की अभिव्यक्ति और अभिव्यक्ति की अनुभूति ही आध्यात्मिक चेतना है। मंदिर वह पवित्र स्थान है जहांँ दिव्य ऊर्जा प्राप्त होती है। 

उत्तराखंड देवभूमि स्थान-स्थान पर देवी-देवताओं के मंदिरों से पवित्र भूमि का वरण करती है। यहांँ हिमालय से निकलने वाली मोक्षदायिनी मांँ गंगा शिव जटाशंकर त्रिदेवपुरी को भी नित-नित पावन करती है। यहांँ भक्ति पत्थर, मृदा,घाट, जल, वृक्ष, पहाड़ कई रूपों में दिखेगी। यह सभी स्थानीय पूजनीय स्थल हैं। 

भक्ति का स्वरूप तो सगुण और निर्गुण है। किसी ने मूर्तियों में अपने ईश्वर की तलाश कर ली और किसी को प्रकृति के कण-कण में ईश्वर का रूप दिखाई देता है । परंतु ईश्वर कहांँ है ? हम ईश्वर की तलाश क्यों करते हैं ? हम मंदिर क्यों जाते हैं ? यह स्वयं में शोध का विषय है। क्योंकि मनुष्य स्वयं की तलाश करते-करते एक ऐसे एकांत की तलाश करता है जो विभिन्न संस्कृतियों का नादमय सौंदर्य है और ऐसा सौंदर्य जो एकांत के उपजता है और पनपता है । मनुष्य को अकेला ना होकर एकांत प्रिय होना चाहिए। क्योंकि एकांतप्रिय सृजनात्मकता का प्रतीक है। नवाचार का प्रतीक है। तभी वह अपने ईश्वर की तलाश कर सकता है । हालांकि मंदिर की संरचना अपने आप में अलग है। नि:संदेह मंदिर एक ऐसा पवित्र स्थान है जहांँ हम सभी स्वार्थ भावनाओं से ऊपर उठकर परमार्थ की तलाश करते हैं अर्थात आत्म साक्षात्कार करते हैं।

प्रकृति सभी की जीवन सहचरी है। आधार स्थली है। यह सभी का साक्षात्कार करती है, अपने मौन प्रश्नों से। जिसके उत्तर लिखित कम प्रायोगिक अधिक हैं। 

प्रकृति ही ईश्वर है। देव-मंदिर प्रकृति के अंश मात्र बिंब...!

शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

व्यंग्य की तलाश भाग -४ डॉ. चंद्रकांत तिवारी- उत्तराखंड प्रांत

 व्यंग्य की तलाश - भाग - ४

डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

व्यक्ति के कर्मों की ध्वनि शब्दों से ऊंची होती है। घर दीवारों और ईट गारे से ही निर्मित नहीं होता है। घर तो बनता है मन की समृद्धि से। घर की समृद्धि से कहीं अधिक मन की समृद्धि बहुत बड़ी चीज है। मन की समृद्धि के लिए दूसरे के सुख में अपने सुख को तलाश करना पड़ेगा और दूसरे के दुख में सहभागी बनना पड़ेगा। कुल मिलाकर समृद्धि का भाव तभी जागृत होगा जब सुख के साथ-साथ दुख का भी बराबर में हिस्सा हो। दूसरे के तवे में रोटी सेंकने का भाव त्यागना होगा तो वहीं बहती गंगा पर डुबकी मारने का विचार कर्तव्यबोध से विमुख बनाता है। हमें राजनीति के जंगल में घुसकर दंगल करने की आवश्यकता नहीं। राजनीति घने जंगल का रास्ता है जिसमें साधारण व्यक्ति अपने घर का मार्ग तलाश कर रहा होता है। जीवन एक फूल है और प्रेम उसकी सुगंध। हम जैसे फूल उगाएंगे हमें वैसी सुगंध मिलेगी। हम जिस दुनिया में रहते हैं वहां नागफनी के कांटे हैं तो गुलाब के फूल भी हैं। हमारे गुलाब में कांटे भी हैं परंतु यह कांटे गुलाब की रक्षा के लिए ही होते हैं। प्रकृति ने हर खूबसूरत वस्तु को नैसर्गिक सुरक्षा प्रदान की है। परंतु हमें काले और गोरे रंग का भेद नहीं करना चाहिए। प्रकृति में भी काली और गोरी नदियां बहते हुए संगम में एक साथ पुनः मिल जाती हैं। बड़े-बड़े महासागरों में गर्म और शीतल जलधारा आपस में मिलकर कई जीवों का निवास स्थान होती हैं। परंतु जीवन का एक सत्य यह भी है कि छोटी मछलियां बड़ी मछलियों का ही आहार बनती हैं। राजनीति भी समुद्र की उस मछली के समान है जिसको हजम करना इतना आसान नहीं है। देश को चलाना साधारण व्यक्ति का असाधारण कार्य होता है। असाधारण होने के बाद भी व्यक्ति साधारण बना रहे तो वही व्यक्ति देश का नेतृत्व और संपूर्ण विश्व में प्रेम और आदर्श स्थापित कर सकता है।

क्रमशः...

सोमवार, 28 अगस्त 2023

पुण्य सलिला मोक्षदायिनी - डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत


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पुण्य सलिला मोक्षदायिनी ..

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सब बहते हैं  मैं भी बहता हूंँ 
 सब कहते हैं  मैं भी कहता हूंँ 
 सब रहते हैं  मैं भी रहता हूंँ 
 सब सहते हैं मैं भी सहता हूंँ 
अंतहीन अंतर्मन अनंत प्रवाह बहता नीर निरंतर 
एकांत समर निज छिपा कहांँ स्वरूप भयंकर। 

नित-नित निरंतर निर्भय अंतर 
अंतस अंतहीन जलधार 
बहता शैलखंड शीर्ष शिखर शिव जटाशंकर बहती लघुधार 
चूर-चूर चूर्ण चरण बहती चर्म पग धरा पर सत्कार 
शीतल पेय सरस पुण्य सलिला मोक्षदायिनी उद्धार 
शीतला जल शीतलता-सी साकार । 
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    ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
थलीसैंण 


बुधवार, 23 अगस्त 2023

चांँद हमारी झोली में - डॉ. चंद्रकांत तिवारी

 चांँद हमारी झोली में

प्रेम हमारी बोली में

कार्य सदा नित छुट्टी में 

त्रिलोक हमारी मुट्ठी में ।

धरा से दूर थी चांँदनी कब

घूम आएंगे कुछ दिन अब

हमको निज विश्वास है 

चांँद हमारे पास है ।

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

प्रकृति का पुनर्मूल्यांकन- (भाग एक) - डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत






प्रकृति का पुनर्मूल्यांकन-      
डॉ. चंद्रकांत तिवारी-

उत्तराखंड प्रांत 

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सुंदरता की देवी साकार

कण-कण प्रकृति करती प्यार

ग्रीष्म,पावस और शीत फुहार

मन ऋतुराज बसंत-बहार 

मध्य हिमालय शीतल जल-धार

बरस रहे हैं  बिंदु हज़ार ।

चादर कोहरे की उड़-चली-ब्यार

बरस रही है पावस-जल-धार

हे ! हिम शिखरों के दिव्य साकार 

प्रकृति सौंदर्य यहांँ नित्य-अपार 

हिम प्रदेश यह पाषाण खंड 

दिव्य हिमालय उत्तराखंड । (स्वरचित कविता)

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    संपूर्ण ब्रह्मांड में एक से बढ़कर एक ग्रह, नक्षत्र उपग्रह मौजूद हैं। इन सबके बीच हमारी पृथ्वी भी अनोखी और कई रहस्यों को अपने गर्भ में समेटे हुए है।

प्रकृति हमारी कल्पनाओं से भी कहीं अधिक सुंदर एवं मनभावन है। हमारी कल्पनाओं का क्षितिज तो बहुत सूक्ष्म एवं अल्पजीवी है। परंतु प्रकृति की सुंदरता समय के प्रत्येक पल के साथ बदलती रहती है। कई रंगों का समूह इसकी सुंदरता और रहस्य को गुणात्मक रूप में बढ़ाता रहता है।

प्रकृति अमूल्य है। इसकी प्रत्येक घटना एक संकेत है।

हमें इसका मूल्य पहचानना होगा। प्रकृति प्रेमी बनने की पहली शर्त पर्यावरण के प्रति समर्पण और सौहार्द्र की भावना होनी चाहिए। हम जिस समाज में रहते हैं वह चारों ओर से प्रकृति के सुंदर दृश्यों से घिरा हुआ है। जीव-जंतु, पशु-पक्षी वृक्ष-लताएं, फल-फूल, जल, जमीन, जंगल कुल मिलकर एक ऐसा प्राकृतिक परिवेश का निर्माण करते हैं जो हमारे जीवन के स्तर को जीने योग्य बनाता है। हम सब प्रकृति की ही संतान हैं। प्राकृतिक परिवेश में ही हम जन्म लेते हैं और अंततः अपने जीवन की विकास यात्रा को प्रकृति में ही समाहित करते हुए पुनः प्रकृति की गोद में नए बीज की तरह अंकुरित हो जाते हैं। कुल मिलाकर हम प्रकृति और इसकी परिधि से कभी अलग हो ही नहीं सकते हैं। प्रकृति हमारी सांसों में निरंतर गतिशील होते हुए हमें जीवन जीने की कला सिखाती है। प्रकृति हमें एक ऐसी शिक्षा देती है जो जीवन भर सतत-अनवरत और निरंतर गतिमान रहती है। प्रकृति की शिक्षा और प्रकृति का व्यवहार गुणात्मक फल कारक है। हम स्वयं परस्पर तो अलग हो सकते हैं परंतु प्रकृति से हम कभी भी अलग नहीं रह सकते। क्योंकि प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हमारा जीवन प्रकृति की ही देन है। 

सूर्य से हमें ऊर्जा मिलती है और चंद्रमा से शीतलता मिलती है। आकाशीय नक्षत्र हमारे ग्रह चाल के दिशा निर्देशक हैं। रात्रि विश्राम की स्थिति तो भोर का उजाला जीवन की नई दिशा है। वायु हमें प्राणवायु का बीज मंत्र देते हुए निरंतर पल्लवित, पुष्पित और प्रफुल्लित करती रहती है और ताजगी से परिपूर्ण बनाए रखती है। मिट्टी की महक हमें अपनी जड़ों से जोड़ें रखती है। प्रकृति की कोई भी वस्तु अकारण नहीं है। हर वस्तु का स्थान, समय और स्थिति सुनिश्चित है और मानवता के हितार्थ है। परंतु मनुष्य ही अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए इस पारिस्थितिक चक्र को बिगाड़ने में तुला है। स्थिति ऐसी है कि जिस डाल पर मानवता बैठी है उसी डाल को अपनी कुछ स्वार्थ की पूर्ति के लिए कुल्हाड़ी से काट रही है।

हम कैसे भूल सकते हैं कि हमारे आराध्य देव, हमारे पूज्य देवी देवता भी तो प्रकृति से ही जुड़े हुए हैं। कैलाश पर्वत से लेकर क्षीरसागर, महासागर, नदी, तालाब, पोखर, जलाशय, ऊंचे घने जंगल, वृक्ष-लताएं, कंकड़-पत्थर, फल-फूल, पत्थर की मूर्तियों सभी तो प्रकृति के उपमान हैं। हमारे तीज-त्योहार सब प्रकृति की ही तो देन है। हम जन्म से ही प्रकृति से जुड़े और प्रकृति ही हमारे अंतर्मन में विराजमान है। कभी देवता बनकर कभी दानव बनकर तो कभी अतिमानव बनकर हमें जीवन जीने के नए-नए तौर-तरीके सिखाती है। तो दूसरी ओर जीने की प्रेरणा भी देती रही है। मानव सभ्यता की सार्थकता इसी बात में निहित है कि प्रकृति के विकास के साथ-साथ उसका भी विकास होता आया है। यह एक ऐसा संतुलन है जो तराजू के दोनों हिस्सों को समान परंतु मानवता के हितार्थ समर्पित बनाता है। 

परंतु आज आधुनिक परिवेश की स्थिति कुछ और ही बयां करती है। जिस वैश्विक जगत में हम रहते हैं वह विकास के चक्रवात में फंसता जा रहा हैै। हम अपनी वास्तविक जन्मभूमि, मातृभूमि से अलग होते जा रहे हैं। गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं। भाषा, साहित्य, संस्कृति सभ्यता के अखाड़ेबाजी में दम तोड़ रही है। परमार्थपरायण से बढ़कर भी मनुष्य के स्वार्थ हैं। ऐसे में प्रकृति की ओर अपनापन कहां रह जाता है? जिस पर्यावरण को लेकर ऊंचे-ऊंचे मंचों पर बड़ी-बड़ी बातें, बड़ी-बड़ी योजनाएं मन बहलाने के लिए होती हैं वह पर्यावरण प्रकृति से मनुष्य को दूर कर रहा है। ऐसी पर्यावरणीय योजनाओं एवं दावों में विकास तो है परंतु वृद्धि नहीं। जीवन तो है परंतु जीवन जीने की कला नहीं। बनावटी रंग तो हैं परंतु फूलों-सी कोमलता नहीं। दिखावा तो है परंतु सहजता नहीं। किराए की जिंदगी है परंतु अपनापन नहीं। गति तो है परंतु गहराई नहीं। कह सकते हैं कि एक लंबे सफर पर निकल चुके हैं। परंतु न लक्ष्य दिखता है न मंजिल दिखती है और न ही गंतव्य पर पहुंचने की कोई खुशी होगी। बस चलते ही जाना है एक अंधेरे और सुनसान जंगल से गुजरने वाले रास्ते पर।

हमें प्रकृति की शक्ति को पहचानना होगा। स्वयं की शक्ति से प्रकृति की शक्ति के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए जन-सामान्य के लिए प्राकृतिक संसाधनों के सुलभ संसाधनों को अपनाना होगा। विद्यालयी शिक्षा संकल्पना एवं शिक्षा की संरचना में प्रकृति के प्रमुख उपादानों को अपनाते हुए स्थानीय संसाधनों की उपादेयता को स्थायित्व प्रदान करना होगा। शिक्षण की मूलभूत संरचना को व्यवहारिक आधार प्रदान कराना होगा। तभी हम प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करते हुए शिक्षण प्रक्रिया को अनुप्रयोगों और स्थानीय संसाधनों से परिपूर्ण कर पाएंगे।

भौतिक संसाधनों की कमी को पूरा करने के लिए हमें, स्थानीय संसाधनों को शिक्षा व्यवस्था की मूलभूत संरचना के साथ जोड़ते हुए, शैक्षणिक संसाधनों की पूर्ति कर, शिक्षण व्यवस्था को प्रकृति से जोड़ना/  जोड़कर सृजनात्मकता एवं नवाचार स्थापित करने का प्रयास किया जा सकता है या कर सकते हैं।

शिक्षा, चिकित्सा और कृषि तीनों ही प्रकृति की देन हैं। 

पर्यावरण दिवस को हमें कुछ विशेष नियमों के तहत अपने की आवश्यकता है। हमें इस नियामक दिन को पहचानना होगा जिसे हम पर्यावरण दिवस के रूप में मनाते हैं। हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में स्थानीय संसाधनों के अनुसार बदलाव करने होंगे। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था को निर्मित करना होगा जो प्रायोगिक एवं व्यावहारिक स्तर पर हमें प्रकृति के विविध रूपों, उपमानों से अपनापन बनाए रखने में सक्षम बनाएं। पर्यावरणीय अध्ययन के सूत्र एवं उद्देश्य कक्षा-कक्ष शिक्षण तक ही सीमित नहीं होने चाहिए। यह सिद्धांत से अधिक व्यवहार का विषय है। यह तो प्रायोगिक विषय क्षेत्र है। इसे खुले आकाश के तले व्यावहारिक एवं प्रायोगिक रूप से ही सहजता एवं अपनेपन के साथ अपनाया जा सकता है।

क्रमशः.......




शुक्रवार, 18 अगस्त 2023

व्यंग्य की तलाश - भाग तीन - डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 व्यंग्य की तलाश -(भाग तीन) - डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

विश्व के मानचित्र पर भारत महज एक देश ही नहीं बल्कि विभिन्न सभ्यताओं का समुच्चय है। यहाँ से निकली सभ्यताओं की छोटी-छोटी नदियों का जल विश्वसागर की जलसंधि को स्पर्श कर भारतवर्ष की संस्कृति के कई आयाम चिन्हित करता है। भारतवर्ष की संस्कृति में आत्मिक संतुष्टि का भाव गहराई से समाया हुआ है। यह भाव विदेशियों को इतना प्रभावित करता है कि विदेशी अपना घर-द्वार छोड़ यहाँ बसने को तैयार खड़े हैं। हम भारतीय हृदय से बड़े सरल, मन से बढ़े तरल और बिना वजह कोई हमें परेशान करे तो उसके लिए हम गरल हैं। जो भी हमारे समाज का हिस्सा बना वह पानी में चीनी की तरह घुल गया, और जो ऐसे छोटे गन्नों की पैदावार चीनी के मोटे दाने घुल नहीं पाये उसे हमने चुन-चुन कर बाहर निकाला और सिल-बट्टे पर कूट-कूट कर बुरादा बनाया। भारतीय समाज में एक विचित्र कौशल विकास आत्मिक रूप से जुड़ा हुआ है। हम हर उस टेढ़ी-मेड़ी चीज को ठोक-पीट कर सीधा बना देते हैं जो अनियंत्रित होकर समाज में बरगद के पेड़ की तरह विस्तारवादी नीति की तरह फैल रही होती है।

हमारे देश में वाद से बढ़कर विवाद है। हर विवाद पर संवाद है। संवाद से बढ़कर राष्ट्रवाद है। राष्ट्रवाद के आगे फुलस्टाॅप है। दुश्मन ने हमसे टकराने की कई बार नाकाम कोशिश की है परंतु हमारे राष्ट्रवादी गांडीव की तान सुनकर दुश्मन की पतलून गीली हो गई। उसकी बंद आँखें और सिकुड़ गई। क्योंकि हमारे पास राष्ट्रवाद है। हम भूखे-प्यासे रह सकते हैं परंतु राष्ट्रवाद हमारे लिए सर्वोपरि है। हमारा राष्ट्रवाद स्वदेशी है। जिसमें आत्मनिर्भरता का भाव गहराई से जुड़ा हुआ है। हमारे राष्ट्र की संवेदनाओं का प्रतीक धर्म में निहित है। धर्म हमारे लिए जीवन जीने की एक कला है। संस्कारों का नवगीत एवं तीज-त्योहारों और आपसी सहमति से संस्कृति की प्राकृतिक यात्रा की विरासत निर्मित करते हुए, धर्म दर्शन की रूपरेखा में परिणीती प्राप्त करती है। इच्छा , क्रिया और ज्ञान का समन्वित प्रयास ही धर्म दर्शन को वैश्विक स्तर पर स्थापित करता है। धर्म ने कर्म को स्वर्ग की राह पर नैसर्गिक प्रकृति -परिवेश के मध्य, हिमालय के श्वेत मस्तक से परिपूर्ण उच्चादर्शों के साथ उठना सिखाया। नैतिक चरित्र की आध्यात्मिक - प्राथमिक - अनुशासनात्मक पाठशाला धर्म दर्शन की वैश्विक परंपरा एवं आत्मिक चेतना में ही निहित है।

धर्म नियमित रूप से अनवरत- नैसर्गिक क्रिया - कलाप है। यह धुंधली चादर में उजली संभावित किरणों का दैविक प्रकाश है। यह हमारा पथ प्रदर्शित करता है। धर्म हमारी संस्कृति और समाज में पारिजात वृक्ष की तरह खड़ा है। जिसका कोई डुप्लिकेट मार्केट में नहीं बनाया जा सकता। हमारे धर्म में राम-घनश्याम, नंदकिशोर- मनमोहन, माखनचोर, बंशीधारी-कृष्ण मुरारी, त्रिनेत्रधारी, हजरत पीर, संत-फकीर, रहीम-कबीर आदि रहे हैं। हमारे यहाँ साधारण लोगों में असाधारण प्रतिभा है। माता जानकी प्रभु श्री राम हमारे आराध्य स्तुत्य हैं। इसीलिए हमारी संस्कृति बेजोड़ है। हमारी सभ्यता गंगाजल बनकर कई स्वदेशी - विदेशी मुर्दों को मोक्ष की राह दिखाती है। कई विदेशियों को माँ गंगा ने सीधे मोक्ष की प्राप्ति कराई है। यह उन मुर्दों का सौभाग्य है जिनकी राख को माँ गंगा अपने में धारण कर लेती है। गाय, गंगा, गीता और गांँव हमारी सनातन संस्कृति के चार अध्याय हैं।

महात्मा गाँधी भारत के ऐसे लाल थे जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को पीला कर दिया था। गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में जो प्रयोग प्रारंभ किये थे उसकी स्थायी प्रयोगशाला भारत में स्थापित की और सत्य-अहिंसा के कैमिकल से जो कीटनाशक तैयार किया उसका छिड़काव सबसे पहले अंग्रेजों पर किया। अंग्रेज मन के काले और तन के गोरे थे। स्वदेशी कीटनाशक रूपी सत्य-अहिंसा के स्प्रे से दमा के रोगी हो गये। अब वह पहले की तरह खुली हवा में साँस न ले सके। जिस ओर से गाँधी जी का काफिला गुजरता अंग्रेज घबराते। एक साधारण से व्यक्ति ने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। अंग्रेजों को सपनों में भी गाँधी जी से डर लगता था। नमक बनाकर गाँधी जी ने अंग्रेजों को खुली चुनौती दे डाली। अंग्रेजों को अपने खुले जख्मों का डर सताने लगा कि कोई नमक न छिड़क दे। सत्य की सफेद धोती और हिंसा की रोकथाम के लिए लाठी लेकर गोरे अंग्रेजों को आगाह करते और कहते कि अभी भी समय है अपने देश लौट जाओ। कल को न अपने देश के रहोगे न भारत के रह सकोगे। यह भारतवर्ष है यहाँ के टुकड़ों पर कब तक पलते रहोगे। गाँधी जी का चरखा और खादी स्वदेशी भावना का नवाचार था। चरखा तो घर-घर में लोकप्रियता पा चुका था। देश में ऐसे कई चरखे सुदर्शन चक्र की तरह चलने लगे। मानों अंग्रेज सोच रहे हों कि हमारे गले की नाप का फंदा न जाने किस सुदर्शन चरखे में तैयार हो रहा है। चरखा राष्ट्रवादी भावनाओं का द्योतक और भारतीय पुनरुत्थान का अनवरत प्रतीक चिह्न है। जिससे बनने वाला सूत किसी हीरे की काट से कम न था। चरखे की गति और नमक का घोल,भारत की जनता और गाँधी के बोल, लाठी की आवाज, स्वदेशी बोल, अब तो तय था,अंग्रेजों का बिस्तरा गोल। हमारे स्वदेशी चरखे से बना हुआ खादी इतना मजबूत हुआ करता था कि अगर इस खादी को अंग्रेजों पर भीगो-भीगो कर मारा जाता तो उन्हें पता चलता कि भारत के पूत और चरखे के सूत की ताकत क्या होती है। खादी की मार और चरखे की धार का कोई मुकाबला न था साहब। राजनीति में खादी, गाँधी और चरखे का योग हर वोट की चोट पर दस्तक करता है। नेताओं को खादी का प्रयोग पता है। कि खादी का कहाँ और कैसे इस्तेमाल करना है। जिस लाठी से गाँधी जी ने आजादी का गोवर्धन पर्वत उठाया था वह गाँधी जी की निशानी आज भी मौजूद है। नेताओं के सफेद कुर्ते और पुलिस के डंडे स्वदेशी आत्मनिर्भरता की पहचान है। शायद गाँधी जी की भी यही इच्छा थी। इसीलिए पुलिस प्रशासन ने गाँधी जी का डंडा जनहित में थाम लिया और नेताओं ने खादी।

हमारी खादी सरहद की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। चरखे से बनने वाला सूत का धागा हर भारतीय को सुदर्शन-सी गति देते हुए एक सूत्र में पिरोते हुए मजबूत दीवार का काम करता है। जिसके जोड़ फैबिकोल से भी मजबूत और टिकाऊ हैं। विश्व की किसी भी बड़ी दीवार से बढ़कर हम भारतीयों की राष्ट्रवादी विचारधारा है। हमारा देश पत्थर में भगवान को देखता हैं, पूजता है और मिट्टी का तिलक लगाकर सरहदों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। हमने कई बार सरहद पार से बिल खोदकर हमारी सरहद में घुस आने वाले ऊदबिलावों को कान पकड़ कर उलटी गिनती करवाई है। परंतु हमारे पड़ोसी ऊदबिलाव बड़े उद्दंडी हैं। खैर मांफ करना हमारी सनातन संस्कृति है। हम भारतीय हैं, मर्यादा में यहाँ पुरूषोत्तम हुए हैं। आज्ञा में नि: स्वार्थ भावप्रिय भरत शिरोमणि एवं कर्मवीर-कर्तव्यधीर दशरथ नंदन हुए । हम अतिथि को भगवान मानते हैं। परंतु क्षमा की भी कोई सीमा होती है। दधिचि की हड्डियों का वज्र अब तक हमारे पास है। अगर हमारी भक्ति शक्ति में बदले इससे पहले जितने समुद्र और पर्वत पार करके तुमने भारत में प्रवेश किया है उसी दिशा को वापस हो लें। अगर मर्यादा पुरुषोत्तम के वंशज कुपित हुए तो नाभी का अमृत कब सूख जाएगा यह समझ न आएगा। यह गाँधी का देश है तो यह सुभाष का भी देश है। यहाँ सावरकर हुए तो सरदार पटेल भी थे। यह देश कलाम का भी उतना ही है जितना कलम का है। यह देश आर्यों का है। कुरूवंशो की यहाँ शौर्य गाथा की लिखावट अमिट है। यहाँ की सेना के समक्ष दुश्मन भय से गीला और चेहरे से पीला हो जाता है। यहाँ छप्पन इंच का सीना है। हर विसंगतियों पर ताली है, थाली है, घंटी है और दीये की रोशनी पर राष्ट्रवाद के अंडे उबलते हैं । 

वैश्विक महामारी में भी गरीब के घर में उजाला है। हमारे पास विजन बड़ा है। हालाँकि हमारा देश अभी विकासशील की दौड़ में बहुत पीछे खड़ा है। लेकिन हर मुश्किलों में अजेय बनकर लड़ा है। राजनीति हमारे यहां व्यवसाय है। सभी नीतियों की धारा राजनीति से निकलती है। नेताजी का पैजामा छोटा-बड़ा हो सकता है परंतु राजनीति छोटी-बड़ी नहीं हो सकती। हां पेट बाहर जरूर निकल सकता है। अपनी सीमा से बाहर। राजनीति की बेबस परिधि से भी ज्यादा बाहर। पेट राजनीति का कुरुक्षेत्र है, जिसका युद्ध आज तक चल रहा है और आगामी सदियों तक चलता रहेगा।कुरुक्षेत्रे- कर्मक्षेत्रे- धर्मक्षेत्रे धरातलीय पृष्ठीय आवरण पर आज अर्जुन जिस मत्स्य को भेदने की कोशिश कर रहा है। वह बहुत दिनों पहिले ही मर चुकी है। हां मत्स्य का पेट फूल गया है। यह अनोखा दृश्य महासभा दे रही है। तभी अर्जुन का निशाना चूक गया और तीर पेट पर जा लगा। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि पेट से क्या निकला होगा ! सब आश्चर्यचकित हैं, मौन हैं। 

क्रमशः.......

शनिवार, 12 अगस्त 2023

व्यंग्य की तलाश - (भाग दो) - डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत


व्यंग्य की तलाश - (भाग दो) 

 डॉ. चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत 

हिन्दू समाज की सबसे बड़ी धरोहर उसका वैदिक साहित्य है। इस साहित्य में सभी हिन्दुओं की आस्थाओं, श्रद्धा, भक्ति, आत्म-विश्वास तथा मानवीय जीवन मूल्यों का क्रिया-कर्म होता रहता है। संपूर्ण भारतीय वांग्मय उसी की धुरी पर टिका हुआ है। इस बात में शक नहीं कि साहित्य सत्य और काल्पनिक दोनों होता है, परंतु जहाँ तक मानवीय मूल्यों का सवाल है तो साहित्य समाज सापेक्ष अभिव्यक्त होता है। युगबोध एवं मूल्यबोध पर आधारित होता है।

जीवन में समस्याएं कभी कम नहीं होती हैं। घर परिवार से लेकर देशभर में कोई इकलौता नहीं जहांँ समस्याएँ न हों।
आज देश में इतनी समस्याएँ हैं कि उन पर बातें करते हुए कई और समस्याएँ पैदा होने की पूरी संभावना है। हर समस्या के समाधान के लिए एक सरकारी योजना चाहिए। सरकारी योजनाएं डोली पर बैठती हुई किसी दुल्हन की तरह है। जिसका चीरहरण संभावित है। केंद्र सरकार अगर कोई योजना राज्य सरकारों को आबंटित करती है तो यहां बैठे भूखे सभासदों, मेयरों, और विधायकों के चेहरे खिलखिला उठते हैं। किसी लकड़बग्घे की तरफ जो फेंके हुए टुकड़े को नोंच नोंच कर खा जाता है।
कमीशनखोरी प्याज की परतों की तरह धीरे-धीरे खुलती है। असल में ग़रीब तबके का आदमी प्याज के उतरते छिलकों की तरह धीरे-धीरे निर्वस्त्र हो रहा होता है।

 सरकारी परियोजना प्रेशर कुकर की वह सिटी है जो कभी बजती नहीं है लेकिन खाना पका देती है। उच्च पदों से लेकर ग्रामीण स्तर तक सबको धूप और बतासे चढ़ावे के रूप में चाहिए। सरकारी योजनाओं से मिलने वाला प्रसाद मन को आनंदित तो करता ही है आत्मा को भी प्रफुल्लित कर देता है। कर्मशील स्वयं आत्मानुशासित कर्मवीर है परन्तु कर्महीन स्व-आचरणहीन होने पर भी पूर्ण कर्म में अपूर्ण भाव को देखने का अभ्यस्त है । कर्महीन व्यक्तियों का सबसे सुंदर आभूषण सरकारी योजनाओं से मिलने वाला प्रसाद है। ऐसे प्रसाद को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को  चहुँमुखी प्रतिभाशाली और समाज का सच्चा हितैषी स्वयं को दिखाना होता है। जो जितना कर्महीन होगा वह प्रसाद का उतना बड़ा दावेदार होगा। समाज के सारे बनावटी दुःख दर्द समेटकर अपने भीतर रखने की क्षमता ही व्यक्ति को भीतर से इस चरित्रहीन मंदिर का एकमात्र पुजारी बना देती है। ऐसे मंदिर का पुजारी हमेशा लोकतंत्र की आय पर निर्भर रहकर आत्मनिर्भर बना रहता है। 

कर्म के द्वारा ही धर्म का पालन किया जाता है, कर्माभिमुख धर्म ही प्रेम का उपजीव्य है। क्योंकि प्रेम, संवेदना सभी मानवीय मूल्यों में सर्वोपरि है। आनंदोपलब्धि जीवन की अंतिम और एकमात्र वैकल्पिक पूंजी है। सभी विषयों में सर्वोपरि और मूल्यनिष्ठ। साहित्य की अनेक कालजयी कृतियाॅ मानवीय मूल्यों का विषय प्रवर्तन करती हैं। सचमुच वैसी ही पुस्तकों का साहित्य कालजयी एवं मानवीय मूल्यों का आधार होता है जिसके रचयिता सत्ता के गलियारे में जाकर चिंघाड़तें या घिंघियाते नहीं अपितु अपनी परंपरा से जुड़े रहते हैं और अपनी लेखनी से मानवता का सच्चा मार्गदर्शन करते हैं। आज मानवीय मूल्यों में बदलाव का स्तर कंकाल सदृश्य बनता जा रहा है जिसे स्वयं ओंकारेश्वर भी समझने में अक्षम होंगे। स्वयं ब्रह्म भी उदासीन भाव लिए ऊर्जा विहीन होंगे।


हम हर बात पर नेताओं को कोसते हैं। यह कितना ठीक है। जिसे हम और आप टीका चंदन लगाकर संसद में भेजते हैं वह भी हमारे ही मध्य से तो होता है। कुर्सी की जिस दौड़ में युवाओं की साँसें फूलने लगती हैं, पाँव उखड़ने लगते हैं उनका हाजमां खाराब हो जाता है और आँतड़ों के पसीने छूट जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर उम्र की सफेदी और डायलेसिस पर बैठा यमराज को अपनी बांह में दबाये चुनाव भी जीतता है और युवा पीढ़ी का आदर्श भी बनता है। हमारे देश के मंद विकास में नेताओं की कुर्सी पकड़ने की तीव्र गति एक ईश्वरीय कारण है। हमारे देश में पाँच साल की सरकार होती है। इन पाँच सालों में टेबल की आत्मनिर्भरता और कुर्सी की बांहों को मजबूती से पकड़े रखना परम धर्म अनवरत कौशल है। यह प्रक्रिया आत्मा को कुर्सी पर स्थायित्व प्रदान करे, हर कोई चरित्र विजयी नहीं हो सकता। किन्तु विजयोत्सव मनाया जाएगा, यही तो जनाधार है। आनंद जौहरी का तराशा हुआ हीरा नहीं साहब, यह तो नैसर्गिक प्रवृत्तिगत आत्मिक अंतिम मनोगत मनोजगत का एकमात्र वैकल्पिक आधार है।

रामायण और महाभारत का विस्तृत कथानक कुर्सी की आत्मनिर्भरता और चरित्र की आत्महीनता के कई पहलू दर्शाता है। देश की कुर्सी हो या राजा का सिंहासन यह करोड़ों लोगों की भावनाएँ से बनी होती है। चुनाव के दौरान हर कार्यकर्ता के पसीने की बूँद से इसके खाँचे मजबूत बनें रहते हैं। लेकिन शायद जनता भी वोट देने के बाद अपने घर का रास्ता भटक गई है। राह में उसे अपना घर नहीं मिल रहा। चुनावी योजनाओं में सड़क निर्माण की बातें सोचता हुआ आम आदमी अचानक बड़े से गढ्ढे में गिरता है। ऐसे गढ्ढे जनता के आत्मविश्वास को बढ़ावा देने के लिए सड़कों पर छोड़ दिये जाते हैं। विगत दिनों कुछ कोरोना महामारी से बचने के लिए सुरक्षा घेरा समझकर नीचे गिरते हुए आत्मनिर्भर योजना का पूरा फायदा उठाने का प्रयास करते हैं।


क्रमशः आज की जीवन शैली और जरूरतों की बढ़ती परिधि के समक्ष मानवीय मूल्यों की धमनियों में काॅलेस्ट्रोल, वसा अपना दायरा फैला रही है। समय रहते बाई पास सर्जरी की जरूरत है अन्यथा हृदय रूपी विस्तृत समाज की ओपन हार्ट सर्जरी, रिश्तों की चीर-फाड़ संवेदनाओं रहित संस्कृति सब की सब एक्सप्रेस वे पर वैश्विक होती चली जाएंगी। 

मानव सभ्यता का इतिहास रचनात्मकता एवं नवाचारों से भरा है। रचनात्मकता प्लेटो के अनुकरण सिद्धांत की परिधि से गुजरते हुए अरस्तू के अनुकरण सिद्धांत का पुनर्सृजनवादी नवाचारिक दृष्टिकोण है। जो कल्पना के यथार्थ को पुनर्जीवित करता रहता है। साथ ही कल्पना की शक्ति, नई-नई उद्भावनाओं के साथ मानव मन को सक्रिय एवं ऊर्जा से परिपूर्ण करते हुए निरंतर चिंतनशील बनाती है और समाज के लिए अमूल्य-उपहार उपलब्ध कराती है। कल्पना की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि कल्पनाशील व्यक्ति सीमित संसाधनों में साधारण होते हुए भी असाधारण कार्य कर जाता है और यह सकारात्मक-चिंतन सृजन के साथ-साथ प्रकृति का पुनर्सृजन भी है। इस महाकालेश्वरी -धरणी पर सृजन-पुनर्सृजन-विसर्जन की प्रक्रिया निरंतर-नित-नित और अनवरत चलती रहती है। कल्पना का मिश्रण सभी में रहता है।  

आत्मनिर्भरता की दिशा में हमारे पास ढेरों जुगाड़ हैं। आत्मनिर्भरता अंधेरी रात में पैदा हुआ ऐसा बच्चा है जो स्कूल में दाखिले के लिए अपने माता-पिता का नाम खोज रहा है। हम भारतीय विश्वास को जगाने से पहले अंधविश्वास की संकरी गली के चक्कर लगाते हुए, टीका चंदन से माथा लाल कर भक्त होने का स्थायी प्रमाण-पत्र प्राप्त करते हैं। जब अंधविश्वास का पूजन हो जाता है तो हमारा विश्वास स्वतः ही ऊपर हो आता है। अंधविश्वास के चलते कई साधु संतों की अच्छी चल जाती है। खैर यह कर्म भी काफ़ी परिश्रम और जोख़िम से भरपूर है। निरपराध जनता ने घर की सुख शांति के लिए जिन साधु महात्माओं की भक्ति के गीत गाये और जिन संतों को समाज का सच्चा हितैषी समझा वही महात्मा उसके दूध की पतेली से मलाई ढूंढ-ढूंढ कर खा गये और कबाड़ीवाला पतेली ले भागा। देश में अंधविश्वास का अच्छा साम्राज्य फल-फूल रहा है। किसी की नौकरी लगाने का झांसा देकर, किसी की शादी कराने का लालच देकर, मानसिक बीमारी से लेकर शारीरिक समस्या तक का समाधान, किसी दम्पत्ति के बच्चे न हो सकें तो इन नीम हकीम बाबा-संतों के पास वह सारे साधन हैं जो उच्च कोटि के अस्पतालों में ढूंढने से भी न मिलें। मेडिकल का छात्र फेल हो जाएगा, परंतु नीम हकीम बाबा-संतों की नीम हकीकी चलती रहेगी।


वैसे एक मनोवैज्ञानिक सामाजिक सोच है कि अंधविश्वास और विश्वास दोनों की जननी एक ही है। भेद हृदय और बुद्धि का भ्रांतिमान है। देह और संदेह का समायोजन, एक के साथ एक मुफ्त वाली योजना। विश्वास की कोंपलें मौसम और परिस्थितियों के अनुसार ही हरी होंगी। पानी में नमक की तरह और दूध में पानी की तरह, विश्वास स्थायी रहता है कर्म के सकारात्मक परिणाम में। विश्वास को स्थापित करने के लिए अंधविश्वास की आवश्यकता हो सकती है परंतु अंधविश्वास से विश्वास कभी स्थायी नहीं रहता। पत्थर में प्रत्येक व्यक्ति अपनी भावनाओं के अनुसार ही विषयवस्तु को देखता है। किसी को भगवान तो किसी को नींव का आधार। परंतु सहारा तो दोनों ही दशाओं में है। विश्वास उस तैरते हुए मुर्दे के समान है जिसने अतल गहराई में जाकर सत्य का गंगाजल अपने फेफड़ों में भर लिया है। विश्वास गहराई से बढ़ता है और ऊँचाई मिलने से सम्मानित होता है। मध्य स्थिति में मनुष्य पके हुए आम की तरह अनिश्चित-सा रहता है। नीचे गिरने का डर रह-रह कर सताता है। ऐसे फलों को निशाना लगाकर गिराया जाता है। गिरने का डर अधिक घातक है बजाय ज़ीने के डर से। बगैर गिरने की दूरी तय किए भी व्यक्ति गिर रहा है। 

हमारी संस्कृति बेजोड़ है। श्रद्धा भाव की यहां कोई कमी नहीं है। हमारे ईश्वर तो झूठे बेरों से ही प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। अपने देवों को प्रसन्न करने के चक्कर में हमने हजारों लीटर दूध पत्थरों पर चढ़ाया है। हमारा समाज सभ्यता का वह नायाब नमूना है जो यह देखकर अनजान बना हुआ है कि जहां कई बच्चे दूध के अभाव में कुपोषण के शिकार होते हैं। उस देश में भगवान कैसे प्रसन्न रह सकते हैं। हमारे देव तो बाल मनोरम दृश्यों में ही देखे गए हैं। भूख लगी तो मटकी से माखन निकाल मित्रों संग बैठ खा लिया। शिशुओं में ही ईश्वर का वास होता है। भला दूध के बिना हमारे शिशु भूखे रहेंगे तो हमारे देव हम पर कुपित न होंगे। यह भला कैसा सामाजिक न्याय है?


भारत की संस्कृति में अधिकांश लोक देवताओं के निवास गुफाओं और कंदराओं में देखे जा सकते हैं। सभी देवता पत्थर के हैं कुछ लोहे से निर्मित भी हैं। अतीत में वृक्षों और भूमि की पूजा होती रही है। सूर्य और चंद्रमा वर्षों से बल्ब और ट्यूब्लाइट का काम करते आये हैं। हमने पेड़-पौधों के अलावा जानवरों में भी देवताओं को तलाशा हैं। हमारे अधिकांश देवताओं के जानवरों से अच्छे संबंध रहे हैं। इसीलिए हमारे आराध्य देवों ने अपना स्थायी निवास ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों को चुना। हमें प्रकृति से जुड़ना सीखाया। पशु-पक्षियों के व्यवहार द्वारा शिक्षा के संदेश दर्शाये। परंतु फिर भी हमारे आराध्य देव पत्थर के हैं उन्हें पूजने वाले पत्थरों से लड़ते हुए कभी पत्थरबाज कहलाते हैं तो कभी पत्थरों से मिली आग से अपनों का घर फूंकने को तैयार खड़े हैं। कहते हैं कि दूध का जला छांछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। जब हम दूध और छांछ में अंतर ही नहीं समझ रहे तो भ्रम की स्थिति में ही रहेंगे ना..!



क्रमशः ...

बुधवार, 9 अगस्त 2023

व्यंग्य की तलाश (भाग - एक)- ©डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

व्यंग्य की तलाश - (भाग - एक)- 

डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

रंगों का स्पर्श शरीर से कहीं अधिक मन को प्रभावित करता है । रंगों को छूने से जो प्रसन्नता जो आत्मिक संतुष्टि मन को प्राप्त होती है उसको शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह भावनात्मक रूप से परिपूर्ण होकर एक-दूसरे को परस्पर संवाद करने की अनुमति प्रदान करता है। बालकों सी स्वच्छंदता, कल्पना की सीमा-रेखा से परे, नवजात शिशु सी कोमलता और यौवन की महत्वाकांक्षा भी रंगों का स्पर्श पाकर, तीव्र गति से लक्ष्य की ओर बढ़ती है। जिन रंगों को बालक एक दूसरे पर बड़ी आसानी से डालते हुए आनंद प्राप्त करते हैं उन्हीं रंगों को उम्रदराज लोग लगाने में घबराते हैं।

रंगो का स्पर्श उम्र की सीमाओं का अतिक्रमण कर सारे बंधनों को तोड़ कभी बचपन के रंग में रंग जाता है तो कभी जवानी के गोते खाता हुआ ऊंचे नील गगन में आजाद पंछी की तरह तैरता रहता है। साठ बरस की उम्र के गांठ को खोलने वाला चाहिए। गांठ खुल जाए तो अनुभव और ज्ञान के अपार स्रोत बहेंगे। हमारे बुजुर्गों में युवाओं का कलेजा है। उम्र का ग्राफ तो घटता बढ़ता रहता है। वैसे तो उम्र दिमागी बुखार का पारा है। जो थोड़ी गर्मी-सर्दी बढ़ने से ही गिरता-चढ़ता है। हमारे देश में बुजुर्गों को इतना सम्मान मिला है कि तितली की चंचलता और भंवरे की गुनगुनाहट को आदर्श मानकर उम्र की किसी भी सीढ़ी पर बाप बनकर फूल खिलाने की भिन्न-भिन्न रंगों से मधुरस लेने की छूट है। यौवन का रंग हमारे मार्गदर्शक बुजुर्गों की नसों में बुझते दीये की तरह हमेशा फड़फड़ाता रहता है। बसंत के मौसम की गुनगुनी धूप में घूमता हुआ कोई मनचला राजनीति का दबंग भंवरा रंगों की चहक-महक और चकाचैंध में भिनभिनाता हुआ तन-मन को भिगोकर आत्मसंतुष्टि का अनुभव करता है। समाज सेवा का तमगा अब कुछ फीका हो चला है।

कीचड़ का रंग बालकों की स्वछंदता का प्रतीक है। समानता का आधार है। जब तक कीचड़ में सभी बालक मिलकर एक नहीं हो जाते तब तक समानता के सारे आधार बेरंग हैं। लड़-झगड़ कर एक दूसरे के कपड़े फाड़ना और एक दूसरे पर कीचड़ उछालना मिट्टी फेंकना यही तो बचपन की अमीरी और गरीबी की एकरूपता की आजादी का रंग है। व्यक्ति की महत्वाकांक्षाएं जैसे-जैसे बड़ी होती हैं यही मिट्टी और कीचड़ उछालने के रंग दाग के रूप में बदल जाते हैं और बचपन इनसे कोसों दूर निकल जाता है। बच्चा जैसे- जैसे लंगोट से पैजामे तक पहुंचता है। मां बाप की चिंता घर की चारदीवारी से बाहर झांकने लगती है। उम्र के रोशनदान से झांकती हुई जवानी किसी भी परेशानी की चिंता का कारण हो सकती है। अमीर बच्चों और गरीब बच्चों का अंतर सरकारी और प्राइवेट स्कूल में बंट जाता है। जिससे हमारी शिक्षा के रंग भी अलग-अलग हो जाते हैं।

वैसे हमारी शिक्षा बहुरंगी है। यहां अपने रिस्क पर जितना चाहो पढ़ सकते हैं। हवा में तैरती हुई पतंग की तरह जितनी ऊंचाई तक जाना चाहो उड़ सकते हो। पतंग कटने का जिम्मा सरकार का नहीं है। भारत की शिक्षा प्रणाली की थाली में मिड डे मील की तरह जब चाहो खा लो या जब चाहो बजा लो। हमारी शिक्षा प्रणाली योजनाओं की दो नाली बंदूक से निकल चुकी है। गोली निशाने पर लगे या निशाना गोली के आगे आ जाए, इस बात से बेखबर कई डेली वेज शिक्षकों के वर्ग इस निशाने की परिधि के भीतर घूम रहे हैं। जिनमें अतिथि, तदर्थ, शिक्षामित्र, नियोजित शिक्षक, शिक्षक बंधु, ठेके के शिक्षक विश्व मानव या महामानव बनाने का जिम्मा अपने सिर उठाए हैं। इनकी जरा सी भूल विश्व मानव का हाजमा बिगाड़ सकती है। गंभीरता और भावुकता के बीच की संकरी गली से गुजरने का रिस्क तो खुद ही उठाना होगा साहब।

मनुष्य भावात्मक रूप से मूर्ख और कामचोर होते हुए भी हर सभा में विद्वता का परिचय देता है। इसे अभ्यास कहें या फिर परिस्थितियों से भी परिस्थितियाँ बनाकर उनसे बाहर निकलने की परिस्थिती में अभ्यस्त व्यक्ति, ही नेतृत्व कौशल में कुशल सामाजिक चोर कहलाता है। यह रंगों की शक्ति का प्रमाण है। भावनाओं की शक्ति का विस्तार है। रंग जिंदगी के अनेक भावों को दर्शाते हैं।

भाषा सृष्टि में सर्वत्र विद्यमान है। सृष्टि की किसी भी वस्तु को देखने के बाद अगर मस्तिष्क के प्रकोष्ठों पर बिंबात्मक दृश्य न उभरें तो भाषाई चेतना नौ रसों की भांति सुसुप्त बुद्धियुग के अवचेतनात्मक महासमर में पथविहीन सी नजर आती है। जिस प्रकार आत्मा मोक्ष मार्ग की प्राप्ति की तलाश में भटकती है, ठीक उसी प्रकार भाषा भी अपना पथ तलाश करने के लिए गूँज की भांति अखिल अनिश्चित अकल्पनीय ब्रह्मांड में ध्वन्यात्मक प्रतीकों का समुच्चय बन सार्थक शब्दों का नया शरीर पाने के लिए आतुर रहती है।

भाषा शिशु के भीतर उतनी ही सार्थक है जितनी वृद्ध के लिए श्वास। भाषा बनावटी रिश्तों के लिए भी उतनी ही सार्थक है जितनी कि समाज और साहित्य के निर्माण के लिए आवश्यक। भाषा का समाजशास्त्र उतना ही मुश्किल है जितना आलोचना की सामाजिकता। कवि हमेशा ही रचना की शब्दनुमा परिधि के भीतरी प्रकोष्ठों में आलोचना को अवचेतनात्मक रूप में रखते चलता है, फिर भी रचना आलोचना की मांग करती है। भाषा हमेशा नवीन शब्दनुमा आवरण को धारण करने में अपनी वास्तविक प्रासंगिकता खो देती है परंतु फिर भी रचना कालजयी बन जाती है।

भाषा का तांडव बड़ा विध्वंसकारी होता है। भाषा शिव के त्रिशूल से विष्णु के सुदर्शन से ब्रह्मा के कमंडल से निकलते हुए संपूर्ण प्रकृति को मधुर संगीत से वशीभूत कर देती है और पशु पक्षी जीव जंतु सभी इस भाषा के वशीकरण में शामिल हो जाते हैं और फिर भाषा अपना चक्र चलाती है। जो समय का चक्र है वही नियति का चक्र है। भाषा मनुष्य के साथ चूहे बिल्ली की तरह खेलती है। सांप नेवले की तरह किसी भी स्थिति के लिए मनुष्य को मौका देती है। हिरण की तरह दौड़ाती है तो बाघ की ऊंची छलांग मारकर अपने शिकार की श्वास नली को दबोच लेती है। मदारी की भाषा में बंदर अपनी पूरी जवानी उछल-कूद में बिता देता है। बंदर उस भाषा का गुलाम बन जाता है और भालू डुगडुगी की आवाज में सर के बल दौड़ता हुआ बार-बार बेवकूफ बनता है। नादानी में नाचता है और लोगों का मन बहलाता है। भालू की विवशता और बंदर की मजबूरी सब भाषा की करामाती सौगात है। भाषा भले व्यक्ति को निर्वस्त्र और नंगे को कपड़ा दे सकती है। भूखे को भोजन और धनवान को कबाड़ी भी बना सकती है। भाषा का अनुशासन पशु पक्षियों और जानवरों में इंसानों से अधिक देखा गया है। इंसानों को भाषा द्वारा ही हर प्रकार की शिक्षा दी जाती है। परंतु इसके विपरीत पशु पक्षियों एवं जानवरों को प्रकृति स्वयं शिक्षा देती है। प्रकृति की गोद में निरीह प्राणियों के लिए मातृत्व का भाव है। देवत्व की स्थापना है। देवी का स्तुत्य है और शिव प्रदेश का आशीर्वाद है। प्रकृति ने हमेशा रंग -बिरंगे वस्त्र दिए हैं। विकलांगों को राहत दी है। भिखारियों को भोजन दिया है। दुराचारियों को निवास भी दिए हैं। हमारे ईश्वर का निवास और हमारा अंतिम मोक्ष भी प्रकृति की गोद में ही निहित है। प्रकृति की गोद में हमारी सुबह दोपहर और शाम होती है और हमारी रात भी प्रकृति की गोद में ही अगली सुबह के इंतजार में पूर्ण होती है। पर हम चांडाल प्रकृति का इतना दोहन कर बैठे हैं कि संपूर्ण मानवता खतरे के निशान से ऊपर आ चुकी है। मानव जो अपने ज्ञान का इतना दंभ भरता है प्रकृति के समक्ष वह रेंगते हुए केंचुए के समान है। जिसको जंगली मुर्गी कभी भी अपना आहार बना लेती है।

जितनी प्रतिस्पर्धा हम इंसानों में है उससे कहीं अधिक प्रतिस्पर्धा का भाव पशु पक्षियों एवं जानवरों में देखा गया है। शेर और हिरण दोनों का मकसद एक ही होता है परंतु दोनों अपना-अपना धर्म निभाने के लिए दौड़ रहे होते हैं। प्रकृति की जीत हमेशा निर्दयी हाथों में होती है।

पशु-पक्षियों एवं जीव-जंतुओं का अनुशासन और प्रेम बड़े उच्च कोटि का होता है। चींटियों का अनुशासन मानव जीवन के लिए बहुत बड़ा दृष्टांत। हाथियों का झुंड अपनी मौजमस्ती/दादागिरी करता हुआ किसी के भी खेत में बेधड़क शराबी की तरह घुसकर गोबर गणेश कर सकता है। सूअरों का आतंक आजकल अपनी सरहद की सीमा रेखा को लांघ गया है। कुछ मनचले सूअर जंगल की सीमा रेखा को फांदकर अपने मनचले स्वभाव के अनुकूल लोगों के आलू खोदकर अपनी भड़ास निकालते हैं और अभिव्यक्ति की आजादी का राग अलापने लगते हैं। कुछ हमारे पाले हुए सूअर इतने अनभिज्ञ हैं कि स्थानीय संसाधनों का प्रयोग करते हुए भूलवश अपने सरल स्वभाव के कारण स्वच्छ भारत अभियान को चुनौती देते देखे जा सकते हैं। कीचड़ में नाक घुसा-घुसाकर सूर्य नमस्कार करता और आनंदोपलब्धि मनाता हुआ स्वर्गिक अनुभूति का परम सुख प्राप्त करता हुआ इसी परिवेश में जीवन जीने का अभ्यस्त हो चुका है। कीचड़ से जीवन का रस निचोड़ अपने यथार्थ से जुड़ा हुआ सूअरों का दल सभ्य और अभिजात्य समाज का अटूट हिस्सा है।

जानवरों की सभा से लेकर देश की महासभा तक भाषा एक बहुत बड़ा प्रश्न है। जिसका उत्तर खोजने के लिए भाषा के नाम पर कई विमर्श चल रहे हैं। प्रयोगशाला में कई प्रयोग हो रहे हैं। परंतु भाषा मौन बने हुए भी बहुत कुछ कह देती हैं। आज देश में भाषा का प्रश्न आम बात है अधिकांश लोग भाषा विमर्श के नाम पर पूरे का पूरा दिन बोलने में खपा देते हैं। होता तो कुछ नहीं है वही ढाक के तीन पात। हां लेकिन कुछ लोगों को भाषा के नाम पर काम मिल गया है। कुछ लोगों के लिए भाषा विमर्श सरकारी परियोजनाओं से उतरता हुआ कागज का जहाज जिस पर गुलाबी और हरे-हरे गांधीजी के चित्र बने हुए हैं उल्लू पर लक्ष्मी बैठकर स्वयं आई है तो भाषा अपने बिल से बाहर निकल कर इधर उधर झांकती है और दुल्हन की तरह घुंघट ओढ़ कर किसी किनारे में बैठ जाती है।

भाषा एक हथियार है वास्तविक हथियार नहीं, एक शाब्दिक विकल्प। भाषा दुःख का उत्सव है तो हर्ष का विलाप, भाषा संस्कृति का नगरकोट है तो राजनीति खण्डहर सदृश्य। भाषा मरुतप्राण सी शक्ति है तो श्वापदों का वाक-युद्ध। भाषा साहित्य और संस्कृति का उन्नयन व अवनमन है। भाषा स्वयं में अपनी वास्तविक प्रासंगिकता से कोसों दूर रहकर भी रचना को भू-खंड के सदृश्य वट-वृक्षों की कूॅची से निर्मित नवजात शिशु की भांति पालन-पोषण करती है। लेकिन इतना सब होने के बावजूद भी भाषा एक ऐसे नवजात शिशु का विलाप है जो अपनी मां की गोद से बिछड़ गई है। और सरकारी अस्पताल के किसी बेड पर वेंटीलेटर पर लेटी हुई है। देश के हर भाषा प्रेमी को उस दिन का इंतजार बड़ी बेसब्री से है कि जिस दिन यह बड़ी होगी अपने पैरों पर खड़ी होगी उसके बाद भाषा पर बात करने के लिए बचेगा क्या?

भाषा का खेल दिन-रात चलता रहता है। इस तरह भाषा की आड़ में पूरी रात शिव का तांडव नृत्य चलता है। इस तांडव का सूत्रधार कौरवों की सभा का धृतराष्ट्र बंद आंखों से पूरी रात भाषा के नाम पर नए-नए तरीके इजाद करेगा और सुबह होने पर किसी समाचार पत्र में उसे प्रकाशित करके अपने परिश्रम का पारितोष दर्शक दीर्घा से मांगने के लिए लालायित रहेगा।

मदारी ने हमें बंदर और भालू की तरह ही नचाया है। क्योंकि हमने सिर्फ डुगडुगी की ध्वनि सुनी है। हमने आवाज के पीछे कारणों का अध्ययन नहीं किया।

मनुष्य स्वभाव से कर्मशील और परिश्रमी होने के साथ-साथ भीतर से धूर्त और चालाक भी होता है। स्वाभाविक गुण के विपरीत अगर वह जाता है तो वह कामचोरी या आलस्य न होकर नवाचार का एक रूप भी हो सकता है। जिसे चिंतन कहा जा सकता है और वह एकांत में बैठकर ही उपजता है।

एकांत व्यक्ति के व्यक्तित्व को योगी बना देता है तो अकेलापन व्यक्ति के व्यक्तित्व को भोगी बना देता है और जो जरूरत से ज्यादा चालाक होने के साथ-साथ धूर्त होता है वह स्वयं को रोगी बना लेता है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति के भीतर की रोमानियत स्वाभाविक रूप से खत्म हो जाती है और रिक्त स्थान पर सम-सामयिक एवं प्रासंगिक विषय पर आधुनिकता के कलेवर में लिपटी धूर्तता और चालाकियाँ उत्सुकतावश मस्तिष्क के प्रकोष्ठों पर अपना आयाम विकसित कर लेती हैं। साथ ही चुनौतियों से लड़ने की प्रेरणा भी देती हैं।

समाज हमेशा की तरह स्वयं वर्ग निर्धारित कर लेता है। अकारण ही धूल को भभूत समझकर अपने मस्तक पर लगाने का जोखिम उठा लेता है । और ऐसे व्यक्ति जो अपने रोजमर्रा के कार्यों का डंका पीटने वाले, महज तारीफ और सभा/महोत्सव के केंद्रीय स्थान पर अपनी भूमिका बनाये रखें हेतु ऐसे कार्यों में संलिप्तता दर्शानें का कार्य करते हैं, ऐसे व्यक्तियों के प्रति अकारण अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हैं जो महज राई को पर्वत बना देती हैं ,कामचोर/निठल्ले को नेता बना देती हैं, जिसे भाषा की समझ न हो उसे भाषा का संरक्षक/ शिक्षक बना देते हैं। गली-नुक्कड़ पर भीख मांगने वाले बाबाओं को अपना आदर्श मानकर साधकता दर्शानें में सुखानुभूति का अनुभव करती हैं । आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं का गुलाम बनता जा रहा है। असंतोष, अलगाववादिता, उपद्रव, स्त्रियों को निर्वस्त्र कर घुमाया जाना, जातिगत समीकरण को लेकर नैतिक चरित्र को अपमानित किया जाना, वोट - नोट - चोट की राजनीति, क्रांतियांँ, आंदोलन, असमानता, विषमता, अनैतिकता, अत्याचार, अपमान, असफलताएं, अस्थितरता, अवसाद, वासना, चिंता, संघर्ष, अनिश्चित्ता, हिंसा और कई वाद यह सब मानवीय सभ्यताओं के नैतिक चरित्र और आचरण को अंदर से दीमक की तरह खोखला कर रहे हैं। तो वहीं व्यक्तिवाद, जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रीयतावाद, हिंसावाद, भाई-भतीजावाद, क्षणवाद, अस्तित्ववाद, आधुनिकतावाद, उत्तरआधुनिकतावाद, विभिन्न समसामयिक स्थितियों के चलते समाज में बहुभाषावाद एवं बहुसंस्कृतिवाद सभी वादों के समानान्तर चरित्रहीनतावाद अपने पैर पसार चुका है और मानवीय मूल्यों और अपनत्व को भीतर से घाव कर रहा है, जिससे मनुष्यों के नैतिक चरित्र का अवमूल्यन हो रहा है। व्यक्तित्व के सभी निर्णय और योग्यता के सम्पूर्ण साक्षात्कार एवं मापदंड अब व्हट्सएप्प विश्वविद्यालय में होते हैं।


क्रमशः......

© डॉ चंद्रकांत तिवारी 

सोमवार, 7 अगस्त 2023

सागर किनारे - डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 


सागर किनारे सूरज पुकारे 

रेतों के महलों पर 

लहरों के साये

चंचल रश्मियांँ - बेसुध उर्मियांँ

यौवन युगल पर

स्मृति सजाये 

वैभव का सागर

निज भावों की गागर

लहरों की गुंजन मृदंग बजाये

लौटी तटों पर कोमल करों पर

सहज सरलता कोमल तरलता

मातृत्व स्पर्श-सा स्नेह-प्यारा

कोमल हृदय से करती दुलारा

छूकर चरण तल देती सहारा

वैभव की जननी मिलती दोबारा ।


लहरों की धारा

डूबा क्षितिज पर

ओझल किनारा

लोहित गगन पर

रोहित किनारा

मैं निज खड़ा हूंँ

सम्मुख तुम्हारे 

भूतल किनारे

तटबंध सारे

लहरें पुकारे

हम-तुम सहारे

सागर पुकारे

क्षितिज धरा पर

सारस्वत किनारे

मिलते रहेंगे 

हम-तुम किनारे।


स्वरचित कविता -

© चंद्रकांत तिवारी 

fb-Chandra Tewari 


थलीसैंण - पौड़ी गढ़वाल - डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 
 

सुबह हो गई भोर तिलक-सा

प्रखर-रश्मियां स्वेत वसन-सा

मस्तक उज्ज्वल यश गाता है

विश्व मुकुट-सा हिमसागर सेमल

हिम-देवालय हेमल चमकाता है।


सिंधु धरा-सा दक्षिण सागर 

उत्तर विश्व हिमालय सागर

मध्य हिमालय का रचना खंड

दिव्य भाल-सा उत्तराखंड।


बहती नदियों की जल धारा

करती कल-कल गंगा धारा

मानस -केदार की मीठी बोली 

निर्झर-सी बहती दूधातोली।


दिव्य शिलाओं की चोटी से सूरज की किरणें अभिसार हुई

थलीसैंण के प्रांगण में मां सरस्वती की तान हुई

गूंँज उठी देवभूमि की धरती

पावन किरणें मनुहार हुई

ऊंँची पावन शीला पर दीबा देवी मंदिर की जयकार हुई ।

चौंरीखाल


उर्मि रश्मियां धीरे-धीरे चौरीखाल से आती हैं 

शांत तिमिर-घाटी थलीसैंण को 

पलभर में चमकाती हैं

ऊंँचे-अडिग चीड़ों के वैभव 

देवदार की हरियाली

प्रहरी भूतल - गवाक्ष खड़े

निज प्रतिनिधि बीजों से बढ़े 

श्वेत हिम शिखरों की लाली

पूर्वी न्यार

वसुधा बहती-पूर्वी न्यार

लहराती हरियाली खेतों में बाली

कंठ-शीतल कल-कल मृदु-मनुहार

क्षितिज परिधि थलीसैंण साकार

अपनी गंगा -पूर्वी न्यार ।


ऊंँचे पर्वत गांँव- गंगा की धार

हिमालय के गांँव ईगास-बग्वाल

थलीसैंण की घाटी-पौड़ी गढ़वाल 

दूधातोली पर्वत की सांँझ निराली

बाघों के जंगल बांँझ-वृक्ष हरियाली 

सड़कें छोटी सर्पीली - बर्फीली धार

पुण्य मिले यहांँ दीवा देवी बारंबार ।

हंसेश्वर

हंसेश्वर

बिंदेश्वर
बिंदेश्वर

हंसेश्वर-बिंदेश्वर शिव प्रदेश परिधि में मिलता 

थलीसैंण की घाटी में किरण सूर्य-सा खिलता 

दिव्य हिमालय की यह गाथा 

ज्ञान मनोहर की अभिलाषा

कंकड़ कंकड़ यश गाता है

पर्वत का मानस पुत्र यहांँ

श्रम कण का बरसाता है 

हे दिव्य हिमालय तेरी धरती 

निज कोना-कोना गाता है 

थलीसैंण की घाटी में सूर्य-कमल दल खिलता है 

चौरीखाल के जंगल में बाघों का डेरा मिलता है

असंख्य खग कुल का वैभव यहांँ 

निज दिव्य हिमालय ढलता है

सेमल-सा हेमलता हिम शिखरों का जल

जब धरा वसन मुख भरता है ।


है प्रखर ज्योति की उज्ज्वल आभा 

नदियों की कलकल धारा 

यह दुधातोली की पर्वतमाला

झरने का कलरव गाता है

थलीसैंण की घाटी-पौड़ी में 

किरण सूर्य-दल खिलता है।

दुधातोली

दुधातोली

पावन रज किरणों का रथ

जब धीरे-धीरे आता है

थलीसैंण का दिव्य भाल

धीरे-धीरे चमकाता है।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की यश गाथा है

मध्य हिमालय का भूखंड थलीसैंण कहलाता है।

ऊंँचे ऊंँचे शैल खंड वीरों का मस्तक ऊंँचा करते

कलकल बहती नदियांँ तन शीतल मन हरते।


मातृभूमि-पुण्यभूमि तेरी जय हो थलीसैंण यश गायेगा

विवेक-ज्ञान, यश-वैभव का  सूर्य हिमालय लायेगा।

थलीसैंण 

थलीसैंण 

थलीसैंण 


स्वरचित कविता -

डॉ. चंद्रकांत तिवारी 

fb-Chandra Tewari 

चिंतन से चिंता धीरे-धीरे घटती है- डॉ चंद्रकांत तिवारी - उत्तराखंड प्रांत

 चिंतन से चिंता धीरे-धीरे घटती है

प्रभु दर्शन की प्यास सदा

धीरे-धीरे बढ़ती है

बाधाएं विपरीत आ जाएं 

घनघोर घटाएं छा जाएं

वह चरण वंदना करता है 

मन-चित्त में चिंतन करता है

क्या दुख उसका कर पाएगा

सब वक्त बुरा कट जाएगा

साहस और विश्वास की सीढ़ी क़दम-क़दम पर चढ़ती है

प्रभु चिंतन से सबकी चिंता धीरे-धीरे घटती है।