मंगलवार, 8 सितंबर 2026

प्रकृति-सुषमा 🌸 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

प्रकृति-सुषमा

🌸 ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 



सुरम्य, सुकोमल, सुकुमार, सुरभित,

सजल, स्निग्ध, सौम्य, सतरंगी, सुषमामयी सुशोभित।

सुकांति, सुवासित, सजीली, सदाबहार,

सघन, शीतल, स्वच्छंद, स्वर्णिम - अपरंपार ।


सरस सलिल-सी निर्मल, स्नेहिल समीर-सी प्यारी,

सुधामयी, स्वप्निल, सुषमा से सजी धरा न्यारी ।

सृष्टि की सरगम-सी मुखरित, सरस मधुरिमा ढलती,

सुकुमार किरणों में छिपकर स्वप्निल कलियाँ खिलती।


सिहरती सरिता, सरसिज मुसकाते, सघन वन झूमते,

सुगंधित समीर के संग सहस्र स्वप्न मन में घूमते।

साँझ की सुनहरी छाया में सिमटती धरा सुहानी,

सृष्टि की इस सुषमा के सम्मुख फीकी लगे कल्पना की कहानी।


सच तो यह है - शब्द जहाँ मौन हो जाएँ, वहाँ प्रकृति मुस्काती है,


प्रकृति हमारी कल्पना से भी अधिक सुंदर है - वह स्वयं कविता बन जाती है। 🌿🍃🌸 ☘️

सधन्यवाद 

पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ाए।

रविवार, 6 सितंबर 2026

पहले तुम्हारा नाम (श्री गणेश वंदना) ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

पहले तुम्हारा नाम (श्री गणेश वंदना)☘️🙏🙏☘️



पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम॥

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश भगवान।

तेरे चरणों में है मेरा, तन-मन और सम्मान॥


गजमुख सुंदर रूप तुम्हारा,

मन को बहुत सुहाए।

एकदंत तुम दीन-दुखी के,

दुःख सारे मिटाए॥


पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम॥


माथे सिंदूर लाल तुम्हारे,

गल में मोती माला।

दूर्वा फूल चढ़ाएँ तुमको,

मन हो निर्मल-भाला॥


पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम॥


मोदक का भोग लगाएँ,

मन में प्रेम जगाएँ।

तेरी कृपा रहे हम सब पर,

तेरा नाम ही गाएँ॥


पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम॥


जब भी राह कठिन हो जाए,

तुम ही राह दिखाना।

डगमग हो जब मन हमारा,

हाथ पकड़ ले जाना॥


पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम॥


बुद्धि देना, ज्ञान भी देना,

सच्ची राह दिखाना।

मन में दया, हृदय में सेवा,

ऐसा भाव जगाना॥


पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम॥


घर-घर सुख हो, घर-घर हँसी हो,

सबके मन में प्यार।

तेरी कृपा से दूर हो जाए,

दुःख, चिंता, अंधकार॥


पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम॥


यज्ञ हो या पूजा कोई,

पहले तेरा ध्यान।

तेरे नाम से शुरू करें हम,

हर शुभ काम महान॥


पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम॥


अंत समय तक साथ निभाना,

इतनी अरज हमारी।

तेरे चरणों में बीते जीवन,

हे गणपति सुखकारी॥


पहले तुम्हारा नाम लें, गणपति मेरे राम।

तेरे नाम से शुभ हो जाए, मेरा हर एक काम।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश भगवान।

तेरे चरणों में है मेरा, तन-मन और सम्मान॥


☘️🙏🙏🕉️☘️

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी


शनिवार, 5 सितंबर 2026

भादों की बरसात ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

भादों की बरसात 

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


रात-रात भर मेघ बरसें, भीग गया आकाश,
धुंध ओढ़कर सोई घाटी, खोया अपना प्रकाश।
शिखरों पर बादल ठहरे, श्वेत रुई-से भार,
कभी घाटी से शिखर चढ़ते, कभी शिखर से पार।
हवा चली तो मेघ उड़े, जैसे स्वप्निल पंख,
चीड़-दल की दूर चोटियों पर बज उठे नीरव शंख।

काली की गर्जन सुन पड़ती - वन में सिंह पुकार,
शिलाओं से टकराकर उठती जल की हुंकार।
काला पानी दूर कहीं से लाता गहरा राग,
सीमा की उस घाटी में बहता निर्भय अनुराग।
धारचूला की भोर नहाती धुंधलके के नीर,
आदि कैलाश-पथ पर लिखते मेघ नए तदबीर।

धीरे-धीरे कोहरा छँटता, खुलते पर्वत-रंग,
धुंध-पटों में वृक्ष झलकते, जैसे चित्र अनंग।
सूरज की इक किरण उतरती, काँप उठे वन-पात,
ओस-बिंदुओं में झिलमिल करती स्वर्णिम प्रभात।
दूर किसी अनदेखे कीटों का मधुर गान,
काली की गर्जन में घुलता प्रकृति का संगीत महान।



मक्के की सुनहरी बालें भरती खेतों में हास,
बैंगनों के गोल फलों पर ठहरी हरित सुवास।
घास भरे पथ, भीगी धरती, हरियाली का छोर,
बादल, वर्षा, वन और घाटी - एक अलौकिक भोर।
फिर मेघ घिरें, फिर जल बरसे, फिर धुंध करे श्रृंगार,
भादों अपने भीगे आँचल में रचता नया संसार।

सीधी ढलती पर्वत-देह पर पानी दौड़े तेज,
कंकड़-पत्थर साथ बहाएँ, जल का कैसा वेग।
छोटी-छोटी धाराएँ मिलकर बनतीं जल की धार,
चट्टानों की देह तराशे बहता निर्मल प्यार।
ऊपर से झरने टूट पड़ें, शैल-वक्ष को चीर,
दूधिया धार लिपटती जाए, बनकर जल की लकीर।

फिर घिर आते मेघ अचानक, नभ हो जाता श्याम,
बिजली की तीखी रेखा लिखती अग्नि-पैगाम।
गरज-गरजकर मेघ बरसते, काँपे घाटी-पार,
गूँज उठें वन, शैल-शिखर सब, दहके नभ के द्वार।
एक चमक में दूर शिखर फिर उजले होकर हँसते,
दूजी चमक में वही शिखर धुंध के भीतर बसते।



कभी बादल घाटी उतरें, कभी शिखरों पर जाएँ,
एक चोटी से दूसरी चोटी उड़ते-उड़ते छाएँ।
हवा चले तो धुंध उड़े, उड़ते जाएँ मेघ,
पर्वत जैसे चित्रकार हों, बदल रहे हों लेख।
कहीं अचानक खुलता आकाश, कहीं घना अँधियार,
भादों हर पल बदल रहा है अपना रूप-श्रृंगार।

काली फैलाती जल-आँचल, भरती अपना पार,
शिलाओं से टकरा-टकराकर करती प्रचंड पुकार।
काला पानी गहरे स्वर में गाता अपना राग,
उसकी लहरों में सुन पड़ता शताब्दियों का जाग।
बिजली, बादल, काली, झरने - एक हुआ हुंकार,
भादों की इस घोर घड़ी में जाग उठा पहाड़।

फिर धीरे-धीरे वर्षा थमती, थकता नभ का शोर,
धुंध उतरकर बाँहों में ले ले पर्वत का छोर।
गीली चट्टानों पर चमके दिन का पहला नूर,
बादल की पतली चादर से झाँके पर्वत दूर।
और प्रकृति फिर मौन खड़ी हो, जैसे ध्यान लगाए,
भादों के इस भीगे मन में अपना गीत सुनाए।

टीन-छतों पर बूँदें बजतीं, टप-टप तीव्र पुकार,
पीतल, काँसे, मिट्टी-बर्तन - सबका अपना तार।
जिस पात्र में जलधुन उतरे, वैसा उसका राग,
भादों जैसे स्वयं रचता वर्षा का अनुराग।
अरबी के पत्तों पर जल ठहरे, मोती बनकर चमके,
केले के विस्तृत पत्ते जल से भर-भर दमके।

हल्दी-पत्र की कोमल देह में बूँदें जाएँ समा,
हवा चले तो सेमल झूमे, झरे जलधारा-सा।
सड़क किनारे शाखें डोलें, भीगे पत्ते भरपूर,
लंगूरों की आँखों से झाँके वर्षा का दस्तूर।
लंबी सड़क काली के संग-संग जाती जाए,
ऊँचे पर्वत से बहता पानी कंकड़ साथ बहाए।

भारत की हरित ढलानों का जल उतरे उस धार,
नेपाल की पर्वत-देह से आए जल अपार।
दोनों देशों की जल-धाराएँ काली में मिल जाएँ,
सीमा के सारे अर्थ उसी क्षण जैसे धुल जाएँ।
भादों जब धरती पर उतरता, सीमा कहाँ रह जाती,
काली मानव-खींची रेखाओं पर अपना गीत सुनाती।

पिथौरागढ़, सतगढ़, कनालीछीना, अस्कोट - मेघों का हरित विस्तार,
ओगला, डीडीहाट, थल, बेरीनाग - भीगा पर्वत-पार।
मुनस्यारी-मिलम से उतरी गोरी, गाती जल-राग अविराम,
जौलजीबी में काली से मिलकर गढ़ती जल का नया आयाम।
बलुवाकोट, धारचूला, दार्चुला - कुहासे में डूबा संसार,
आदि कैलाश की ओर बढ़ता भादों - मेघ, नदी, पर्वत-राग अपार।

धीरे-धीरे भोर उतरती, धुलता नभ का द्वार,
कोहरे की चादर में लिपटे, मौन शिखर अपार।
क्षण-क्षण धुंध की ओट हटे, उभरे पर्वत-रेख,
फिर कुहासा बाँहें फैलाकर ढक दे उनका लेख।
काली की गंभीर गूँज में घुलता भादों का गान,
प्रकृति को निहारो तो लगता - पर्वत स्वयं भगवान।




बुधवार, 2 सितंबर 2026

सरिता का गीत ©डॉ. चंद्रकांत तिवारी

सरिता का गीत

©डॉ. चंद्रकांत तिवारी 


हिम की गोदी से निकलकर, निर्मल धारा आती है,

पत्थर-पत्थर चूमती-चूमती, मधुर गीत गाती है,

वन की छाया साथ लिए वह, घाटी में मुस्काती है,

प्यासे धरती के अधरों पर, जीवन-मधु बरसाती है।


कल-कल करती, छल-छल करती, चट्टानों पर बहती है,

फूलों की सुगंध समेटे, वन-पथ से कुछ कहती है,

चाँद उतरकर तेरी लहरों में, रजनी बन झिलमिलाती है,

भोर-किरण की पहली आभा, जल पर सोना बरसाती है।




काली श्यामल धार लिए, हिम की गाथा गाती है,

गोरी उजली हँसी लिए, पर्वत-मन बहलाती है,

सरयु के शांत किनारे, भोर सुनहरी आती है,

कोसी चंचल पायल बनकर, घाटी में झूम जाती है।


शारदा की धीमी लहरों में, वन की छाया सोती है,

गौला नदी की शांत धार में, संध्या दीप संजोती है,

छोटे गाड़-गधेरे मिलकर जब, जीवन-धारा बनती हैं,

कुमाऊँ की हर घाटी तब, हरियाली से हँसती है।


अलकनंदा नील सलिल-सी, पर्वत-गाथा गाती है,

भागीरथी हिम-शिखरों की, उजली कथा सुनाती है,

मंदाकिनी शिव-ध्यान लिए, शीतल स्वर में बहती है,

पिंडर अपने हिम-आँचल में, श्वेत कहानी कहती है।


पर जब काले मेघ उमड़कर, पर्वत पर छा जाते हैं,

बिजली के तीखे तीरों से, शिखर सभी हिल जाते हैं,

बादल फटते, जल उमड़ता, तट सारे डूब जाते हैं,

कोमल बाँहों वाली नदियों के, रौद्र नेत्र भर आते हैं।


कहीं घरों के दीप बुझते, कहीं द्वार वीरान हुए,

कहीं मलबे में दबकर कितने, सपने भी अनजान हुए।

कहीं करुण क्रंदन गूँजे, पर्वत-वन हैरान हुए,

कहीं नदी की काली लहरों में, आँगन सब मैदान हुए।


चीड़-देवदारों के वन जब, मलबे नीचे दबते हैं,

हरी पहाड़ी के आँचल में, धूसर घाव उभरते हैं।

कल तक जिन राहों पर जीवन, हँसता-गाता चलता था,

आज उन्हीं राहों पर केवल, पत्थर बिखरे मिलते हैं।


वन कटते हैं, पर्वत टूटें, धरती कैसे सह पाए,

जल की राह रोककर मानव, प्रलय स्वयं क्यों बुलाए,

प्रकृति कभी क्रोध नहीं करती, वह तो केवल चेताती है,

जो उसकी मर्यादा समझे, धरती फिर मुस्काती है।


फिर मलबे की दरारों से, दूब हरी हो जाती है,

सूखी धरती की गोदी में, कोंपल नई निकल आती है,

टूटी घाटी में फिर कोई, पंछी गीत सुनाता है,

घोर अँधेरी रात के पीछे, भोर नई आ जाती है।


ओ सरिता! तू जीवन-धारा, तू धरती की साँसें हैं,

तेरी निर्मल लहरों में ही, खेतों की हरियाली है,

तू बहती है तो वन हँसते, तू रुकती है तो सब प्यासें हैं,

तेरी सीमा में ही मानव, अपनी रक्षा पाते हैं।


फिर काली श्यामल मुस्काए, गोरी चाँदी हो जाए,

शारदा के शांत किनारे, स्वर्णिम भोर उतर आए,

अलकनंदा गीत सुनाए, भागीरथी स्वर दोहराए,

मंदाकिनी निर्मल होकर, शिव का ध्यान जगाए।


नदियाँ बहें मर्यादा लेकर, निर्मल उनका नीर रहे,

पर्वत ओढ़ें हरित वसन और, वन का मधुर गंभीर रहे,

मानव प्रकृति का सहचर बन, उसकी भाषा पढ़ता जाए,

तभी सरिता का अमर गीत, युग-युग धरती गाती जाए।


बहती रह तू, गाती रह तू, जीवन की मुस्कान लिए,

पर्वत से मैदानों तक जा, हरियाली की तान लिए,

तेरी लहरें कहती जाएँ—धरती सबकी माता है,

जिसने उसको प्रेम दिया है, उसका जीवन गाता है।