ईश्वर के करघे पर बुना हुआ आदमी
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
जीवन कच्चे धागे-सा, सूत बुनाई ईश्वर ही साथ
जब तक मन सच्चा रहता, तब तक उसका अटल हाथ
काल-करघा दिन-रैन निरंतर, खट-खट गान सुनाता है
भाग्य-तंतु पर बैठा बुनकर, मौन नियति लिख जाता है
साँस-साँस चर्खे की गति है, धड़कन तकली की झंकार
देह कपास, चेतन सूत है, प्राणों का अनुपम विस्तार।
माटी का यह क्षुद्र खिलौना, स्वयं गगन का स्वप्न बने
बूँद-बूँद में सिंधु समाया, कण-कण में अनहद स्वर तने
पीड़ा पनिहारिन बनकर जब, नयनों से निर्झर भरती है
तब अनुभव की स्वर्णिम गंगा, अंतर्मन में उतरती है
आशा नववधू बन आती, केसर-वर्णी भोर लिए
सपनों के माणिक चुनती है, अंबर की चितचोर लिए।
माया स्वर्ण-मृगों की टोली, वन-वन मन को दौड़ाती
सत्य हिमालय-सा अडिग खड़ा, हर भ्रम-रेखा मिटवाती
सुख चंपा की गंध सलोनी, दुःख धधकता पलाश बना
दोनों के संग-संग चलकर ही, जीवन पूर्ण प्रकाश घना
कर्मों के कर से बुनती है, हर दिन नई चदरिया काल
एक सिरा उत्सव में भीगा, दूजा भीगा अश्रु-जाल।
अहंकारों के दुर्ग गिरे सब, तिनकों जैसे आँधी में
प्रेम रहा पीपल-सा अक्षय, जलता हुआ समाधि में
रजनी काली स्याही लेकर, नभ पर ग्रंथ लिखाती है
तारों की अक्षर-माला से, ईश्वर कथा सुनाती है
हार स्वयं जय का द्वार बने, मृत्यु अमरता का उत्सव,
शून्य में सृष्टि दिखाई दे—यह चेतन का शाश्वत वैभव।
देह बाँसुरी, प्राण राग है, जगत् किसी की उँगली तान
जिसके संकेतों पर नाचे, चंद्र, सूर्य, धरती, आसमान
जब अंतिम संध्या उतरेगी, थककर रुक जाएगी हर साँस
तब भी उसके करघे पर ही, चलता रहेगा सृष्टि-विलास
जीवन कच्चे धागे-सा, सूत बुनाई ईश्वर के हाथ
ईश्वर के करघे से बुनता जन्म-मृत्यु जीवन-इतिहास।
अभिव्यक्ति के स्तर.....
मनुष्य का जीवन एक कच्चे धागे के समान है, जिसे ईश्वर समय के करघे पर कर्म, अनुभव, सुख-दुःख और विश्वास के रंगों से बुनता है। सत्य, प्रेम और विनम्रता से सजा जीवन ही सार्थक बनता है। अंततः मनुष्य ईश्वर की सृजन-कला का अद्भुत, चेतन और क्षणभंगुर किंतु दिव्य प्रतिरूप है।
©डॉ. चंद्रकांत तिवारी
सुंदर
जवाब देंहटाएंजी धन्यवाद
जवाब देंहटाएंजीव,जगत के सूक्ष्म भावों का गहन चिंतन, जीवन-दर्शन एवं मनमोहक शब्दों से गूंथी बहुत सुंदर रचना सर।
जवाब देंहटाएंसादर।
-----
नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ९ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।